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 IST 6,  2009  12:09 जनवरी Last Updated :
फोकस
क्या हम भूल गए महारानी लक्ष्मीबाई को?
भाषा
वाराणसी, बृहस्पतिवार, नवंबर 20, 2008
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वाराणसी में अस्सी घाट पर देश की अन्यतम वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का बुरी तरह उपेक्षित जन्मस्थल स्थित है लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इस वीरांगना को भारतीय समाज ने सिर्फ वीर रस की उस कविता तक सीमित कर दिया है जिसमें सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा था, 'बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसीवाली रानी थी।'

इस महारानी का 19 नवंबर 1835 को वाराणसी में मोरोपंत तांबे के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म हुआ था और अपने जीवन के प्रथम नौ वर्ष उन्होंने वाराणसी में गंगा के किनारे की गलियों और मिट्टी में ही गुजारे थे।

वाराणसी स्थित इस वीरांगना की जन्मस्थली पर आज उत्तर प्रदेश सरकार के किसी मंत्री ने तो झांकने की जहमत नहीं ही उठाई। यहां के स्थानीय प्रशासन को भी शायद इस बात की याद नहीं आई कि आज के दिन इसी मिट्टी में देश की इस महान वीरांगना का जन्म हुआ था।

शायद यही कारण है कि महारानी लक्ष्मीबाई जन्म स्थान स्मारक समिति के वरिष्ठ सदस्य अशोक पांडेय ने कहा, 'आज प्रदेश सरकार सो रही है और कल जब मीडिया उसे याद दिलाएगा तो सभी लोग जन्मस्थली पर एकत्रित होंगे और बड़े-बड़े वादे करेंगे।

पांडेय ने कहा, 'मराठी अस्मिता और मराठी गौरव की बात करने वाले मनसे प्रधान राज ठाकरे को शायद महारानी लक्ष्मीबाई का खयाल नहीं आया। उन्हें इस वीरांगना की यहां स्थित जन्मस्थली के उद्धार के लिए कोई आंदोलन चलाने पर पूरी काशी नहीं समस्त देश का समर्थन हासिल होता।'

स्थानीय निवासी शेषमणि मिश्रा ने बड़े दुखी मन से कहा, 'उन्होंने पिछले चालीस वर्षों में महारानी लक्ष्मीबाई के इस जन्मस्थल के विकास या यहां कोई स्मारक बनाए जाने का कोई प्रयास नहीं देखा।'

उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि सरकारें तो लक्ष्मीबाई को भूल ही गईं जनता को भी उनके बारे में कुछ याद नहीं रहा।

महारानी लक्ष्मीबाई जन्मस्थान स्मारक समिति के दूसरे सदस्य मुनेश्वर नाथ मिश्र ने 19 नवंबर को महारानी के जन्म दिवस पर उनके जन्मस्थान पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद कहा, 'महारानी ने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी थी और उन्होंने उनके दांत इस प्रकार खट्टे किए कि झांसी पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1857-

58 में हुए युद्ध का नेतृत्व करने वाले अंग्रेज अधिकारी जनरल रोज ने स्वयं लिखा है कि भारतीय लड़ाकों में सबसे बहादुर और सबसे योग्य योद्धा महारानी लक्ष्मीबाई थी।

महारानी की जन्मस्थली की उपेक्षा के बारे में पूछे जाने पर स्थानीय प्रशासन के अधिकारियों ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वास्तव में इसके विकास और यहां स्मारक बनाए जाने के लिए अनेक बार धन स्वीकृत हुआ लेकिन उसे किसी न किसी कारण से क्रियान्वित नहीं किया जा सका।

हिंदी साहित्यकार कमलेश कुमार वर्मा ने बताया कि आजादी की लड़ाई के दौर में 1920 के दशक में सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी वीर रस की इस अमर रचना में महारानी के युद्ध कौशल और पराक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा था...

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी

बूढ़े भारत में भी आयी फिर से नयी जवानी थी

गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनीकहानी थी

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

उन्होंने बताया कि चौहान ने अंग्रेजों के दमन के शिकार भारतीय जनमानस और विशेष कर महिलाओं के सामने महारानी के वीरतापूर्ण चरित्र को उकेरते हुए अपनी पुस्तक मुकुल एवं अन्य कविताएं में आगे लिखा है...

दूर फिरंगियोंको करने की सबने मन में ठानी थी

चमक उठी सन सत्तावनकी वह तलवार पुरानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनीकहानी थी।

शायद यही कारण था की महारानी लक्ष्मीबाई की वीरता एवं बलिदान को देखते हुए नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जब आजाद हिंद फौज का गठन किया तो उसमें महिला यूनिट का नाम उन्होंने लक्ष्मीबाई रखा था।

इतिहास में दर्ज है कि जब भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी ने डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स के तहत झांसी के महाराज को अपनी संतान न होने पर झांसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने की घोषणा की तो झांसी के महाराज का देहांत हो जाने के कारण लक्ष्मीबाई ने ही अंग्रेजों की इस घोषणा का पुरजोर विरोध किया और कहा 'मी माझी झांसी नाही देनार' अर्थात 'मैं अपनी झांसी किसी भी हाल में नहीं दूंगी।'

महारानी की ओर बेबस नजरों से देख रही जनता को रानी के इस फैसले से इतना सुकून मिला कि उनके एक इशारे पर लोग अपना सर्वस्व बलिदान करने को घरों से बाहर निकल आए थे।

लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों का डट कर मुकाबला किया और चारों ओर से घिरने के बावजूद अकेली अपनी सेना के साथ दो हफ्ते तक ग्वालियर के किले की रक्षा करती रहीं। अंत में वह एक-एक सैनिक के राष्ट्र पर बलिदान हो जाने के बाद स्वयं वेष बदल कर कल्पी में मराठा राजा तांत्या टोपे के यहां चली गईं।

अंतत: स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम लड़ते हुए वह 18 जून 1858 को वीर गति को प्राप्त हो गईं लेकिन अपने प्रण के अनुकूल किसी भी हाल में अंग्रेजों के हाथ नहीं लगीं।

इतिहासकार बताते हैं कि अपने रण कौशल के चलते छोटी सी सेना लेकर ही उन्होंने अंग्रेजों का बुरा हाल किया था।

वाराणसी के भाजपा विधायक अजय राय ने कहा, 'प्रदेश एवं केन्द्र सरकार को इस वीरांगना की यहां स्थित जन्म भूमि पर यथाशीघ्र भव्य स्मारक का निर्माण करवाना चाहिए जिससे देश की आने वाली पीढ़ियां अपने गौरवशाली इतिहास को स्मरण कर सकें अन्यथा आज ऐसी वीरांगना को भूलने वाले राष्ट्र के आगे राष्ट्रीयता से जुड़ी अनेक बातों के भूल जाने का खतरा पैदा हो जाएगा।'
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Yaa, this is true that we have for got all these things but what if we made a statue and other things.
kk, kk@gmail.com, noida
To be frank and fair, by nature the men are doing these days what they are forced to do for any reason. Things which are pious in nature are not the first ... पढ़ें
Poonam Chand Mahanot, pmahanot@computerexchangeindia.com, Kolkata
रानी लक्ष्मीबाई और वाराणसी? बहुत से लोगों के लिए यह खबर ही होगी। मुझे भी अभी याद आया, बचपन में हिन्दी की किताब में एक पाठ था उसमें लिखा था। बहुत सीमित ... पढ़ें
विवेक , vivrit@indiatimes.com, धर्मापुरी, तमिलनाडु
 
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