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SME
 IST 22,  2009  14:51 नवंबर Last Updated :
फीचर्ड ब्लॉग
बुढ़ापे को संवारो, भविष्य सुधर जाएगा...
राजीव मिश्रा
नई दिल्ली, रविवार, जून 21, 2009
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"देश का भविष्य सुधारना है तो बच्चों को सही दिशा दो, लेकिन देश और समाज को सुधारना है तो वो चाहे भविष्य हो या वर्तमान बुजुर्गों को सम्मान, प्यार, सुरक्षा और इन सबसे ज्यादा जरूरी बुढ़ापे में बेहतर इलाज की मुफ्त सुविधा दो।" बड़ा अटपटा से लगता है कि जहां सभी देश-विदेश के महान दार्शनिक इस विचारधारा के बिल्कुल उलट भविष्य सुधारने के लिए हमेशा नौनिहालों का भविष्य सुधारने की बात करते हैं वहीं बुढ़ापे और बुजुर्ग लोगों को सर्वोपरि रखने की बात की जाए...

सोच कुछ अलग है कि मगर देश की कई समस्याओं का समाधान इसमें निहित जान पड़ता है। विश्व बंधुत्व की बात करने वाले भारत में संस्कृति, लिंग भेद, अशिक्षा, कन्या भ्रूण हत्या, बेरोजगारी, जनसंख्या विस्फोट, ऊंच-नीच आदि तमाम सामाजिक बुराइयों का हल मात्र बुजुर्गों की सेवा में ही है।

तर्क है कि आखिर समाज में लिंग भेद क्यों है, वंश आगे बढ़ाने की बात की आढ़ लेकर कई लोग यह साबित करते हैं कि लड़के ही वंश चलाते हैं और ऐसा भी तो कहा जा सकता है कि वंश चलाने की बात कह कर मोक्ष हासिल करने की चाह कहीं मनुष्य को जीवन के अंतिम पड़ाव में जब मानव शरीर शिथिल हो जाता, जर्जर हो उठता है, शक्तिविहीन हो जाता है, तब सहारे की तलाश करता है।

जमीन पर पड़े किसी ऐसे ही पीड़ित मनुष्य को देख कहीं भीतर से उनकी आत्मा कभी न कभी सहम तो गई होगी कि कहीं बुढ़ापा ऐसा तो न होगा। पानी पिलाने को कोई न हो। जख्म पर फोहा लगाने वाले हाथ न हों। क्योंकि बेटी तो ससुराल चली जाएगी और बेटा-बहू, नाती-पोता ही अंतिम क्षणों में दर्द बांटने के लिए रहेंगे।

मरने से कोई नहीं डरता लेकिन मौत से पहले कई बार मरना कोई नहीं चाहता। सबक देखकर कहीं मस्तिष्क पर चोट लगती है कि काश कोई लड़का होता तो मेरा बुढ़ापा सुधर जाता। या यूं भी कह सकते हैं कि बुढ़ापे में तड़पना नहीं पड़ता। यह सत्य है कि खून-खून को पुकारता है। अंजान का बच्चा कीचड़ में सना हो तो एक महिला नाक सिकोड़ लेती है मगर अपना बच्चा हो तो मां का आंचल कम पड़ जाता है।

यही वजह है कि बेटी से ज्यादा जुआ बेटे पर खेलने की ख्वाहिश हर दंपति में होती है। बेटी को पराए घर जाना होता है। न भी जाए तो बेटी मां बनती हो तो ममता की बेड़ी कई बार उसे मजबूर कर देती है कि वह चाह कर भी ऐसे कदम नहीं उठा पाती जो वह शादी से पहले चाहती रही होगी।

दूसरी सबसे बड़ी बात, बुजुर्गों की सुरक्षा। तर्क है, यह शाश्वत है कि पुरुष का शरीर महिलाओं की तुलना में अधिक बलशाली होता है। इसलिए जब भी कहीं बल के सहयोग से किसी समस्या पर काबू पाना होता है तो बालकों पर नज़र टिकती है। भारतीय संस्कृति में श्रवण की कहानी सर्वविदित है कि बुढ़ापे में मां-बाप को लेकर वह उनकी अंतिम इच्छा को अपने दम पर पूरा करने का माद्दा रखता था।

कोई माने या न माने मगर वर्तमान परिदृष्य में यह सत्य के काफी करीब है कि महिलाओं को पुरुषों से कम महिलाओं से ही ज्यादा समस्या होती है। लगभग हर परिवार की यही कहानी होती है। यह कोई भी बहू बता देगी। सास-बहू की पूरी लड़ाई वर्चस्व या फिर कहें एक पुरुष (बेटा या पति) के इर्द-गिर्द घूमती है।

यही वजह है कि यदि हम बुढ़ापे पर ध्यान दें तो समाज की कई कुरीतियां अपनेआप ध्वस्त हो जाएंगी। समय की मांग है कि हम कुछ सामाजिक पहलुओं को समझें और बुढ़ापे को संवारने की बात करें ताकि भविष्य अपने आप ही सुधर जाए। एक संतुष्ट परिपक्व बुढ़ापा भविष्य की मजबूत नींव बना सकता है।
टिप्पणियां:
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टिप्पणियां
राजीव, दो नजरिये से इसे देखें. पहला के समाज या नेता क्या कर रहे हैं. दूसरा अपना परिवार कहाँ कट साथ दे रहा है. आप अगर ब्रिटिश के बात करें तो उनके ... पढ़ें
राकेश सिंह, raksingh@gmail.com, कोल्कता
आप की बात बिलकुल ठीक है कि बेटा ही वारिस होता है लेकिन आखिरी में जब वो सहारा नहीं देता तब उसी बेटी की याद आती है।
गणेश मार्गे , ganesh.marge@gmail.com, औरंगाबाद [महाराष्ट्र]
सही कहा राजीव जी, लेकिन बेटा बेटी की बात कर कुछ लोग फिर बात खराब कर रहे हैं। वास्तविक्ता से परे बात नहीं होनी चाहिए। इक्का दुक्का बातें समाज की सच्चाई ... पढ़ें
कुलवंत सिंह, kkulwantSingh1987@gmail.com, Amritsar
 
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