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 IST 6,  2009  00:12 जनवरी Last Updated :
कॉलम
यहां सब बिकता है, खरीदोगे...?
वंदना वर्मा
नई दिल्ली, शुक्रवार, नवंबर 21, 2008
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टिकट खरीदो... वोट खरीदो... उम्मीदवार खरीदो... मुठ्ठी गर्म करो, कुछ भी खरीद लो... यहां सब कुछ बिकता है... यही राजनीति है... देश की फिक्र को मारो गोली... बिजनेस करो, एक लगाकर 10 कमाओ...

पैसे की ताकत का खेल तो 'टिकट की बिक्री' संग ही शुरू हो जाता है... कांग्रेस में एक खास रुतबा रखने वाली नेता मार्गरेट अल्वा ने पिछले दिनों कर्नाटक विधानसभा में टिकटों की बिक्री का आरोप लगाया... हुआ क्या...? मकवाना सरीखे नेता ने तो इस आरोप में सच्चाई बताई, लेकिन बाकी सबने इसे अल्वा के पुत्रप्रेम से वशीभूत (उनके बेटे को टिकट नहीं मिला था) बकवास बताया... नतीजा, अल्वा का इस्तीफा... फिर बारी बीजेपी की आई... राजस्थान की मुख्यमंत्री के सलाहकार और सांसद विश्वेंद्र ने भी यही आरोप लगाया... भाजपा ने इसे भी कोरा झूठ बताया... नतीजा, फिर एक इस्तीफा...

कांग्रेस और भाजपा ही नहीं, बसपा पर तो पहले से ही खुलेआम टिकट बेचने के इल्ज़ाम लग चुके हैं... इसमें कितनी सच्चाई है, यह बात तो बहन जी ही जानें... बहरहाल, हम मुद्दे पर आ जाते हैं... धनबल की महिमा सुनते-सुनाते हैं... पैसे का ज़ोर टिकट खरीदने पर ही खत्म नहीं होता... दरअसल यहां से शुरू होती है, असली नोटों की लुटाई... नहीं समझे... भई, चुनावी मौसम है... नेताजी वोट की खातिर लड़कियों के डांस से लेकर साईं संध्या तक का आयोजन प्रचारकों के माध्यम से करा डालते हैं, लाखों खर्च होते हैं... 'भूखे भजन न होय गोपाला' को ध्यान में रखते हुए पिज़्ज़ा, बर्गर, सैंडविच और समोसे उड़ाए जाते हैं... कह सकते हैं कि जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता, उनके पेट फास्ट फूड खिलाकर खराब किए जा रहे हैं... ढोल-नगाड़ों पर नृत्य कर जो मनोरंजन हो रहा है, सो अलग...

दिन में 'ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद' के नारे लग रहे हैं, रात को चिकन और दारू से गले तर हो रहे हैं... गरीबों की तो रात बारह बजे के बाद दिवाली मन रही है... नेता जी को उन्हें नोट से लेकर गिफ्ट तक देना पड़ता है, वरना मतदाता ऐसे ही पट जाते हैं क्या...!

फिर नेता जी की सवारी भी तो महंगी निकलती है... कोई इम्पोर्टेड जीप में, कोई भैंसे पर दिखता है, कोई पार्टी के झंडे लगी 50-60 कारों के साथ दिखाई दे रहा है, कोई मोटर साइकिलों के काफिले के साथ... इसमें फायदा उन प्रचारकों का भी होता है, जो कुछ देर काफिले के साथ सैर करते हैं, और फिर फ्री के पेट्रोल पर दिल्ली दर्शन कर डालते हैं... उस पर 200 से 300 रुपये एक दिन के प्रचार का लेते हैं, सो अलग... जी हां, आजकल यही रेट चल रहा है, भीड़ का... मजेदार बात यह है कि यहां महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं है... उनकी कमाई भी पुरुषों के बराबर ही हो रही है... नेता जी का खुद को तुलवाने का शौक भी एक बड़ा खर्चा है... कोई खुद को लड्डुओं में तुलवा रहा है, कोई टमाटर और प्याज से... उस पर बड़े कार्यकर्ताओं को हज़ारों की दक्षिणा चढ़ानी पड़ रही है, वह अलग... झंडे और पोस्टर जैसे छोटे-मोटे खर्चे तो चुनाव आयोग को दिखाने के लिए ही होते हैं...

बेशक, राजनीतिक दलों के बगैर लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं, पर क्या देश पर शासन करने वाले इन दलों का फर्ज़ नहीं कि देश को एक स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव दें... यहां तो राजनीतिक दल ऐसे चक्रव्यूह का गठन कर रहे हैं, जिसमें देश की जनता फंस रही है... जनता को इस अपराध का भागीदार कहने वालों की भी कमी नहीं है, लेकिन कोई पार्टियों से पूछे कि क्या राजनीतिक दल अपनी भूमिका ठीक से निभा रहे हैं... वह जनता को किन आदर्शों से शिक्षित करने का काम कर रहे हैं... यहां तो पार्टियां किसी भी मंच का इस्तेमाल विपक्ष की बुराई करने के लिए ही कर रही हैं, लेकिन आदर्शों की बात कहीं नहीं हो रही... जब कोई हादसा घट जाता है, तो बुराई करने के बाद उस मंच का इस्तेमाल जनता से 'धैर्य रखें' कहने के लिए किया जाता है...

कुछ भी हो, राजनातिक दलों को अपने उम्मीदवारों पर लगाम कसनी होगी... तभी गांधी और पटेल के सपनों के देश का निर्माण हो सकेगा... हमारे राजनीतिक दल एक प्राइवेट कंपनी की तरह, यानि कुछ खास लोगों की जागीर बनकर रह गए हैं... अगर दावों के मुताबिक यह समाज की ही प्रॉपर्टी होते तो इस तरह की चीज़ें कम होतीं... जैसे अमेरिका डेमोक्रेट और रिपब्लिकन पार्टियां हैं।

पार्टियों में परिपक्वता के अलावा चुनाव आयोग द्वारा भी नियमों में परिवर्तन कर उन्हें कड़ा बनाया जाना चाहिए, ताकि एक प्रत्याशी के लिए निश्चित की गई नौ लाख रुपये की खर्च सीमा का कड़ाई से पालन किया जाए, जो बढ़कर पांच से 10 करोड़ तक पहुंच जाता है...
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सचमुच राजनीति की परिभाषा अब बिल्कुल ही बदल गई है। सदैव ही जनता का विश्वासघात किया जाता है। चुनाव आयोग को पहल करना बेहद जरूरी हो गया है,यदि समय रहते इस ... पढ़ें
त्रियोगी नारायन पान्देय, triyogip@iolnetcom.com, मुम्बई
Rajniti ki burai sab kerte hai koi eske liye kuch kerta kyo nai.logo ko apni galti mannnee hogi.
सुमेध , sumedha1678@rediffmail.com, कअन्पुर
वन्दना जी, चुनाव आयोग को सभी राजनीतिक दलों को एक भी पैसा खर्च न करने पर पाबंद कर देना चाहिए।
एम.एस.बोह्र, msbohra62@yahoo.co.in, इन्दिआ
 
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