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 IST 6,  2009  00:12 जनवरी Last Updated :
कॉलम
इतिहास के झरोखे से बाबर
प्रदीप कुमार
नई दिल्ली, रविवार, नवंबर 16, 2008
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आत्मकथा कहने को तो किसी शख्सियत विशेष के जीवन की घटनाओं का लेखा-जोखा होता है पर अमूमन लिखने वाले इसमें अपने समय का इतिहास लिखते हैं। वे अपने जीवन के साथ-साथ इसमें तत्कालीन समाज और संस्कृति का जिक्र भी बखूबी करते हैं। आत्मकथाओं के जरिए व्यक्ति विशेष को समझने में भी काफी मदद मिलती है और उनकी शख्सियत के अनजाने रंगों का भी पता चलता है। मसलन, भारत में मुगलिया सल्तनत की स्थापना करने वाले बाबर को ही लें, जिसकी पहचान एक लड़ाका योद्धा की रही है लेकिन वह प्रकृति और कला का मर्मज्ञ भी था। यह एहसास बाबर की जीवनी सचित्र बाबरनामा को देखकर होता है। सचित्र बाबरनामा को सार्वजनिक तौर पर पहली बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में प्रदर्शित किया गया। हाल ही में आयोजित इंटरनेशनल सेंटर के कला उत्सव के दौरान इसका प्रदर्शन हुआ। चूंकि बाबरनामा बाबर की आत्मकथा है इसलिए बाबरनामा के चित्र उस दौर के इतिहास, समाज, संस्कृति के साथ-साथ बाबर की शख्सियत और मिजाज को भी रेखांकित करते हैं।

तैमूर और चंगेज के वंशज बाबर का जीवन बेहद संघर्ष और युद्ध के मैदानों में ही बीता। बाबर के पिता उमर शेख मिर्जा की मौत 1494 में कबूतरों को दाना खिलाते वक्त हवेली की छत से गिरकर जब हुई तब बाबर महज 11 साल का था। मध्य एशियाई राज्य फरगाना की गद्दी पर बाबर भले ही 11 साल की उम्र में बैठ गया हो लेकिन उसके लिए मुश्किलों का दौर शुरू हो गया था। आगे चलकर बाबर को मध्य एशिया छोड़ना पड़ा। काबुल के रास्ते उसने भारत का रुख किया। चार बार हारने के बाद आखिरकार अप्रैल, 1526 को उसने पानीपत के मैदान में इब्राहिम लोदी को हराकर भारत में मुगलवंश की नींव डाली। बाबरनामा इसी बादशाह जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर पादशाह काजी की जीवनी है, जिसमें 1494 से लेकर बाबर के अंतकाल सितंबर, 1529 तक का इतिहास दर्ज है। बाबर ने 1528 में खुद इसे अपनी डायरी या संस्मरणों के रूप में लिखा था।

बाबर ने अपनी जीवनी मातृभाषा तुर्की में लिखी थी। बाबर के पोते अकबर ने इस जीवनी का फारसी और संस्कृत में अनुवाद करवाया। अब्दुर्रहीम खान-ए-खानां ने इसका फारसी अनुवाद करके बाबर को सुनाया तो अकबर ने इसके आधार पर सचित्र बाबरनामा की कल्पना कर डाली। अकबर ज्यादा पढ़ लिख नहीं सका था, इसलिए उसने सचित्र बाबरनामा की कल्पना की। एक तस्वीरखाना खोलकर बाबर ने ईरान के दो मशहूर कलाकारों मीर सच्चीद अली और अब्द-अस-समद को हिंदुस्तान आने का निमंत्रण भेजा। इन दोनों कलाकारों ने स्थानीय चित्रकारों की मदद से बाबरनामा के अद्भुत चित्र बनवाए। 145 चित्रों वाला बाबरनामा 1598 में बना। कहा जाता है कि दौलत, भवानी, मंसूर, सूरदास, मिस्कीन, फारुख़ चोला और शंकर जैसे 47 कलाकारों की मदद से पांच सचित्र बाबरनामा तैयार किए गए। इनमें से एक प्रति नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में मौजूद है जबकि बाकी चार प्रति ब्रिटिश म्यूजियम लंदन, स्टेट म्यूजियम ऑफ ईस्टर्न कल्चर, मास्को और लंदन के ही विक्टोरियल और अल्बर्ट म्यूजियम में रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय संग्रहालय के पांडुलिपि विभाग के अध्यक्ष डॉ. नसीम अख्तर ने कपिला वात्सायन की सलाह पर बाबरनामा के कुल 145 चित्रों में से 87 चित्रों का चयन किया और उनके डिजिटल प्रिंट तैयार करके इनको कला उत्सव में प्रदर्शित किया। इन तस्वीरों को देखना इतिहास से रूबरू होने सरीखा है। बाबरनामा के प्रत्येक चित्र की खासियत यह है कि हरेक चित्र के बीच में, कभी उपर, कभी नीचे या कहें कैनवस के खाली पड़े हिस्सों में जहां जगह खाली बच रही हो, वहां फारसी में तस्वीर के बारे में जानकारी लिखी है। नसीम अख्तर ने इतिहासकारों की मदद से इन्हीं जानकारियों का अंग्रेजी तर्जुमा प्रत्येक तस्वीर के साथ लगाया है। इससे तत्कालीन इतिहास से बावस्ता हुआ जा सकता है। साथ में बाबर के मिजाज का भी पता चलता है। हालात ने बाबर को भले ही लड़ाका बना दिया हो लेकिन उसके अंदर भी एक सुरुचिपूर्ण कलाप्रेमी शख्सियत थी। इसलिए उसकी कई तस्वीरों में प्रकृति, जीव-जंतु और पक्षियों के दृश्य दिखाई पड़ते हैं। उसकी कई तस्वीरों का बैकग्राउंड बगीचा है। कहते हैं बाबर को बगीचों से लगाव था। इसलिए उसने मध्यएशिया में बाग-ए-वफा, शाह-आरा, बाग-ए-जालूखान, बाग-ए-महताब और बाग-ए-आइखाना जैसे बगीचे बनवाए थे। कई चित्रों में मोर-मुर्गी इत्यादि भी बगीचे में दिखाई देते हैं। बाबर ने बाबरनामा में लिखा है- 'मोर सुंदर रंगों वाला खूबसूरत पक्षी है जबकि मुर्गी में ना तो कोई रंग होता है और ना ही वो सुंदर होती है।'

बाबरनामा की एक तस्वीर है- जिसमें बाबर खुराशन के राजा मिर्जा बंधुओं के निमंत्रण पर खाने पर बैठा है। खाने के तमाम व्यंजनों के साथ इस आयोजन में पीने की भी सुविधा है। एक सेवक बड़ी सुराही से गिलास में मदिरा भर रहा है। कई हाथों में लिए थाल आसन तक पहुंच रहे हैं। खाने-पीने के साथ-साथ नाच-गाने का भी इंतजाम किया गया है। जो दर्शाता है कि उस दौर के राजे-महाराजों की दिलचस्पी संगीत और नृत्य में रही होगी। मखमली कालीन के उपर किसी बगीचे में यह आयोजन हो रहा है। चित्र को इतनी कलात्मकता के साथ बनाया गया है कि चांदी और सोने के बर्तन तो दिखते ही हैं, हर एक आदमी के चेहरे का भाव भी तस्वीरों में जीवंत दिखता है।

बाबरनामा के प्रत्येक चित्रों में चटक रंगों का इस्तेमाल बखूबी दिखता है। तबके दौर के राजा-महाराजों की संपन्नता भी चित्रों से जाहिर होती है। हालांकि, कई चित्रों में ऐसा मालूम पड़ता है कि कल्पना का सहारा लिया गया है। मसलन एक चित्र है, पानीपत की लड़ाई का। चित्रकार ने इसमें यह तो बखूबी दिखाया है कि कैसे बाबर की तोपों का मुकाबला इब्राहिम लोदी की सेना नहीं कर सकी। लेकिन कल्पनाशीलता के चलते चित्रकार ने युद्ध के मैदान के बैकग्राउंड को पर्वतीय इलाका बना दिया है, हालांकि पानीपत मैदानी इलाका था। इन चित्रों में बाबर की इमेज के कई शेड्स देखने को मिलते है। बिना दाढ़ी-मूंछ वाले बाबर के चित्र भी दिखते हैं। चूंकि बाबरनामा एक ऐसे बादशाह की जीवनी है जिसका अधिकांश समय युद्ध के मैदानों में ही बीता, इसलिए ज्यादातर चित्रों में लड़ाइयां ही दिखाई गई हैं। युद्ध में घोड़े, हाथी का उपयोग और तीर-धनुष के साथ बरछी-भालों और तोपों का इस्तेमाल दिखाया गया है। यह भी दीगर है कि भारत में पहली बार तोपों का इस्तेमाल बाबर ने ही किया था।

बाबरनामा को मुख्यत: तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला दौर 1494 में फरगाना के राजा बनने से लेकर 1503 तक का है। जब उसे अपना राज्य गंवाना पड़ा। दूसरा दौर, 1504 में काबुल का राजा बनने से लेकर 1525 तक का दौर है। 1526 में भारत का राजा बनने के बाद 1529 तक का अंतिम दौर है। बाबरनामा के चित्रों से इसकी झलक बखूबी मिलती है। यह चित्र उस दौर के हैं जब मुगलकालीन कला पर ईरानी और फारसी कलाओं का जबर्दस्त प्रभाव रहा है। दिलचस्प यह भी है कि बाबर के इन चित्रों को बनाने के लिए हिंदू और मुस्लिम कलाकारों ने मिलकर एकसाथ काम किया। चित्रों को देखकर मालूम होता है कि इन चित्रकारों में असीम धैर्य और अद्भुत कौशल तो होगा ही साथ में सहमति से एक निष्कर्ष तक पहुंचने की समझ भी होगी। बाबरनामा के चित्रों से मुगलकालीन कला की शुरुआती झलक मिलती है। बहरहाल, इस जीवंत इतिहास को आम लोगों तो पहुंचाने के लिए नसीम अख्तर और कपिला वात्सायन की कोशिशों की सराहना करनी होगी।
टिप्पणियां:
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Mughalkalin raja Babar ka kalaprem batata hai ki hamari virasat sahitya aur sanskriti bahut aage hai...
sanjay, sanjay001@gmail.com, delhi
अच्छा लेख है लेकिन यह तो बताया ही नहीं कि उसने अपनी आत्मकथा में श्री राम जन्मभूमि के विध्वन्स और उस जगह मस्जिद के निर्माण का कोई जिक्र किया है...या नहीं... पढ़ें
sunil shroff, shroffsunil1966@gmail.com, गाजियाबाद
This is nice reporting of painting exibition held at Delhi. Interested people will be benefited from this efforts made. I hope you will put up some ... पढ़ें
Mukesh Sharma, msbalak@yahoo.com, Ajmer
 
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