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 IST 22,  2009  00:32 नवंबर Last Updated :
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कसूरवार हम हैं, अच्युतानंदन नहीं...
विवेक रस्तोगी
नई दिल्ली, मंगलवार, दिसंबर 2, 2008
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शर्मिन्दगी महसूस हो रही है... क्या हमें वास्तव में अच्युतानंदन जैसे नेताओं की ज़रूरत है... क्या हमने वास्तव में अच्युतानंदन जैसे नेता पाने के लिए लोकतंत्र की व्यवस्था के बीच वोट दिया था... क्या अच्युतानंदन जैसे लोगों के नेता बन जाने में हम कहीं भी दोषी नहीं हैं... क्यों अच्युतानंदन जैसे नेताओं को बर्दाश्त करते रहना हमारी मजबूरी है...

एक आतंकवादी हमले के दौरान मुल्क की आन, बान और शान के साथ-साथ जनसाधारण की जान का बचाव करते हुए एक जांबाज़ जान से गया... आप उसके घर पर 'तथाकथित' रूप से श्रद्धांजलि अर्पित करने जाते हैं... वहां दुःख और गुस्से में भरे उसके पिता ने आपसे कुछ कहा, और शायद घर में प्रवेश नहीं करने दिया... आप बिफ़र जाते हैं, और बयान देते हैं - अगर वह शहीद मेजर का घर नहीं होता, तो वहां कोई कुत्ता भी नहीं जाता...

याद रखिएगा अच्युतानंदन जी, जिस घर को आप कुत्तों के जाने योग्य भी नहीं समझते, उसी घर के बेटे ने अपनी जान देकर देश की रक्षा की... शर्म आ जाती है, कि हमने न सिर्फ़ ऐसे व्यक्ति को अपना प्रतिनिधि चुना है, बल्कि ऐसे और भी लोगों को प्रतिनिधि के रूप में विधानसभा भेजा, जिन्होंने अच्युतानंदन जैसे शिष्टाचार से कोरे, शहादत का सम्मान करने में अक्षम व्यक्ति को सदन का नेता चुनकर हमारे सिर पर मुख्यमंत्री बनाकर बिठा दिया... यकीन मानिए, अच्युतानंदन से ज़्यादा यह हमारे लिए शर्मिंदा होने की बात है...

मैं अच्युतानंदन जी से सिर्फ़ एक सवाल करना चाहता हूं... आदरणीय मुख्यमंत्री जी, एक बार ठंडे दिमाग से सोचकर बताइएगा, मेजर के पिता ने आपके साथ ही ऐसा व्यवहार क्यों किया... अगर आप मुख्यमंत्री न होकर कोई साधारण व्यक्ति होते, तो शेष लोगों की ही तरह आपको भी उनके घर में प्रवेश मिला होता, और यह सब अवांछनीय घटित नहीं होता...

इस सवाल का जवाब है... जनता के प्रति आपकी निर्लिप्तता, जिसके कारण आप कभी आम लोगों को 'अपने' लगे ही नहीं... जनता के दिल में आपके प्रति गुस्सा, जिसकी जड़ में है कमज़ोर राजनैतिक व्यवस्था, जो संदीप जैसे जांबाज़ों की शहादत की वजह बनी... लेकिन आपके मुताबिक अगर ऐसा नहीं है तो हमारे कुछ सवालों के जवाब दीजिए...

- क्यों आप सारे काम छोड़कर पहले ही दिन मेजर संदीप के घर पर नहीं पहुंचे...?

- क्यों आप मेजर के पिता के दिल में मौजूद गुस्से को बर्दाश्त नहीं कर सके...?

- आपकी प्रतिक्रिया, जिसे दोहराते हुए भी शर्म आती है, को देखते हुए क्या आप अब भी कह सकेंगे कि आप श्रद्धांजलि अर्पित करने संदीप के घर गए थे, सिर्फ टीवी पर अपना चेहरा दिखाने नहीं...

खैर, अच्युतानंदन जी... इस वक्त आपके अलावा भी बहुत-से ऐसे नेता हैं, जो सिर्फ़ राजनीति चमकाने के लिए इस दारुण मौके का इस्तेमाल कर रहे हैं, और अफ़सोसनाक़ यह है कि कोई भी राजनैतिक दल ऐसे नेताओं के बिना अस्तित्व में नहीं है... अब उन्हें अपना प्रतिनिधि बना बैठने के लिए हमें ख़ुद को ही दोषी मानकर आगे के लिए रणनीति तैयार करनी होगी... सोचना होगा, कि क्या हम ऐसे ही नेताओं के भरोसे ख़ुद को छोड़कर चिंता-मुक्त हो पाएंगे...

और हां, एक आखिरी नसीहत अच्युतानंदन जी के लिए... आपका कहना है कि अगर वह शहीद का घर नहीं होता तो वहां कोई कुत्ता भी नहीं जाता, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आप मुख्यमंत्री नहीं होते, तो संदीप के घर पर आपके साथ ऐसा व्यवहार होता, जो लिखा भी न जा सके...

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वाकई कसूरवार हम लोग है जो इन जैसे नेताओं को चुनते है, जिनकी नजर में आम आदमी का कोई मूल्य नहीं है।
उमा, uma_nath23@rediffmail.com, आसनसोल
India ke sabh neta log ko pakistan bhej dena chahiye, pakistan ka bhi ye log who hall karwa dege jo india ka karwa rehe hai...
navinder jeet singh, navinder_jeet@yahoo.com, punjab
गलती किससे नहीं होती। अच्युतानंद के बारे में बहुत कुछ अच्छा भी है। ज़िन्दगी में की गई एक गलती कभी-कभी सारी कमाई लुटवा देती है। इनके साथ भी शायद यही हो ... पढ़ें
विवेक सिंह, vivrit@indiatimes.com, धर्मापुरी, तामिलनाडु
 
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