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 IST 23,  2009  00:56 नवंबर Last Updated :
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ऐसे पैदा होते हैं नेता...
धर्मेंद्र कुमार
नई दिल्ली, मंगलवार, मार्च 31, 2009
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देखते-देखते एक और नेता 'पैदा' हो गया। पैदा होना इसलिए, क्योंकि कुछ माह पहले तक इस 'नेता' के बारे में लिखे गए वेबपेज 'सर्वाधिक देखे गए वेबपेजों की सूची' से नदारद थे। लेकिन, अभी पिछले कई दिनों से पहली पांच खबरें इसी 'उदीयमान' नेता की हैं।

पने पत्रकारिता जीवन के शुरुआती दौर की एक घटना मुझे याद आ रही है...आगरा में आपराधिक गतिविधियों में लिप्त एक व्यक्ति की पुलिस थाने में पिटाई के बाद उसके फोटो अखबार में छपने के लिए आए हुए थे। उन्हें छपने के लिए चुन लिया गया। इस पर मेरे एक सहयोगी के मुख से त्वरित प्रतिक्रिया हुई, 'सर! फोटो छपते ही नेता बन जाएगा यह...'। ऐसा ही हुआ। मैं वहां अगले छह महीने और रहा और वह 'श्रीमान' एक अग्रणी राजनीतिक दल के एक बड़े नेता बन चुके थे। उनकी प्रेस विज्ञप्तियां लगातार छपने के लिए आ रही थीं। और हम... छाप रहे थे।

ऐसा क्यों होता है...ये सवाल है...कल तक वरुण गांधी अपना अस्तित्व ढूंढ़ रहे थे। हाथ-पैर मार रहे थे, लेकिन 'सफलता' कोसों दूर थी। आज वह खुश हैं और अपने साथियों से कह रहे हैं कि अब 'डिमांड' बढ़ गई है। आखिर जिम्मेदार कौन है...।

'जरूरत से ज्यादा की जाने वाली राजनीति' है, इसकी वजह। मानसिकता यह है कि अपने को आगे करने के लिए कुछ ऐसा बोला जाए जिस पर विरोधी प्रतिक्रिया किए बगैर न रह सकें। और मीडिया में मिले पूरा फुटेज! इसके लिए मीडिया को दोषी ठहराने वाले लोग भी कम नहीं हैं। जबकि मीडिया सिर्फ अपना काम कर रहा होता है।

आगरा में भी यही हुआ था, पीलीभीत में भी यही हुआ। आगरा में उस समय सभी मानवाधिकारवादी और राजनीतिक दल उस 'अपराधी' के पक्ष में आ खड़े हुए थे। सभी राजनीतिक दलों की कोशिश थी कि वह उनके दल से जुड़ जाए। उसके सामने ढेर सारे विकल्प थे। उसने अपने लिए 'एक' को चुना।

वरुण गांधी का मामला आपके सामने है। उन्होंने बरगलाया... कुछ लोग उनके बरगलाने में आए...मीडिया को खबरें छापनी पड़ीं...और  बन गए 'नेताजी'...। कितना आसान...!

जहां तक मीडिया का सवाल है। दो उदाहरण हैं। परमाणु करार पर उमर अब्दुल्ला संसद में दो मिनट बोले और देशभर के लोगों ने उनमें एक संभावित नेता तलाश लिया। वह भी सही मायनों में उसी दिन से 'नेता' बने। इससे पहले वह सिर्फ फारुख अब्दुल्ला के 'बेटे' थे।

इधर, वरुण गांधी भी दो मिनट ही बोले। और नेता बन गए... जेल में हैं...'नायकों' की तरह। और इसी तरह आएंगे बाहर...पूरे 'नेता' बनकर। मीडिया ने तो खबरें उमर की भी छापी और वरुण की भी छापनी हैं। दोनों ही नेताओं की खबरें 'सर्वाधिक देखे गए वेबपेजों की सूची' में शीर्ष पर रहीं।

तब आखिर ऐसा क्या किया जाए कि हम सभी बच जाएं इस तरह के नेताओं के पैदा करने के लिए जिम्मेदार होने के अपराधबोध से। कुछ नहीं...बस थोड़ी सी सावधानी बरतने की जरूरत है। जब भी ऐसा महसूस हो कि कोई हमें 'ठगने' की कोशिश कर रहा है, हम सतर्क हो जाएं। कोई भी ऐसी प्रतिक्रिया न दें जिससे 'उसके' द्वारा लगाई जा रही आग को हवा मिले। संयम रखें खुद पर। न गलत ठहराएं उसे न सही... बस करने दें उसे कोशिश...। यकीनन, थक जाएगा वह थोड़ी ही देर में...आग लगाते-लगाते...और ढूढ़ते-ढूढ़ते अपने लिए उपयुक्त राजनीतिक दल। और हम बच जाएंगे ऐसे ही एक और नेता को ढोने से...
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वरुण तुम सही हो। हर हिन्दुस्तानी तुम्हारे साथ है। तुम्हारा विरोध करने वाले देशद्रोही हैं।
तरुन, rtarun46@yahoo.com, लु्क्ख्न्नउ
आपका विचार जैसा कि अक्सर होता है, एकतरफा है।
प्रभत, prabhatnagar@yahoo.com, नयी दिल्ली
वरुण तुम आगे बढ़ो, हिन्दुस्तान तुम्हारे साथ है।
vaibhav anand, anandvaibhav5000@yahoo.com, BAREILLY
 
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