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 IST 6,  2009  10:49 जनवरी Last Updated :
कॉलम
सदियों से सही पाठ पढ़ाता गुरु ग्रंथ साहिब
ब्रजमोहन सिंह
नई दिल्ली, मंगलवार, नवंबर 4, 2008
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सचखंड साहिब श्री हज़ूर साहिब महाराष्ट्र में इस हफ्ते लाखों का जनसैलाब इकट्ठा हुआ। श्री गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु की गद्दी पर बिराजे 300 साल हो गए। दरअसल यह दुनिया का ऐसा अनोखा धर्म ग्रंथ है, जिसे गुरु की पदवी दी गई है। पिछले 300 साल में इसकी पहुंच सिखों में ही नहीं, बाकी मज़हबों के लोगों में भी बढ़ी है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब को समूची मानव जाति का साझा ग्रंथ कहा जाता है, जिसे पढ़ने का अधिकार सभी धर्मों और जातियों के लोगों को हासिल है।

संत कबीर जुलाहा थे, नामदेव कपड़ों पर छपाई का काम करते थे, संत रविदास जूता सीते थे, त्रिलोचन एक ब्राह्मण थे, धन्ना खेतिहर थे, सूरदास अंधे थे, जयदेव हिन्दी कवि थे, बाबा शेख फरीद बड़े सूफी संत रहे हैं, जिनकी शान आज भी उसी तरह बरकरार है... अपने ज़माने के सारे नामी संतों और विचारकों की वाणी को गुरु ग्रंथ साहिब में तरजीह दी गई। यही एक वजह है कि इस ग्रंथ को लाखों गैर सिख भी उतनी ही श्रद्धा के साथ पलक-पांवड़ों पर बिठाते हैं।

ज़ाहिर है, गुरु ग्रंथ साहिब के सामने नतमस्तक होने के लिए आपका सिख होना ज़रूरी नहीं... आप अगर इस महान ग्रंथ के सामने मत्था टेकते हैं तो आप पूरे हिन्दुस्तान की साझी विरासत, साझी सोच को नमन करते हैं, जिसमें 30 संतों और 10 गुरुओं की वाणी का सार समाहित है। सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी गुरु की महिमा का बखान नहीं है, बल्कि ईश्वर के नाम का सिमरन करने, सार्वजनिक जीवन में शुचिता रखने, नैतिक मूल्यों को कायम रखने और जनसेवा करने का संदेश है।

गुरुद्वारे में जो शबद पाठ हम सुनते हैं, वह इतना सुरमयी इसलिए है, क्योंकि यह पूरी तरह से हिन्दुस्तानी संगीत के अलग-अलग सुरों में ढला हुआ है, और हरेक वेला के हिसाब से श्लोक पाठ भी होता है, जो पूरी तरह तय होता है। हरमंदिर साहिब में हम अक्सर रागी जत्थे को गाते देखते है, जो तीन-चार के समूह में होते है। हारमोनियम, तबला, सारंगी और रबाब के साथ मिलाकर ये लोग गुरबानी के श्लोकों को बहुत अच्छी तरह गाते हैं।

आध्यात्मिक दर्शन के अलावा सामाजिक परिदृश्य में भी गुरु ग्रंथ साहिब ऐसी रोशनी का काम करता है, जिसकी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है। आज सरबत का भला कोई नहीं सोचता, कोई भला कैसे किसी दीन-हीन को देखकर आंखें फेर सकता है।

"पर का बुरा ना राखउ चीत,"

तुम कउ दुख नहीं भाई मीत..."

दूसरे के दुख को देखकर दुखी होना और दूसरे के सुख को देखकर सुखी होना ही सच्ची मानवता है...

सिख धर्म का उदय उस वक्त हुआ था, जब हिन्दू धर्म के अंदर पाखंड चरम पर था। सूफी संत और दरवेश जगह-जगह जाकर सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहे थे। आज ऐसे नज़ारे आम हैं, जब हम बहुत-से गोरी चमड़ी वालों को भी केश, कंघा, कड़ा और कृपाण धारण किए देखते हैं।

अगर बात सिख समुदाय की आती है, तो ऐसे लोगों का अक्स सामने आता है, जिन्होंने मेहनत से पहचान बनाई है। आज हिन्दुस्तान का कोई ऐसा शहर नहीं, दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं, जहां सिख मौजूद नहीं। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में बताया गया है कि किस तरह मेहनत की कमाई खाकर जीना बेहतर है और स्वाभिमान सबसे बड़ा मंत्र है।

सबसे अच्छी बात - हमने कभी किसी सिख को हाथ फैलाते नहीं देखा...

ऐसा आत्मसम्मान किसी भी कौम के लिए सबसे बड़े फख्र की बात है। आज कनाडा का हालिया चुनाव हो या अमेरिका का, सिखों की भूमिका को कोई भी कम करके नहीं आंक सकता। एक-दूसरे की मदद करना सिख धर्म का संदेश है।

लेकिन भारत में ऐसे बहुत से राज्य हैं, जहां के नागरिक एक-दूसरे को नीच मानते हैं, जातिगत द्वेष बढ़ता जा रहा है, नेता हिंसा का तांडव करवा रहे हैं, हमारे नेता देश के भीतर कई देश बनाने के लिए आतुर दिख रहे हैं, सहनशीलता खत्म हो गई है, कोई किसी की मदद नहीं करना चाहता, बात-बात में हत्या, बात-बात में खून... इन परिस्थितियों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब एक मिसाल का काम कर सकता है...

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"पर का बुरा ना राखउ चीत,तुम कउ दुख नहीं भाई मीत..." इसका सही अर्थ है, " यदि आप दूसरे का बुरा अपने हृदय में न रखें तो मेरे मित्र आपको भी कभी दुःख नही ... पढ़ें
विवेक सिंह, vivrit@indiatimes.com, धर्मापुरी, तमिलनाडु
Good morning sir, I am glad very happy to read this essay about shri guru granth sahib ji. Congrats to the writer from me.
म्न्दीप सिह, mandeep2me@gmail.com, Bathinda
मै आपके लेख से बहुत प्र्भावित हुआ हूं| श्री गुरु ग़्रन्थ साहिब जी की बा्नी आजकल के समय में भी पूरी तरह प्रासंगिक है|
मन्दीप सिन्ह कोहली, mandeep.kohli@gmail.com, लन्दन
 
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