आज किशोर होते तो 79 साल के हो गए होते... गायक, संगीत निर्देशक, गीतकार, अभिनेता, निर्माता-निर्देशक किशोर कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं, और लगता है कि उनके जाने से बन गया खालीपन आने वाले कई सालों तक भरा नहीं जा सकेगा...
किसी भी फ़िल्म के निर्माण में सभी विधाओं का महत्व होता है, लेकिन बॉलीवुड फिल्मों के संगीत पक्ष की महत्ता हमेशा से बहुत अधिक रही है, सो, फ़िल्म निर्माण के हर पहलू से जुड़े रहे होने के बावजूद किशोर ख़ुद को गायक कहलाना ही पसंद करते थे... हालांकि किशोर के समय में मोहम्मद रफी और मुकेश जैसे नाम भी मौजूद थे, लेकिन भारतीय फ़िल्म संगीत में उनका नाम अलग ही चमकता रहा...
मध्य प्रदेश के छोटे-से कस्बे खंडवा में 4 अगस्त, 1929 को प्रसिद्ध बैरिस्टर कुंजबिहारी लाल गांगुली के घर में आभास कुमार गांगुली के रूप में जन्मे किशोर बचपन से ही संगीत प्रेमी थे... किशोरावस्था में ही किशोर अपने बड़े भाई कुमुद कुमार गांगुली के पास मुंबई चले आए, जो उस वक्त बॉम्बे टॉकीज़ में लैब एसिस्टेंट के तौर पर तो काम कर ही रहे थे, अशोक कुमार के नाम से ख़ुद को अभिनेता के रूप में भी स्थापित कर चुके थे...
भाई की मदद से जल्द ही किशोर का परिचय कई फिल्मी हस्तियों से हो गया, लेकिन वह निर्देशक शाहिद लतीफ़ थे, जिन्होंने पहली बार किशोर की योग्यता को पहचाना और अपनी फ़िल्म 'जिद्दी' में खेमचंद्र प्रकाश के संगीत निर्देशन में गाने का मौका दिया... कुंदनलाल सहगल के अंदाज़ में गाया गया और देव आनंद पर फिल्माया गया यह गीत 'मरने की दुआएं क्यों मांगूं...' 1948 में शूट किया गया, और ज़ोरदार हिट रहा... इसके बाद देव आनंद के लगभग सभी गीतों में आवाज़ किशोर की ही रही...