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 IST 10,  2010  01:56 फरवरी Last Updated :
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कोसी का कहर
प्रदीप कुमार
नई दिल्ली, शुक्रवार, अगस्त 29, 2008
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कोसी नदी इस बार कयामत बन कर उत्तर बिहार के इलाकों में टूट पड़ी है। वैसे तो बिहार में कोसी का कहर कोई नई बात नहीं, लेकिन इस साल तबाही का मंजर बेहद भयावह है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि बिहार के नक्शे से सुपौल जिले का नाम मिट सकता है और मधेपूरा जिले का भूगौलिक ढांचा बदल सकता है। राज्य के आठ जिलों के 417 गांव की करीब 40 लाख आबादी बाढ़ की चपेट में है। तबाही का ये मंजर इसलिए भयावह है क्योंकि करीब 54 साल बाद कोसी नदी ने इस साल अपने प्रवाह का रास्ता बदला है। वह भी कोई सौ किलोमीटर। नदियों के बहाव का रास्ता बदलना किसी कयामत से कम नहीं होता। इसका सीधा-सा मतलब यह है कि 100 किलोमीटर के पूरे इलाके का जलमग्न हो जाना। उपर से कोसी 13 किलोमीटर की चौड़ाई में अपने पूरे प्रवाह के साथ बह रही है। यानि करीब 69,300 वर्ग किलोमीटर का वह इलाका जहां बारह दिन पहले जिंदगी का कोलाहल था, पानी की तेज रफ्तार वाली कलकल से वहां मातमी सन्नाटा चीखने लगा है।

इस पूरे इलाके के लाखों लोग जिंदगी बचाने की जंग लड़ रहे हैं। आमलोगों की जिंदगी की इस लड़ाई तक एक सप्ताह बाद ही सही टीवी कैमरे पहुंच कर दिखाने लगे हैं। अपना सब कुछ खो चुके ये लोग जब कैमरे पर कहते हैं कि बस जान बच जाए, यही बहुत है, और उनके पीछे आसमान तक पहुंचता पानी देख भयावह तस्वीर का अंदाजा लगाया जा सकता है। ये लाखों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं। इनकी अरबों की संपत्ति का नुकसान हो चुका है। करीब तीन लाख मवेशी अकाल मौत की चपेट में चले गए हैं। हालांकि अब तक सरकारी तौर पर अब तक 60 लोगों के मरने की बात कही जा रही है, लेकिन आशंका जताई जा रही है कि हताहतों की संख्या हजारों में पहुंच सकती है।

दरअसल, कोसी के इस जलजले के पीछे सरकारी लापरवाही भी कम नहीं है। हर साल आने वाले बाढ़ की बात को जानते समझते हुए भी राज्य सरकार ने नेपाल से सटे कुशाह बांध की मरम्मत के लिए 9 अगस्त को अपने इंजीनियरों का दल भेजा। वह भी तब जब बांध पर पानी का दबाव काफी बढ़ चुका था, मतलब साफ है कि राज्य सरकार के लिए 40 लाख लोगों के लिए जान पर बन आना कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था। अगर सरकार इस मुद्दे पर गंभीर होती तो यह काम प्राथमिकता की सूची में काफी पहले हो जाना चाहिए था। वहां नेपाली लोगों और अधिकारियों के विरोध में यह दल अपना काम नहीं कर सका और 18 अगस्त को कोसी के बहाव के सामने बांध ने जवाब दे दिया। कोसी ने भी 1954 के बाद अपना रास्ता बदल लिया और देखते ही देखते पूरे के पूरे इलाके को पानी ने डूबो दिया। राज्य सरकार बाढ़ से पहले भी सोई रही थी और बाढ़ की गंभीरता को आंकने में भी उससे चूक हो गई। तभी तो बारह दिनों बाद भी बाढ़ में फंसे लोगों को सुरक्षित इलाके में नहीं पहुंचाया जा सका है। हालात इतने भयावह हैं कि राज्य सरकार की पूरी मशीनरी इससे निपटने में अक्षम है, लेकिन राज्य में सुशासन का दंभ भरने वाले इंजीनियर नीतीश कुमार को केंद्र और सेना से मदद मांगने में सप्ताह भर से ज्यादा का समय लग गया।

पिछली बार बिहार में जब बाढ़ आई, तब बेचारे मारीशस की सैर कर रहे थे, लेकिन इस बार पटना में होने के बाद भी उन्हें प्रलय का आभास तो हुआ, लेकिन काफी देर से। तब तक राज्य के लाखों लोग को बचाने के लिए वह महज तीन हेलीकाप्टर और सौ नावों पर भरोसा किए रहे। सेना और केंद्र सरकार की मदद मंगाने के बाद भी पीड़ित लोगों को जल्द से जल्द राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। वजह साफ है कि इन इलाकों में आने वाले दिनों में जल स्तर के बढ़ने की आशंका है। मुश्किल यह है कि कोसी नदी भागलपुर के निकट जहां गंगा से मिलती है वहां भी जलस्तर काफी बढ़ा हुआ है। ऐसे में इस इलाके की आबादी में तुरंत किसी राहत की उम्मीद नहीं दिखती।

राज्य का बाढ़ आपदा प्रबंधन विभाग की राहत और बचाव कार्य से निपट पाने में असफल रहा है। यह देश के हर राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की अपनी क्षमता और सीमा भी है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि हर साल आने वाली बाढ़ के बाद भी बिहार सरकार के बाद राज्य सरकार के पास इससे निपटने के लिए किसी ठोस योजना का अभाव है। इलाके के लोगों को समय से खतरे की सूचना देकर जानमाल के नुकसान को काफी कम किया जा सकता है, लेकिन अत्याधुनिक संचार के युग में यह बिहार में संभव नहीं हो पाया। बहरहाल सरकार के सामने अभी प्राथमिकता राहत और बचाव कार्य को युद्ध स्तर में बदले जाने की है।

सबसे पहले सेना के हेलीकाप्टर और नावों के सहारे बाढ़ में फंसे लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री ने हवाई दौरा करने के बाद इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। उन्होंने एक हजार करोड़ रुपये की राहत राशि भी दी है। लेकिन सवाल बना हुआ है कि भ्रष्ट शासन तंत्र इसका इस्तेमाल सरकारी लूट में ज्यादा करेगा या फिर राहत और बचाव कार्यों में। हर साल बाढ़ के बाद राज्य में सरकारी लूट के उदाहरण बढ़ जाते हैं। वैसे इस बाढ़ का असर आने वाले लंबे समय तक बना रहेगा। कोसी नदी के रुख मोड़ने से लाखों लोगों के सामने विस्थापन का संकट है, पानी कम होने के बाद बाद भी उनकी कृषि योग्य भूमि नदी में समा सकती है। ऐसे में पानी कम हो जाने के बाद भी उनके सामने आजीविका का साधन जुटा पाना खासा मुश्किल होगा। पिछले साल कोसी में सामान्य बाढ़ की स्थिति में राज्य के 500 लोगों की जानें गईं थीं और करीब 1500 करोड़ रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ था, लेकिन इस बार जानमाल की क्षति कई गुणा ज्यादा होने की आशंका है।

विडंबना यह है कि हर साल कोसी अपने साथ करोड़ों की संपत्ति का बहा ले जाती रही है, लेकिन राज्य और केंद्र दोनों की सरकारें इसे प्रकृति की आपदा मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं। बांध अध्ययन से जुड़े योजनाकारों का मानना है कि अगर नेपाल की सीमा पर कोसी नदी पर सही ढंग से बांध बना लिया जाए, तो कोसी के कहर पर काबू पाया जा सकता है, लेकिन भारत - नेपाल के साथ 58 साल के शांतिपूर्ण रिश्ते में इसकी पहल देखने को नहीं मिली। चार साल पहले वाजपेयी सरकार ने नेपाल सरकार के साथ मिलकर कोसी नदी पर विविध उपयोगी बांध बनाने पर सहमति जताई थी, लेकिन इस दिशा में चार साल बाद भी कोई काम नहीं हो पाया है। हालांकि इन चार सालों तक भारत के नेपाल के साथ रिश्ते भी मजबूत थे, लेकिन मौजूदा हालात में प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार भारत के साथ दूरी बनाकर रखना चाहती है। बावजूद इसके केंद्र सरकार को तत्काल इस दिशा में नेपाल से बातचीत की पहल करनी चाहिए। यह मामला देश के गृह मंत्रालय के अधीन है और केंद्र सरकार को चाहिए कि वह इसे अपनी प्राथमिकता की सूची में शामिल करे, जब तक ऐसा नहीं हो पाता है, तब तक कोसी का कहर यूं ही बिहार की आर्थिक और माली हालात को बद से बदतर बनाता जाएगा।

टिप्पणियां:
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बहुत ही सारगर्भित लेख है। प्रदीप जी को बधाई।
निखिल कुमर, nikhil.kumar31@yahoo.co.in, फारबिस गज
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