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 IST 22,  2009  23:59 नवंबर Last Updated :
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नेताओं का अकेला एजेंडा...एक और बयान!
वंदना
नई दिल्ली, बुधवार, मई 6, 2009
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तीन दौर की चुनावी प्रक्रिया खत्म होने के बाद चौथे दौर का चुनाव प्रचार भी खत्म। हमें इंतजार था कि नेताओं के मुखारबिंद से देश के असल मुद्दों पर कुछ सुनने को मिलेगा लेकिन वही ढाक के तीन पात! एक दूसरे पर छींटाकशी के अलावा उनके एजेंडे में क्या है...हम में से बहुत नहीं समझ पा रहे हैं।

एक वक्त था जब चुनावों में मुद्दे हुआ करते थे। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा का 'गरीबी हटाओ', 1977 के चुनाव में इंदिरा हटाओ, 1980 के चुनाव में सरकार की स्थिरता, 1984 के चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर चली सहानुभूति लहर और 1989 के आम चुनावों में 'बोफोर्स और भ्रष्टाचार' राष्ट्रव्यापी मुद्दे बने थे। धीरे-धीरे मुद्दों की जगह ली बयानों ने...। मुद्दे अब भी हैं लेकिन ये सिर्फ घोषणापत्रों तक सीमित रह गए हैं। जब नेता जनता के बीच निकलते हैं तो उनके भाषण में ज्यादातर जगह दूसरों पर कीचड़ उछालने वाले 'कंटेंट' को दी जाती है।

चुनावों के दौरान इस बार नेता जनता से सीधी बातचीत करने के मौके को भुना नहीं पाए। जनता को और उनकी समस्याओं को समझकर उनसे रिश्ता बनाने के बजाय वरुण सरीखे नेता सांप्रदायिक भाषण देते दिखे। उनकी मां मेनका गांधी मायावती को मातृत्व का पाठ पढ़ाने में व्यस्त दिखीं। लालू जी वरुण पर रोड रोलर चलवा रहे थे और साथ ही वोट जुटाने की खातिर चुनाव प्रचार में उसी संप्रग की नीतियों की बुराइयां कर रहे थे जिसके साथ उन्होंने पिछले पांच साल बिताए हैं। राबड़ी ने बिहार के विकास की बातें करने के बजाय वोटरों को लुभाने के लिए नीतीश कुमार का साला (जद-यू नेता लल्लन सिंह) तक ढूंढ डाला। और भी कई रिश्ते कायम किए गए। मायावती ने पीएम बनने की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार लाल कृष्ण आडवाणी अपनी भावी नीतियों का उल्लेख करने के बजाय प्रधानमंत्री को 'कमजोर' बताने में ज्यादा व्यस्त दिखे। सोनिया और राहुल अपनी उपलब्धियों का बखान करते नहीं थके। मुलायम सिंह यादव का समय अपने को भावी गठजोड़ का किंगमेकर साबित करने में गुजरा।

भारत की कानून व्यवस्था कमजोर है। यहां इंसाफ के लिए लोग भटकते रह जाते हैं। क्या यह मुद्दा नहीं है। विकास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं... क्या यह समस्या नहीं। आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वालों को खाने को रोटी नहीं है। क्या यह भी समस्या नहीं है। लोगों की दूसरी परेशानियां भी...। देश को धर्म व जाति के नाम पर बांटने वालों ने दो रुपये किलो चावल देने की बात घोषणापत्र में लिखकर अपने कर्तव्य से मुक्ति पा ली। 26/11 के बाद उम्मीद की जा रही थी कि इन चुनावों में आतंकवाद मुद्दा बनेगा लेकिन वह भी बैनरों और पोस्टरों तक चिपका रह गया। देश में अलख जगाने के बजाय कुछ नेता राम मंदिर बनवाने की बात करते दिखे तो कुछ मस्जिद बनवाने के लिए ललकारते हुए। मगर भूल गए कि भूखे पेट भजन न होए गोपाला...।

देश के मतदाता आतंकवाद, महंगाई, छूटती नौकरी और विकास के नाम पर नेताओं के दो शब्द सुनने को तरस गए। लेकिन उन्हें मिले तो सिर्फ मजेदार, भड़काऊ और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले बयान.... धर्म के नाम पर देश को बांटने वाले बयान... बयान और सिर्फ बयान...और अंत में फिर एक बयान....।
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टिप्पणियां
ने्ता मुद्दा नहीं तय करते तो मीडिया को तो मुद्दा तय करना थाष मीडिया ने मुद्दे क्यों नहीं तय किया ? मीडिया केवल नेता लोगो को कवर करती रह गयी ओर अब नेता ... पढ़ें
राज किशोर राय, raj.rai@tatasteel.com, जमशेद पुर
Kurshi ke larai jari hai. PM pad chahiye chahe janta jaye bhar main.
shailandra singh, shailandra1959@gmail.com, badarpur
इन्होंने ही तो देश का ये हाल किया है,नहीं तो हिन्दुस्तानी सब से ज्यादा मेहनती हैं।
प्र्दीप हन्स, ekdoteen@gmail.com, भार्त
 
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