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 IST 6,  2009  00:12 जनवरी Last Updated :
कॉलम
रेल यात्रा और कामकाज का तरीका
प्रदीप कुमार
नई दिल्ली, शनिवार, नवंबर 1, 2008
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हाल ही में अचानक रांची जाने का मौका मिला। जब तय कर लिया कि जाना ही है तो ट्रेनों की सूची देखी। पता चला कि झारखंड की राजधानी के लिए राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से कोई भी ट्रेन ऐसी नहीं है, जो प्रतिदिन चलती हो, हालांकि यह इस रूट पर आने-जाने वाले लोगों की संख्या पर निर्भर करता है। हो सकता है कि रांची से नई दिल्ली तक आने-जाने वाले लोग इतने नहीं होंगे कि हर रोज ट्रेन चलाई जाए, लेकिन एक मायने में यह बताता है कि झारखंड के अलग राज्य बन जाने के बाद भी रांची के साथ केंद्र का नजरिया बहुत ज्यादा नहीं बदला। बहरहाल, मुझे अपने कार्यक्रम से एक दिन पहले का टिकट मिला, राजधानी एक्सप्रेस में। इस ट्रेन को जब शुरू किया गया तो सबसे बेहतरीन सुविधाओं से युक्त ट्रेन थी, आज भी है। हालांकि बाद में शताब्दी के शुरू होने से इसका महत्व थोड़ा घटा जरूर है। यह महत्व कितना घट गया है, इसका अंदाजा मुझे नई दिल्ली स्टेशन पर लगा।

नई दिल्ली भारत के सबसे व्यस्तम स्टेशनों में है, और यहां से रोजाना हजारों यात्री एक जगह से दूसरी जगह के लिए ट्रेनें पकड़ते हैं या ट्रेनों से उतरते हैं। अब यहां 16 प्लेटफार्म हो गए हैं, किसी दिन भी आधे घंटे के लिए किसी प्लेटफार्म पर ठहर जाइए तो पूरे भारत की संस्कृति की झलक आपको मिल जाएगी। इस स्टेशन से विदेशी पर्यटक भी पर्यटन केंद्रों के लिए ट्रेनें पकड़ते हैं। ऐसे में नई दिल्ली स्टेशन को भारतीय संस्कृति के नजरिए से एक अहम स्पॉट माना जा सकता है। तो उम्मीद बंधती है कि इस स्टेशन की सुविधाएं भी विश्वस्तरीय होंगी, हालांकि तमाम दावों के बाद भी बढ़ती आबादी का बोझ इस स्टेशन को विश्वस्तरीय स्टेशनों जैसा नहीं बनने दे रहा है। फिलहाल बात रांची जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस की। इसके प्लेटफार्म नंबर 16 से खुलने की सूचना थी, शाम के 4.10 बजे इसे प्रस्थान करना था। अपने समान के साथ मैं वहां 4 बजे से पहले पहुंच चुका था। 4 बजे तक प्लेटफार्म पर ट्रेन का पता नहीं था। अचानक घोषणा होती है कि रांची जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस नियत समय पर प्लेटफार्म नंबर 12 से खुलेगी। आप यकीन नहीं करेंगे प्लेटफार्म पर भगदड़ से मच जाती है। लोग अपने समानों के साथ सीढ़ी की ओर भागते हैं। उदघोषक को गाली देता मन प्लेटफार्म पर लगी घड़ी की ओर जाता है, 4 बजकर चार मिनट। खिन्न मन से बैग लेकर सीढ़ी की ओर चलता हूं तो दूर से ही प्लेटफार्म पर किसी ट्रेन के आने की झलक मिलती है, सीढ़ियों पर कदम ठिठक जाते हैं, सोचता हूं देख लिया जाए कौन-सी ट्रेन है तभी भागा जाएगा। मेरे साथ कई सीढ़ियों से लटके थे। वो ट्रेन रांची जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस ही थी। फिर से सीढ़ियों पर भगदड़ होती है, चीख पुकार मचती है। लोग ट्रेन पकड़ने के लिए भागते हैं। भागकर अपनी बोगी तक पहुंचता हूं, लेकिन तब तक दोबारा घोषणा नहीं होती है कि रांची राजधानी एक्सप्रेस प्लेटफार्म 16 से ही खुलेगी। लोग गिरते पड़ते अपनी-अपनी बोगी तक पहुंचने के लिए भाग रहे थे। क्या पता ये घोषणा प्लेटफार्म नंबर 12 पर हुई हो। नई दिल्ली का स्टेशन है, क्या पता हर प्लेटफार्म के लिए अलग-अलग उदघोषणा केंद्र हो।

वैसे यह राजधानी एक्सप्रेस का हाल था, बाकी ट्रेनों के बारे में आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। यह घटना नई दिल्ली स्टेशन पर हुई, तो अन्य स्टेशनों के बारे में आशंकाओं से दिल बैठ गया था। सच-सच तो नहीं मालूम लेकिन अंदाजा है कि उस दिन कई लोगों की ट्रेन छूट गई होगी। बात केवल पैसे के नुकसान भर की नहीं है, ऐसे लोगों के लिए उस दिन तो रहने दीजिए अगले कुछ दिनों तक दूसरी ट्रेन नहीं मिली होगी। निजी क्षेत्रों में ही नहीं सार्वजनिक क्षेत्रों के भी कामकाजी लोगों के लिए यह अनुभव उनके महीनेभर के बजट को बिगाड़ गया होगा, लेकिन हम भारतीयों को इन हालातों से एडजस्ट करने की आदत ही हो गई बहरहाल, यह हमारी उस व्यवस्था का ऐसा सच है, जहां एक आदमी की लापरवाही सैकड़ों लोगों की जरूरत पर भारी पड़ती है।

इसी राजधानी एक्सप्रेस से रांची से लौट रहा था। अपनी ही बोगी में सुबह 6 बजे शोर होने पर आंखे खुल जाती हैं। बोगी का एटेंडेंट एक सोए यात्री को जगाकर कंबल- चादर मांग रहा था। यात्री कुछ देर और सोना चाहते थे, एटेंडेंट उनसे बहस कर रहा था। ट्रेन तब अलीगढ़ के पास से निकल रही थी। डेढ़ घंटे की यात्रा बाकी थी। इस बात ने विवाद पकड़ लिया, इस शोर के चलते बोगी में सोए तमाम यात्री उठ चुके थे। हर यात्री एटेंडेंट के इस रवैए पर नाराजगी जता रहा था। एटेंडेंट अपनी सुविधा से सेवा और सुविधा को बिगाड़ रहा था। इसकी शिकायत दर्ज कराने की बात पर अचानक एटेंडेंट ने अपनी गलती मान कर माफी मांगनी शुरू कर दी। हममें से किसी के पास उसकी शिकायत करने की फुरसत नहीं थी। हालांकि हम-आप में कइयों का अनुभव है कि इस तरह की शिकायत करने-कराने में काफी वक्त लगता है, और व्यवस्था के अंदर कार्रवाई कब तक होगी, होगी या नहीं होगी, इसका भरोसा नहीं जमता। बहरहाल एक एटेंडेंट की गलती से कम से कम 72 यात्री परेशान हुए थे। ये दोनों महज घटनाएं भर नहीं है, ना भारतीय रेल सेवा की कोई बहुत बड़ी खामी है, जिस पर संसद में बहस हो और सड़कों पर धरना प्रदर्शन किए जाएं। ये अपने भारत में कामकाज का तरीका है, जहां किसी व्यवस्था में उपर से नीचे तक का कोई भी आदमी कइयों के लिए मुसीबतें पैदा कर सकता है। कामकाज का यही तरीका पूरे देश में धड़ल्ले से अपनाया जाता है और स्वीकार भी किया जाता है। तभी तो दुनियाभर के उत्पादन सूचकांक और विकास सूचकांक में हमारा देश नीचे से ही अपनी जगह बना पाता है।

वैसे मेरी यह रेल यात्रा पिछले अनुभवों के मुक़ाबले बेहतर साबित हुई। मैं दोनों बार नियत समय पर अपने गंतव्य पहुंच गया था। रेलगाड़ियों में सफ़र करने वाले लोग जानते हैं कि यह कोई सामान्य बात नहीं है।

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kya kiya ja sakta hai sarkari sewaon ka to yahi haal hai.. har jagah problem hi problem
saket verma, saketmcr@gmail.com, noida
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ARUNESH KUMAR, arundubey101@gmail.com, HYDERABAD
 
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