संप्रग में जश्न का माहौल है। लेकिन, सही मायनों में जीत उनकी नहीं, जनता की हुई है... और इस बार ही नहीं, आजादी के बाद से हर बार हम भारतीयों ने इसे सिद्ध किया है। देश की जनता कभी किसी के बरगलाने में नहीं आई। हर बार सही समय पर बिल्कुल सही फैसला लिया। शायद यही वजह है कि दुनियाभर में भारत को सबसे बड़ा और मजबूत लोकतंत्र माना जाता रहा है।
यह दीगर बात है कि देश के नेता जनता के फैसलों को अक्सर 'अप्रत्याशित' बताते रहे हैं। देश की आजादी के बाद पहले आम चुनावों से शुरुआत करें तो यह एकदम साफ हो जाता है। आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव में देश की जनता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस को सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंपी... उनके आजादी के संघर्ष का सही मूल्यांकन करते हुए।
पहले कार्यकाल के दौरान देश के नवनिर्माण में जुटे रहे नेहरू को देश के इन्हीं नागरिकों ने 1957 में अगले चुनाव के दौरान दूसरा मौका भी सौंपा... यही नतीजा 1962 में भी रहा...
इसके बाद 1962 में देश ने चीन के साथ हुए युद्ध की विभीषिका को झेला... इस घटना से जहां 'हिन्दी-चीनी भाई-भाई' की भावना को गहरी चोट पहुंची, वहीं नेहरू का स्वास्थ्य भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाया। 27 मई, 1964 को उनके निधन के बाद लालबहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध के बाद एक समझौता करने जाने पर 11 जनवरी, 1966 को उनकी ताशकंद में हुई मौत के बाद 1967 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर कामयाबी मिली और नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को देश की जनता ने पहली बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया...
1972 में पांचवें आम चुनाव के आते-आते दुनिया का नक्शा बदल चुका था। पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन चुका था और, इंदिरा गांधी को संसद में घोर विरोधियों द्वारा 'दुर्गा देवी का अवतार' तक कहा जा रहा था। जनता ने भी इस महत्वपूर्ण उपलब्धि को स्वीकारा और उनका साथ दिया। परिणाम... एक और कार्यकाल। इसी कार्यकाल में भारतीय जनमानस को समझ पाने में शायद पहली बार किसी नेता द्वारा एक 'राजनीतिक भूल' का बीज बोया गया। 25 जून, 1975 को इंदिरा द्वारा लगाए आपातकाल ने उनकी उपलब्धियों को धो डाला।
और, आपातकाल खत्म होते ही 1977 में हुए आम चुनाव में न केवल कांग्रेस हारी, बल्कि इंदिरा और उनके पुत्र संजय भी चुनाव हार गए...
भारतीय लोकतंत्र की इस सबसे बड़ी उठापटक के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, जो अपने अंतर्विरोधों के चलते पूरे तीन साल भी न चल पाई। मोरारजी देसाई, जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह जैसे तपे-तपाए नेता भी जब अच्छी सरकार नहीं दे पाए तो 1980 के आम चुनाव में जनता ने फिर उसी इंदिरा को दोबारा सत्ता सौंप दी।
करीब चार साल बाद 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी हत्या के बाद उठी देशभर में उठी सहानुभूति की लहर के चलते राजीव गांधी भारी जनसमर्थन के साथ प्रधानमंत्री बने... राजीव के कार्यकाल में उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार और बोफोर्स जैसे मामले खूब उछले, जिनसे आजिज आई जनता ने 1989 में विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह को मौका दे दिया। वीपी ने इन्हीं मुद्दों पर कांग्रेस का साथ छोड़ा था।
केन्द्र में एक बार फिर गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, लेकिन फिर उसी खींचातानी के चलते वह अच्छा विकल्प साबित नहीं हो पाए। इसी दौरान आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने जनता को बुरी तरह नाराज़ कर दिया। इसी दौरान सरकार को बाहर से समर्थन दे रही भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर का मुद्दा भी जमकर उछाला। लोगों ने अगले चुनावों में एक बार फिर राजीव के नेतृत्व वाली कांग्रेस को ही चुनना चाहा, लेकिन प्रचार के दौरान ही उनकी हत्या हो गई। परिणामस्वरूप पीवी नरसिंह राव कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री बने। उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार ने एक बार फिर जोर पकड़ा, लेकिन उनकी लगातार चुप्पी, जिसके लिए उन्हें 'मौनी बाबा' तक कहा गया, ने लोगों में गलत संदेश भेजा।
इसी दौरान हिन्दूवादी संगठनों द्वारा उकसाए जाने पर अयोध्या में बाबरी मस्जिद भी तोड़ दी गई। नतीजा राम लहर... 'मौन' से त्रस्त जनता ने एक और परिवर्तन किया... अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को चुनावों में बड़ी सफलता मिली, लेकिन इतनी बड़ी नहीं कि अपने बूते सरकार बना सकें। 'अछूत' भाजपा सदन में बहुमत के लिए जरूरी एक सीट नहीं जुटा पाई... नतीजा, 13 दिन में सरकार गिर गई। दो छोटे दलों के प्रधानमंत्री देखे गए, लेकिन विश्वासमत हारने के समय सदन में वाजपेयी के दिए भावविह्वल कर देने वाले भाषण को जनता भूल न पाई। इसी के चलते जनता ने 1998 में उन्हें एक और मौका दे ही दिया... इस बार भाजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। गठबंधन को जरूरी सीटें मिलीं और सरकार ने कार्यकाल पूरा किया।
अब अगला चुनाव हाईटेक रहा... 'इंडिया शाइनिंग' का नारा दिया गया, लेकिन जनता ने इस दौरान यह महसूस किया कि सरकार आम आदमी से दूर और उच्च-मध्यम तथा उच्च वर्ग की ओर ज्यादा झुकी हुई है। नतीजा एक और परिवर्तन... 2004 के चुनाव में कांग्रेस के बनाए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को उल्लेखनीय सफलता मिली और, वाम मोर्चे द्वारा बाहर से दिए गए समर्थन से मनमोहन सिंह की सरकार बनी... सरकार तो पांच साल चली, लेकिन वाम मोर्चे द्वारा परमाणु करार का विरोध और छोटे राजनीतिक दलों द्वारा अनावश्यक राजनीतिक 'ब्लैकमेलिंग' लोगों को पसंद नहीं आई।
चुनाव अभियान के दौरान जरूरी मुद्दों को उठाने के बजाए धार्मिक उग्रता फैलाने वाले भाषणों और छींटाकशी को भी लोगों ने पसंद नहीं किया। एक बार फिर भारतीय जनता ने अविस्मरणीय फैसला किया और, एक ऐसा परिणाम दिया, जिसकी उम्मीद खुद कांग्रेस को भी न थी।
अब सवाल यह है कि क्या नेता इस बात को समझकर जनता के सामने अच्छा प्रदर्शन करने की कोशिश करेंगे या फिर किसी न किसी झूठ के सहारे सिर्फ चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश करेंगे... उन्हें याद रखना होगा कि जनता की आदत है सही फैसला करने की, जिसे वे 'अप्रत्याशित' बताते हैं...