13 अगस्त की उनींदी-सी शाम थी। रात के आठ बजे चंडीगढ़ में कुछ महामहिम जज रोज़ की तरह मिल रहे थे, जहां पता नहीं क्या बातें हो रही थीं। ज़ाहिर है, आम लोग, जिनकी वहां तक पहुंच नहीं है, इस बारे में फ़कत कयास ही लगा सकते हैं। तभी संतरी आवाज़ देता है कि मैडम के नाम से कोई गिफ्ट आया है। पैकेट में कोई विस्फोटक न हो, दरवाज़े पर तैनात प्रहरी अपनी ड्यूटी बजाते हुए, डिब्बा खोल देता है। सबकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं। मौके पर मौजूद जज हैरान हैं कि आखिर किसकी हिमाक़त है कि एक जज के घर पैसा पहुंचा दे... 15 लाख रुपये...
जज के घर में जो लोग थे, उनके पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गई। कोई कह दे कि यह सच नहीं है, यह पैसा नहीं है, यह घटना नहीं घटी है, यह सब पाप है, यह महज़ अफवाह है... लेकिन घटना घट चुकी थी़। दुनिया के सामने वह सच्चाई आ चुकी थी, जिसके बारे में सोचकर भी ज़हन एक बार ज़रूर सिहर जाता है। जज-वकील-दलाल का एक काला चिट्ठा सबके सामने था। जज को पुलिस में मामला दर्ज़ करवाना पड़ा, लेकिन नहीं, पैसा तो किसी और जज के घर जाना था। एक, दो और न जाने कितने जज शामिल हैं, कौन कह सकता है कि हक़ीकत क्या है... दाल में काला है या सारी दाल ही काली है। अगले दिन कुछ और जजों पर अंगुलियां उठनी शुरू हो गईं।
मामला आखिरकार चंडीगढ़ पुलिस के हाथों से निकालकर सीबीआई के सुपुर्द कर दिया गया। तफ्तीश में पता चला कि चंडीगढ़ में यह पैसा दिल्ली के एक होटेलियर रविंदर सिंह ने हरियाणा के एडीशनल एडवोकेट संजीव बंसल के ज़रिये एक हाईकोर्ट जज के लिए ही भेजा था, लेकिन पैसा रास्ता भटक गया। पैसा जाना था जस्टिस निर्मल यादव के घर सैक्टर-24 में, लेकिन बंसल के नौकर से गलती हुई, और वह पैसा लेकर आ गया, जस्टिस निर्मलजीत कौर के घर। पूछताछ में पता चला कि निर्मल यादव और दलालों के बीच बातचीत होती रही थी, निर्मल यादव को छुट्टी पर जाना पड़ा। यह पहला वाकया था कि किसी जज के घर पर कोई पैसा पहुंचाने आता है, और पकड़ा भी जाता है। कुछ दिन गुजरने के बाद सीबीआई ने सवालों का एक पुलिंदा जजों को थमा दिया। वे बताएं कि सच क्या है। दरअसल सवाल वैसे लोगों से पूछा जा रहा था, जिनसे सवाल कोई पूछता नहीं है।
चंडीगढ़ की घटना पहली नहीं थी। कुछ हफ्ते पहले गाज़ियाबाद के 34 जजों के खिलाफ़ कोर्ट के मुलाज़िमों के प्रोविडेंट फंड से हेराफेरी करने का मामला सामने आया, मामला यहां भी सीबीआई को देना पड़ा था। एक साथ इतने सारे जजों का नाम सामने आना बहुत बड़ी घटना थी, लेकिन उससे भी ज़्यादा हैरान करने वाली बात थी कि इस घटना ने आम लोगों के विश्वास को हिलाकर रख दिया। 'माई लॉर्ड' के गंभीर चेहरे पर कई सिलवटें नज़र आने लगीं। न्यायालय की बुनियाद में घुन लग गया है, यह पता चल गया... सवाल उठता है कि क्या इसका इलाज भी खोजा जाएगा...?
अभी तक हमारी धारणा रही है कि 'आप जजों से सवाल नहीं कर सकते, वे संदेह से परे हैं...', लेकिन इससे समस्या का निराकरण नहीं हो जाता। कुछ साल पहले जब जस्टिस जेएस वर्मा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, उन्होंने एक 16 प्वाइंट का कोड ऑफ कन्डक्ट बनाया था, जिसमें न्यायपालिका में फैल रहे भ्रष्टाचार को रोकने के तरीके बताए गए थे। इसका सार था कि 'आप कितने भी ऊंचे क्यों न हों, कानून आखिरकार आपसे ऊपर है...'
क्या न्यायालय के अंदर और बाहर के लोग इसे समझेंगे और व्यवहार में लाएंगे... जवाब मिलेगा - नहीं... कुछ दिन पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर ने कहा था - 'जज तभी अच्छे हो सकते है, जब वकील भी अच्छे हों...' यानि सवाल सिर्फ जजों के ऊपर क्यों उठाए जाते हैं, अपने अंदर तो वकीलों को भी झांकना चाहिए। यह बहुत अच्छी बात है कि चंडीगढ़ में बार के अन्दर वकील आवाज़ उठाते हैं, व्यवस्था से सवाल करते हैं। अगर लोग आवाज़ उठाने से डरते तो शायद चंडीगढ़ के पास पांच सितारा फॉरेस्ट हिल रिसॉर्ट में जजों की सदस्यता लिए जाने के मुद्दे पर कोई कुछ बोलता ही नहीं। यहां कोई घूस नहीं ली गई थी, लेकिन अगर एक पांच सितारा गोल्फ क्लब में जजों को मेंबरशिप मुफ्त दी जाती है, तो इसके पीछे कोई न कोई मंशा तो ज़रूर होगी... ऐतराज़ इसी बात पर था।
बात जब जजों की आएगी तो सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस वी रामास्वामी का ज़िक्र ज़रूर होगा। जिनके खिलाफ अपने आफिस का दुरुपयोग करने के इल्ज़ाम में महाभियोग का प्रस्ताव लाया तो गया, लेकिन वह सिरे नहीं चढ़ सका। 1991 में लोकसभा में लाए गए प्रस्ताव में कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, जिससे रामास्वामी को बचकर निकल जाने का रास्ता मिल गया। शायद वह ऐसा मौका था, जहां सूझबूझ-भरा कदम उठाकर मिसाल कायम की जा सकती थी। अदालतों के अंदर सुधार लाने का वह अच्छा मौका था, लेकिन इसे सस्ते में गंवा दिया गया।
आज जब प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ज़िम्मेदार न्यायपालिका की बात करते हैं, तो समझा जा सकता है कि अब अदालतों में सुधार लाने की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है। ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार से निबटने के लिए कुछ खास सुझाव दिए हैं, जो हिन्दुस्तान के लिए उतना ही मुनासिब हैं :
* न्यायपालिका में नियुक्ति किसी स्वतंत्र संस्था को करनी चाहिए...
* जजों की नियुक्ति प्रतिभा के आधार पर होनी चाहिए...
* जजों के वेतन भी उनके अनुभव और योग्यता के हिसाब से तय हों...
* जजों को भी सज़ा मिले, अगर वे किसी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाएं...
* जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच कोई स्वतंत्र संस्था करे...
* जजों को हटाए जाने या उनके तबादले किए जाने में पारदर्शिता बरतनी चाहिए...
अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में हर पांच में से एक नागरिक को न्याय हासिल करने के लिए घूस का सहारा लेना पड़ता है, सो, साफ है कि तीसरी दुनिया से कहीं ज़्यादा भ्रष्ट अमेरिका जैसे देशों के जज हैं। इस हिसाब से भारत की स्थिति कहीं बेहतर है। भारत में हाल-फिलहाल की घटनाओं से जनता विचलित है, लेकिन सबको न्याय देने वाले जज खुद अदालत के अंदर फैल रही गंदगी को साफ करेंगे, इसका देशवासियों को यकीन है। चाहे व्यवस्थापिका हो, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका, सब पर कभी न कभी संकट ज़रूर आते हैं। जजों की गद्दी पर बैठकर जो व्यवस्था के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, वे अपराधी हैं। हमें यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था की सलामती ज़्यादा ज़रूरी है, व्यक्ति की नहीं, चाहे वह कितनी ही ऊंचाई पर क्यों न हो।