क्या सिर्फ चिदम्बरम से नाराज़ था जरनैल...?
राजीव मिश्रा
नई दिल्ली,
बुधवार,
अप्रैल 8,
2009
दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने गृहमंत्री पी चिदम्बरम पर जूता फेंककर 1984 के सिख दंगों पर हुई अब तक की कार्रवाई पर रोष व्यक्त किया... गलत है, बिल्कुल गलत है, मगर इसे भावनाओं का 'सही' प्रदर्शन बताया जा रहा है... भारत में कई लोगों ने इसका समर्थन किया तो कई ने इसे गलत ठहराया... अजीब बात यह है कि अपने व्यक्तित्व और छवि के विपरीत गृहमंत्री चिदम्बरम ऐसी घटना के 'शिकार' हुए...
पलानिअप्पन चिदम्बरम भारतीय लोकतंत्र के, और वर्तमान केंद्रीय राजनीति के कुछ गिने-चुने नेताओं में से एक हैं, जो अत्यंत कुशल, कर्तव्यनिष्ठ और सुलझे हुए माने जाते हैं... इसका परिचय उन्होंने उस वक्त भी दिया, जब उनके साथ यह शर्मनाक हरकत की गई... मौजूदा गृहमंत्री ने जूता फेंकने वाले पत्रकार को माफ करते हुए घटना को वहीं खत्म कर देने की बात कही और पत्रकारों से सवाल-जवाब का सिलसिला जारी रखने को कहा... इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी साबित किया कि देश की जनता उनके बारे में जो सोचती है, वह वैसे ही हैं... इसलिए, उनके साथ इस तरह की अभद्र घटना होना सिर्फ भर्त्सना के योग्य है...
हालांकि, घटना पर त्वरित टिप्पणी देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने जरनैल पर कानूनी कार्रवाई की बात कही और चेतावनी भी दे डाली कि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए... और पत्रकार बिरादरी ने भी साफ तौर पर जरनैल की इस हरकत की निन्दा की... लेकिन, सब के सब हतप्रभ थे और प्रतिक्रिया क्या दें, यह भी सोच पाने में असमर्थ... ऐसा इसलिए, क्योंकि जरनैल को जानने वालों के मुताबिक वह बेहद सुलझे हुए, शांत और कर्मठ व्यक्ति हैं... तथा मौके पर मौजूद पत्रकारों ने इस बात की भी तसदीक की कि जरनैल का इस तरह का कोई इरादा नहीं था...
तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि जरनैल जैसा व्यक्ति ऐसी हरकत कर बैठा, और ऐसा कदम उठाने को 'मजबूर' हुआ... प्रेस वार्ता में जरनैल ने साफ कहा, "आई प्रोटेस्ट..." क्या यह प्रोटेस्ट चिदम्बरम का था, या कांग्रेस पार्टी का... जी नहीं, जरनैल ने साफ कहा कि वह कांग्रेस विरोधी नहीं हैं, और चिदम्बरम के विरोध का सवाल ही नहीं उठता... तो फिर यह किसका विरोध किया गया...
अब विचार करते हैं उन सवालों पर, जिनके बाद यह हरकत हुई... सीबीआई पर केंद्र सरकार के कथित दबाव पर सवाल उठाया गया... सीबीआई ने एक दिन पूर्व कोर्ट में अपनी रिपोर्ट में सिख दंगों के एक आरोपी कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर को क्लीन चिट दे दी... कांग्रेस ने टाइटलर को लोकसभा चुनाव के लिए टिकट भी दिया... यानि, टाइटलर बेदाग मान लिए गए... यहां आप लोगों को यह बताना जरूरी है - चिदम्बरम ने बताया कि सीबीआई ने मात्र रिपोर्ट सौंपी है, आगे की कार्रवाई कोर्ट करेगी... हां, यह ज़रूर है कि कोर्ट का फैसला भी इस रिपोर्ट के आधार पर ही हो...
अब उस घाव के दर्द को जानने और समझने की ज़रूरत है, जो 1984 से उस समुदाय के सीने में नासूर बनता जा रहा है... हज़ारों आशियाने उजड़े, हज़ारों मासूमों का कत्ल हुआ और लाखों के सपने चूर-चूर हो गए... वर्षों-दशकों की जीतोड़ मेहनत से पटरी पर लाई गई ज़िन्दगियां तबाह हो गईं... कितने ही भोले-भालों की आंखें सपने देखना शुरू करने से पहले ही जबरन बंद कर दी गईं... कई दिन तक सुनाई दीं, शोर-शराबा, चीख-पुकार, आहें, और आखिरकार सिसकियां...
इसके बाद शुरू हुई जांच, जांच के बाद जांच, और फिर जांच... अब अंत में, सीबीआई जैसी संस्था की कार्रवाई भी आखिरकार शून्य की ओर ही बढ़ती दिखे... तो कैसा महसूस होगा... कहावत है - जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई... दूसरे का दर्द महसूस कर पाना सबके बस की बात नहीं होती... सिखों ने सिख-विरोधी दंगों की सही-निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों को सजा दिलवाने के लिए सब कुछ कर देखा, जो सभ्य तरीके कहला सकें... लेकिन दोषियों को अब तक सजा नहीं मिल सकी है, और भारतीय न्याय व्यवस्था इनके दर्द को जैसे ठेंगा दिखाती रही...
कौन नहीं जानता कि सरकार बदलते ही हमारे मुल्क में अधिकतर लोगों के लिए 'मत्था टेकने के स्थान' भी बदल जाते हैं... सरकारी अधिकारी भी नए 'आकाओं' के सुर में सुर मिलाने को मजबूर होते रहे हैं... गद्दी बचाने या नौकरी की शान बनाए रखने की खातिर न जाने कितने समझौते पर्दों के पीछे हो जाते हैं, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता... दरअसल, भारत में कई समस्याएं हमारी अपनी पैदा की हुई ही हैं... लाल फीताशाही, सरकारों के बदलने के साथ बदलते निष्ठा के मायने (कभी-कभी लोकतंत्र के मायने भी), देश के समग्र विकास के बजाए क्षेत्र विशेष, समाज विशेष, जाति विशेष पर केंद्रित राजनीति देश के सुरक्षित भविष्य पर हमेशा प्रश्नचिह्न लगाए रखेगी...
अब मतलब साफ है कि जरनैल भी कहीं न कहीं इस पूरी प्रक्रिया में विश्वास खो चुके हैं... नेताओं और सरकारों का 'इमोशनल अत्याचार' जारी है, मगर समाज के इन ठेकेदारों को यह भी समझना होगा कि एक समय तक ही जनता यह सब बर्दाश्त करती है... कहा जाता रहा है कि समाज में पिछड़े, आर्थिक रूप से कमज़ोर और अशिक्षित लोग ही असभ्य, अस्वीकार्य हरकतें करते हैं, किंतु अब शायद सीमाएं लांघी जा रही हैं... शिक्षित लोग शायद मजबूर हो रहे हैं... जरनैल का अचानक उभरा आक्रोश तो शायद यही संकेत दे रहा है... सो, यह अत्यंत आवश्यक हो चला है कि आम आदमी में सरकारी संस्थानों और अधिकारियों के प्रति विश्वास की बहाली की जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस प्रकार की घटनाओं को एक उदाहरण के रूप न देखें... और जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूता फेंकने वाले जैदी का पूरी दुनिया में नाम (बदनाम) हुआ, हमारे यहां जरनैल भी 'हीरो' न बना दिए जाएं...