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 IST 10,  2010  01:56 फरवरी Last Updated :
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जागो! अमन खतरे में है...
ब्रजमोहन सिंह
नई दिल्ली, सोमवार, अक्टूबर 20, 2008
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ईद के मौके पर हिन्दू और मुसलमान सदियों से गले मिलते रहे हैं, एक दूसरे को बधाई देते रहे हैं। यही होता रहा है विजयादशमी और दिवाली पर। लेकिन ये ऐसा पहला मौका था, जहां लोग सहमे-सहमे दिख रहे थे। मिले भी तो ये डर रहा कि कहीं कोई हमारी तस्वीर तो नहीं ले रहा है। कहीं कोई हम पर नज़र तो नहीं रख रहा है।

मुझे चंडीगढ के एक मित्र के यहां इफ्तार पार्टी में जाने का न्यौता मिला। सालों पहले वो लखनऊ से पंजाब आए थे और अब अपनी मेहनत से एक
मुकाम बना लिया, एक बिजनसमेन के तौर पर।

खैर, दावत मे शरीक़ होकर मुझे बहुत खुशी हुई लेकिन दबी जुबान में वहां सभी बम धमाकों की ही चर्चा कर रहे थे। 'तौबा-तौबा, आहिस्ता बातें
कीजिए, कहीं कोई गलत मतलब ना निकाल ले।' यही आम राय थी। सैकड़ों की भीड़ में खुफिया विभाग के भी कुछ लोग वहां मौजूद थे, जो लखनवी और हैदराबादी बिरयानी चटकारे लेकर खा रहे थे। एक ही चर्चा थी कि जो भी धमाकों के पीछे है, उसका पर्दाफाश होना चाहिए। कुछ दिन पहले जामिया के बटला हाउस मे इनकांउटर हुआ था, लेकिन सबको चिन्ता थी कि आगे कहीं बेकसूर लोग ना मारे जाएं। दरअसल मौका ईद का था लेकिन आतंक ने सबकुछ खराब कर दिया था।

आमतौर पर हिन्दुओं और मुसलमानों का एक दूसरे के त्यौहारों में शिरकत करना हमारी सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। कट्टरपंथी ताकतें चाहती
हैं कि सालों से चल रहे इस रिवाज़ पर रोक लगे। समाज में नफरत बढ़े। इस साजिश को समझना ज़रूरी है।

अभी दिवाली आ रही है, कितना अच्छा होगा, अगर आप अपने मुस्लिम पड़ोसी को अपने घर पर मिठाई खाने के लिए बुलाएं। ज़्यादातर मुस्लिमों के
बच्चों को ये भी नहीं पता कि दिवाली क्यों मनाई जाती है। विजयादशमी क्यों मनाते हैं। दरअसल ये एक बुनियाद का काम करेंगे, मजबूत भारत बनाने की दिशा में।

मुझे याद है पिछले साल यहां ईद की तैयारी हो रही थी लेकिन लुधियाना के बम धमाके ने सबका मन खट्टा कर दिया था। यह बात हिन्दू और
मुस्लिम, दोनो धर्मों के लोगों को पता है कि यहां पर्वों के दौरान ही धमाके कराए जाते हैं ताकि लोगों की खुशी पर बट्टा लगे और दोनों के बीच शक की दीवार खड़ी हो। लेकिन, लोग समझदार हो रहे हैं। कम से कम हिन्दुस्तान में हुए हालिया बम धमाके से तो यही बात निकलकार सामने आई है कि आतंकवादी नाकाम रहे हैं, लोगों के बीच दीवार खड़ी करने में।

समाज और मानवता के दुश्मन हमारे ही बीच मौजूद है, जो हर दिन अपनी नई चालें ज़रूर चल रहे हैं। इनके पैंतरों को हम और हमारी जांच
एजेन्सियां समझ नहीं पा रहे हैं। सबने गौर किया होगा कि आतंकी अब वैसे लोगों को मोहरा बना रहे हैं, जिनके ऊपर हमारा शक नहीं जा सकता।
पढ़े-लिखे घरों के बच्चे जिनका मदरसों से कोई ताल्लुक नहीं रहा है। वे न सर पर टोपी पहनते हैं, ना ही दाढ़ी रखते है। ये अंग्रेज़ी बोलते हैं और कम्प्युटर के बारे में उनका अच्छा-खासा दखल होता है। ये आपके पसंदीदा बैंक में मौजूद हो सकते हैं, टेलीकॉम सेक्टर में मौजूद हो सकते हैं, जहां से ये आपकी सारी सूचनाएं उड़ा सकते हैं। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि आज के मुस्लिम युवाओं को इस साजिश का पता नहीं है...है...और ज़रूर है...

मैं एक छोटी सी बानगी देना चाहता हूँ। पटना के २४ साल के सादिक (नाम बदल दिया है) पंजाब में एक प्राइवेट बैंक में काम करते हैं, उनके
इनबॉक्स में पाकिस्तान से एक मेल आया जिसमें हिन्दुस्तान के कुछ शहरों के बारे में जानकारी मांगी गई थी। सादिक चाहते तो चुप बैठ जाते, पुलिस को नहीं बताते लेकिन सादिक ने अपना फर्ज़ पूरा किया। अगर वह सामने नहीं आते तो शायद उनका ज़मीर उन्हें कभी माफ नहीं करता। शायद यही एक तरीका है कि हम अपने मुल्क की हिफाज़त कर सकते हैं। कहना थोड़ा आसान लगता है लेकिन और रास्ता भी क्या है? ये मुल्क हम सबका है, सबको कहीं ना कहीं इस बात का इल्म होना चाहिए। और, अगर एक युवक इस बात को समझता है कि उन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है तो मुझे पूरा यकीन है कि हिन्दुस्तान का बाल भी बांका नही होगा।

यहां लगे हाथ उन खबरों का भी ज़िक्र करना चाहूंगा कि कैसे पाकिस्तान में भी कट्टरपंथी बम धमाकों में युवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं। बहुत से
युवा पैसे के लिए कुछ भी कर रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह है कि बहुत से लोग जल्दी अमीर बनना चाहते हैं। इन्हें अपने मां-बाप दकियानूसी लगते हैं।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के परपोते फिरोज़ बख्त़ अहमद, जो बड़े शिद्दत से इस्लाम धर्म में सुधार लाने की वकालत करते रहे हैं, कहते हैं कि
वक्त आ गया है जब सुधारवादी मुसलमानों को फिरका़परस्ती ताकतों को काबू में लाने के लिए खड़ा होना चाहिए। यही बात हिन्दू धर्म में यकीन रखने वालों पर भी सही है। निरपराध लोगों को मारने की इजाज़त कोई धर्म नहीं देता है। जो धर्म के नाम पर सियासत करते हैं, खून करवाते हैं, उन्हें तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। चाहे वो किसी भी मजहब को मानते हों। इस बात में कोई दो राय नहीं है।
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ब्रजमोहन जी, आज जिस प्रकार से आतंकवाद ने अपना पांव फैलाया है, उससे तो यही लगता है कि आज हम अपने ही देश में कैद हो गए हैं। जब भी मैं कहीं बस या ट्रेन से ... पढ़ें
दीवेश राय, deevesh.rai@gmail.com, उत्तर प्रदेश
बेबाक टिप्पणी है ये। बहुत दिनो से ऐसी टिप्पणी कोई कर नही रहा था। इसे कहते है धर्मनिर्पेक्षता। मुसलमानो के बारे मे कोई ग़लत ना समझ ले इसलिये इस्लाम का नाम ... पढ़ें
विवेक सिह, vivrit@indiatimes.com, धर्मापुरी, तमिलनाडु
Many many thanks to you for this article. This is the only thing we require right now for current situation for all of us in India. Thereby making a solid ... पढ़ें
Mohd. Sameer, futurewebworld.com@gmail.com, Jaipur
 
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