अनिल कुंबले का जादू अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अब नहीं दिखेगा... ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ कोटला टेस्ट में उन्होंने खेल से संन्यास की घोषणा कर दी... कुंबले का फैसला इतना अप्रत्याशित था कि नियो स्पोटर्स के कमेंटेटर शिवरामकृष्णन ने जब इसकी जानकारी दी तो उनके साथी कमेंटेटर सुनील गावस्कर को यकीन ही नहीं हुआ, लेकिन सच यही था... थोड़ी देर में जब खबर की पुष्टि होती गई तो कोटला मैदान में दर्शकों में भी सन्नाटा पसरने लगा... 18 साल से टीम इंडिया की गेंदबाजी की कमान संभाले चलने वाले कुंबले अपने चाहने वालों को भी गुगली से क्लीन बोल्ड कर चुके थे...
मैदान में पसरे सन्नाटे को कप्तान कुंबले ने थोड़ा रोमांचक बनाने की कोशिश की और भारत की पारी समाप्त घोषित कर आस्ट्रेलियाई टीम को 21 ओवर में 245 रन बनाने की चुनौती दी... हालांकि यह फैसला उन्होंने इसलिए भी लिया, ताकि वह गेंदबाजी करते हुए मैदान से विदा हों... जब वह गेंदबाजी करने उतरे तो उनके प्रशंसकों ने हर गेंद पर उनका उत्साह बढ़ाया... आठ ओवर के खेल के बाद टेस्ट समाप्त हुआ और भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल लेग स्पिन गेंदबाज का करियर भी थम गया...
ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज़ शुरू होने से पहले कुंबले ने सीनियर खिलाड़ियों के संन्यास के मुद्दे पर कहा था कि खिलाड़ियों को इसका फैसला खुद लेना चाहिए... वह इस बात से खफा भी दिखे थे कि मीडिया कैसे अपनी ओर से दिग्गज खिलाड़ियों को संन्यास देने की सलाहें देने लगता है... जब खुद संन्यास लेने की बात आई तो कुंबले ने कोई सोच-विचार नहीं किया... उलटे वे लोग स्तब्ध हैं, जो कल तक कुंबले को रिटायर होने की सलाह दे रहे थे... यही लोग अब दबी ज़ुबान से कह रहे हैं कि कुंबले अभी कुछ और दिन खेल सकते थे... बहरहाल कुंबले ने अपना फैसला खुद कर लिया, बिना किसी दबाव के... वह टीम पर बोझ नहीं बनना चाहते... संन्यास के फैसले पर उन्होंने कहा भी - अब शरीर साथ नहीं दे रहा है... हालांकि वह इस सीरीज़ के बाद अलविदा की घोषणा करने वाले थे, लेकिन मोहाली टेस्ट से पहले कंधे की चोट और कोटला टेस्ट में हाथ में लगी चोट के चलते उन्होंने एक टेस्ट पहले ही संन्यास लेने का फैसला कर लिया... यह फैसला उन्होंने अपने टीम के साथियों को अंतिम दिन ही जाकर सुनाया... कुंबले जैसे प्रतिबद्ध क्रिकेटर के लिए यह फैसला इतना आसान नहीं रहा होगा, लेकिन कोटला के साथ अपने ऐतिहासिक रिश्ते के चलते कुंबले ने यह फैसला सहजता से ले लिया... इसी मैदान पर उन्होंने 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ एक टेस्ट पारी के सभी 10 विकेट लेकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया था...
बहरहाल मौजूदा दौर में सीनियर-जूनियर खिलाड़ियों के बीच बढ़ती तनातनी के दौरान भी कुंबले का व्यक्तित्व कितना असरदार है, इसकी झलक उनको टीम की ओर से दी गई विदाई में साफ दिखी... जब कुंबले गेंदबाजी करने उतरे तो दोनों टीम के खिलाड़ियों ने ड्रेसिंग रूम के बाहर उनका स्वागत किया ही, जब वह कोटला से विदा होने लगे तो कर्नाटक टीम से ही उनके साथी रहे राहुल द्रविड़ और ज़हीर ख़ान ने उन्हें कंधों से उठा लिया... कोटला मैदान में जुटे दर्शकों ने भी 'कुंबले जिंदाबाद' के नारों के बीच आदर भाव से कुंबले को विदाई दी... उतराधिकारी धोनी ने तो उन्हें कंधों पर बिठाकर मैदान के चक्कर लगाए... 40-45 साल से क्रिकेट की दुनिया को करीब और बारीकी से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी मानते हैं कि किसी भारतीय क्रिकेटर को ऐसी विदाई मिलते, उन्होंने नहीं देखी...
वैसे अपने कुंबले वाकई इस सम्मान के हकदार भी हैं... उनके जैसा शालीन और सौम्य व्यवहार वाला क्रिकेटर तो कम ही मिलता है, वह अपने पूरे करियर के दौरान जीवट वाले क्रिकेटर भी बने रहे... संन्यास लेने के बाद उन्होंने कहा भी - मैं कभी चुनौतियों से भागा नहीं, हर चुनौती को मैंने यह कहकर स्वीकार किया कि हां, मैं यह कर सकता हूं और हमेशा अपनी ओर से इसकी पूरी कोशिश की...

कुंबले ने 132 टेस्ट मैचों में 619 विकेट लिए... इतने टेस्ट विकेट भारत की ओर से किसी गेंदबाज को नहीं मिले हैं... टेस्ट इतिहास में उनसे ज्यादा विकेट महज मुरलीधरन और वार्न ने लिए हैं... इसके अलावा भारत की ओर से वन-डे क्रिकेट में भी कुंबले ने सबसे ज्यादा 337 विकेट लिए... इतना ही नहीं, बीते 18 साल में वह भारत की ओर से एकमात्र मैच विजेता गेंदबाज रहे हैं... उनकी टीम में मौजूदगी से विपक्षी टीम के 20 विकेट झटकने का सपना टीम इंडिया देखती रही... उनके टीम में होने से एक छोर से गेंदबाजी की चिंता नहीं रहती... उनके जोड़ीदार बदलते गए, लेकिन कुंबले मारक गेंदबाज बने रहे... भारत की पिचों पर तो वह 'बल्लेबाजों का कातिल' बनकर उभरे, वहीं विदेशी पिचों पर भी वह सबसे कामयाब भारतीय गेंदबाज साबित हुए... बीते दो दशकों में टीम इंडिया के टेस्ट जीतों के रिकार्ड को बेहतर बनाने में उनका सबसे ज्यादा योगदान रहा...
अपने करियर की शुरुआत में कुंबले तेज गेंदबाज हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने अपनी गेंदबाजी की दिशा बदली और तेजी से गेंद फेंकने वाले स्पिन गेंदबाज बने... जब 1990 में उनका इंग्लैण्ड गई टीम के लिए चयन हुआ तो समीक्षकों ने माना था कि यह ऐसा स्पिनर है, जो गेंद को स्पिन ही नहीं करा सकता, ज्यादा से ज्यादा दो-चार टेस्ट खेल पाएगा... कुंबले वाकई गेंद को स्पिन कराने में महारत हासिल नहीं कर सके, लेकिन भारत ही नहीं, दुनिया के सबसे कामयाब गेंदबाजों में अपनी पुख्ता पहचान बना ली... कुंबले ने स्पिन न करा पाने को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया... उलटे उन्होंने टॉप स्पिन, गुगली और फ्लिपर जैसी गेंदों फेंकने में महारत हासिल कर ली... अपने ज्यादातर विकेट कुंबले ने इन्हीं गेंदों पर लिए... वार्न और मुरलीधरन की परंपरागत शैली से अलग कुंबले ने अपनी शैली विकसित कर ली, जहां गेंद को स्पिन कराने से ज्यादा अहम विकेट लेना होता गया... अपनी इस शैली में कुंबले खासे सफल साबित हुए...
गेंद के साथ उन्होंने कमाल दिखाया ही, बल्ले से भी वक्त-बेवक्त टीम के काम आते रहे... सबसे ज्यादा 118 टेस्ट मैचों के बाद टेस्ट शतक लगाने का अनोखा रिकॉर्ड उनके नाम है, साथ में उन्होंने पांच अर्द्धशतक भी जमाए... यह बताता है कि गेंदबाजी के लगातार बढ़ते दबाव के चलते वह अपनी बल्लेबाजी पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाए... लेकिन उन्हें इस बात का हमेशा संतोष रहेगा कि वह जब तक खेले, टीम के लिए हमेशा उपयोगी होने की कोशिश करते रहे...
मैदान के अंदर-बाहर उनका व्यवहार जैंटलमैन का बना रहा है... वह कभी किसी विवाद में नहीं पड़े, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि उनमें आक्रामकता नहीं थी... वह टीम इंडिया के सबसे जुझारू खिलाड़ियों में से एक रहे... आखिर तक हार नहीं मानने का जज़्बा उनमें कूट-कूटकर भरा था... बतौर कप्तान भी उन्होंने अपनी भूमिका ठीक-ठाक ढंग से निभाई...
वैसे दुनिया भर में क्रिकेट महज बल्लेबाजों का खेल बनकर रह गया है, ऐसे में टीम के गेंदबाजों को वह स्टारडम नहीं मिलता, जो बल्लेबाजों को तुरंत मिल जाता है... कुंबले इसी वजह से स्टारडम के मामले में तेंदुलकर, गांगुली, द्रविड़, सहवाग और धोनी से पीछे हों, लेकिन टीम इंडिया के लिए उनका योगदान इनमें से किसी से कम नहीं है... बहरहाल अब वह टीम के साथ नहीं होंगे, और उनके जाने के बाद एक शून्य दिखने लगा है... टीम इंडिया में उनकी जगह लेने वाला स्पिन गेंदबाज नहीं दिख रहा... हालांकि अमित मिश्रा, पीयूष चावला और मुरली कार्तिक जैसे नाम दिख रहे हैं, लेकिन इन सबको टेस्ट मुकाबलों में खुद को अभी काफी तपाना होगा... चैम्पियनों की जगह तो वैसे भी जल्दी नहीं भरती, और कुंबले सरीखे चैम्पियनों की जगह तो कभी भरी जा ही नहीं सकती, इसलिए भारतीय क्रिकेट में कुंबले हमेशा याद आते रहेंगे... अपने कई बिम्बों में - मूंछों वाले चश्मा लगाए गेंदबाज के रूप में, बिना चश्मे के मूछों वाले गेंदबाज के रूप में, फिर बिना चश्मे और बिना मूंछों वाले गेंदबाज के रूप में...
वैसे रंग-ढंग में ही नहीं, समय के साथ वह विकेट लेने में भी स्मार्ट होते गए... मेरे लिए भी क्रिकेट में दिलचस्पी उसी दौर में शुरू हुई थी, जब कुंबले का करियर शुरू हुआ था... कोई ऐसा मौका याद नहीं आ रहा है, जब कुंबले के बिना मेरे मन में टीम इंडिया की तस्वीर उभरी हो... अब टीम इंडिया उनके बिना कितनी सफल होती है, इसमें भी अपनी दिलचस्पी रहेगी, बहरहाल कुंबले की समझ का उपयोग भारतीय क्रिकेट अभी भी कर सकता है... अपने अनुशासन और प्रतिबद्धता के चलते वह एक कुशल क्रिकेट प्रशासक भी साबित हो सकते हैं... लेकिन इस बाबत कोई भी फैसला खुद कुंबले को ही करना होगा, जो फिलहाल अपने परिवार के साथ समय बिताना चाहेंगे... वैसे बतौर गेंदबाज अपने बेमिसाल प्रदर्शन के चलते भारतीय क्रिकेट में उनका मुकाम खास बना रहेगा...