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 IST 22,  2009  14:05 नवंबर Last Updated :
भारत से
समलैंगिकता जायज! कहीं खुशी, कहीं विरोध...
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, जुलाई 2, 2009
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक ऐतिहासिक फैसले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)की धारा 377 को अवैध ठहराते हुए समलैंगिक संबंधों को वैध करार दिया है। उधर, न्यायालय के इस फैसले पर धर्मगुरुओं ने ऐतराज जताते हुए समलैंगिकता को समाज के लिए विघटनकारी बताया है।

न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद सुनाए फैसले में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस वक्तव्य का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि संविधान समलैंगिकों को भी अन्य नागरिकों की भांति समान अधिकार देता है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजीत प्रकाश शाह और न्यायमूर्ति एस मुरलीधर की खंडपीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि अगर आईपीसी की धारा 377 में संशोधन नहीं हुआ तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा, जो सभी नागरिकों को समान अवसर देने और कानून के समक्ष सभी के समान होने की बात कहता है।

न्यायालय ने पूर्व नेहरू के वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा, "समानता और मत भिन्नता संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार हैं।"

यह ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा कि धारा 377 में संशोधन किया जाना चाहिए और वयस्कों में सहमति से बनने वाले यौन संबंधों को वैध माना जाना चाहिए। सीधे शब्दों में कहा जाए तो इस फैसले के बाद पुलिस अब सहमति से बने समलैंगिक संबंधों के आरोप में किसी भी वयस्क को गिरफ्तार नहीं कर सकेगी।

इस मामले में याचिका दायर करने वाली नाज फाउंडेशन की वकील तृप्ति ने कहा, "अब यह स्पष्ट हो गया है कि वयस्कों के बीच सहमति से बना यौन संबंध अपराध नहीं होगा।"

न्यायालय के इस फैसले की राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) ने प्रसन्नता जाहिर की। नाको की महानिदेशक और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव सुजाता राव ने कहा, "यह एक सकारात्मक निर्णय है। हमें उन लोगों तक पहुंचने में आसानी होगी जो लोग समलैंगिक संबंधों में लिप्त हैं। इससे हमारे जन स्वास्थ्य तंत्र को सहायता मिलेगी।"

उधर, धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों ने न्यायालय के इस फैसले पर ऐतराज जताया है। 'केरल कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस' (केसीबीसी) ने कहा है कि वह देश में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दिए जाने का विरोध करेगी।

केसीबीसी के प्रवक्ता फादर स्टेफन अलाथारा ने कहा, "समलैंगिकता भारतीय संस्कृति के खिलाफ है। हम इसे कानूनी तौर पर मान्यता दिए जाने का विरोध करेंगे।" मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी समलैंगिक संबंधों को वैध ठहराने के फैसले पर ऐतराज जताते हुए समलैंगिकता को भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार दिया है।

सुन्नी धर्मगुरु मौलाना खालिद रशीद फिरंग महली ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा समलैंगिकता को कानूनी मान्यता देना अनुचित है। यह समाज के लिए बहुत घातक और नुकसानदेह है। उन्होंने कहा, "कोई भी धर्म समलैंगिकता को स्वीकार नहीं करता। इसे मान्यता देने से पूरी युवा पीढ़ी गर्त में चली जाएगी।"

शिया धर्मगुरु कल्बे जव्वाद ने कहा, "समलैंगिकता हमारे देश की संस्कृति के खिलाफ है। इसके लिए हमारे समाज में कोई गुंजाइश नहीं है। समलैंगिकता एक मानसिक विकृति है और इसे वैधानिक करने का मतलब है कि इस विकृति को आगे बढ़ाना है।" दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले पर हिन्दू संगठनों ने भी आपत्ति जताई है। उल्लेखनीय है कि धारा 377 के तहत देश में समलैंगिकता और अप्राकृतिक यौन संबंध को अपराध माना जाता है। यह कानून भारत में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान बनाया गया था।

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