शोपियां, बारामूला और लाल चौक...महीने भर से प्रदर्शनों की भड़कती आग कहां ले जा रही है कश्मीर को। राज्य में ऐतिहासिक चुनाव संपन्न हुए और एक नौजवान मुख्यमंत्री ने राज्य की सत्ता संभाली, 6 महीने से कोई बड़ी आतंकी घटना भी राज्य में नहीं हुई, फिर कश्मीर की अशांति को कैसे देखें?
क्या पुलिस समझ पा रही है इन प्रदर्शनों को? क्या कोई है जो इन प्रदर्शनों के बहाने कश्मीर की चिंगारी को फिर से भड़काना चाहता है? क्या कश्मीर फिर से उन रास्तों पर लौटता हुआ दिख रहा है, जहां से वह निकल कर आया है? यह हताशा है या लोगों की आकांक्षा।
हाल तक श्रीनगर से सैलानियों के पहुंचने की खबरें आ रही थीं। कश्मीर की घाटी बदल रही थी और देश भर से लोग पहुंच रहे थे, लेकिन शांति का यह भ्रम टूट गया, जब श्रीनगर की सड़कों पर प्रदशर्नकारी और पुलिस आपस में टकरा गए।
इस गुस्से की वजह यह थी कि जिम के लिए निकला साल का असरार अहमद घर ही नहीं लौटा। परिवारवालों ने 4 जुलाई को मामला दर्ज करा दिया, लेकिन असरार की लाश मिली और उसके बदन पर चोट के गहरे निशान पाए गए। पुलिस कहती है यह अपराधिक मामला है, लेकिन लोग कहते हैं कि पुलिस ने ही मारा है।
अचानक से घाटी में लोगों लापता होने और फिर उनके मारे जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं, जिन्हें लेकर हिंसक प्रदर्शन होने लगते हैं। पुलिस बेकसूर बताने की कोशिश करती है, लेकिन लोग पुलिस पर भरोसा नहीं कर पाते। एक मुश्किल हालात है घाटी में।
हर हिंसक प्रदर्शन के बाद घारा 144 लगाकर हालात पर काबू पाने की कोशिश की जाती है, लेकिन तब तक यह प्रदर्शन किसी और शहर में होने लगता है। इसकी शुरुआत हुई शोपियां से। दो महिलाओं की हत्या और बलात्कार के मामले पर पुलिस ने शुरू से ही गड़बड़ी की।
न्यायिक जांच में भी साफ हो गया कि पुलिस ने सबूतों से भी छेड़छाड़ की है। अब ऐसे में लोग यह शक क्यों न करें कि इस मामले में कहीं पुलिस का हाथ तो नहीं। किसी की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। पुलिस के पांच अफसर और दो डॉक्टर सस्पेंड हो चुके हैं, लेकिन अभी तक यह पता नहीं लगाया जा सका है कि आशिया और निलोफ़र को मारने वाले कौन थे।
29 मई को 17 साल की आयशा और उसकी 22 साल की भाभी नीलोफ़र ग़ायब हो गई। जब लाश मिली तो पुलिस ने कहा कि डूबने से मौत हुई है। चार दिन तक शोपियां में प्रदशर्न होते रहे लेकिन पुलिस के बड़े अधिकारी मौके से दूर ही रहे।
यह पूरा मामला सब इंस्पेक्टर से लेकर आईजी पुलिस और डिप्टी कमिश्नर स्तर के अफसरों की नाकामी का है। यह बात सामने नहीं आ पाती अगर चार दिनों के हंगामे के बाद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला न्यायिक जांच नहीं कराते। अब इस जांच में भी 15 दिन लग गए और तब तक पुलिस और शोपियां के प्रदशर्नकारी आपस में टकराते रहे।
न्यायिक जांच में बात साफ हो गई कि आशिया और निलोफर की हत्या बलात्कार के बाद की गई है। डूबने से मौत का दावा गलत है। न्यायिक जांच में कहा गया है कि अगर पुलिस इस मामले की गंभीरता को समझ कर ठीक से जांच करती तो लोगों का गुस्सा शांत हो सकता था।
देरी और लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि घाटी में कई जगहों पर बंद का ऐलान हो गया और जमकर हिंसा हुई। पुलिस से यह चूक क्यों हुई? क्या पुलिस अब भी उस नज़रिये का शिकार है कि हर मांग के पीछे कोई है। और इसी वजह से उसे अनदेखा कर दिया जाए।
अपनी ताकत पर भरोसे की बजाय अगर पुलिस लोगों पर भरोसा कर लेती तो, शोपियां इतने लंबे समय तक नहीं जलता। मामला सड़क से अदालत तक गया। लोगों का भरोसा हर स्तर पर टूटता चला गया। अलगाववादी चश्मे से देखे जाने की हद का ही नतीजा था कि कसूरवार पर नज़र ही नहीं गई।
अब हाईकोर्ट ने कहा कि आशिया और निलोफ़र के शव को कब्र से निकालकर पोस्टमार्टम किया जाना चाहिए।
आग शोपियां में लगी थी, लेकिन उसके धुएं से बारामूला जल गया। यहां भी प्रशासन एक जवान लड़की के अपहरण के मामले को ठीक से संभाल नहीं पाया। मामला 17 जून का था। बिन्नेर गांव के गुलाम अहमद ने रिपोर्ट लिखाई कि उसकी 15 साल की बेटी रेहाना को मेहराजुद्दीन मरज़ई ने अगवा कर लिया है। पुलिस ने अगवा करने में मदद के आरोप में एक शख्स को पकड़ लिया। इस शख्स की बीबी थाने पहुंची और बाद में स्थानीय टीवी चैनल को बुलाकर बदसलूकी का आरोप लगा दिया।
बस शोपियां से गुस्साए लोग बारामूला में भड़क उठे। मामला भड़का तो पुलिस और सीआरपीएफ की गोली से चार नौजवान मारे गए। अगस्त 2008 से अब तक इस तरह के प्रदर्शनों को रोकने के नतीजे में 10 नौजवान मारे जा चुके हैं।
बस इस गुस्से में स्थानीय लोगों के साथ राजनीतिक तत्व भी शामिल हो गए। प्रदर्शन तब भी खत्म नहीं हुआ, जब पुलिस ने रेहाना और मरज़ई को एक साथ बरामद कर लिया। नतीजा यह हुआ कि प्रदशर्नकारियों को रोकने के लिए सीआरपीएफ ने फिर गोली चला दी। एक नौजवान मारा गया।
सीआरपीएफ और पुलिस इस आरोप में उलझे कि दोनों एक दूसरे की मदद नहीं करते। मगर इसका जवाब ढूंढा जाना चाहिए कि प्रदशर्नकारियों को काबू में करने के लिए गोली क्यों चलाई जाती है। क्या रबर की गोली काम में नहीं लाई जा सकती थी।
जब मामले की मजिस्ट्रेट से जांच के आदेश दे दिए गए तब धार्मिक नेताओं के साथ साथ सरकार के मंत्री क्यों कूदे? क्या राजनेताओँ को भी प्रशासन पर भरोसा कम है। क्या अब भी अलगाववादी इस तरह की गलतियों का फायदा उठाने की ताक में बैठे हैं।
अगर इन प्रदर्शनों के पीछे साज़िश है, तो बारामूला में सीआरपीएफ इस जाल में फंस गई। गोली चलने से हुई चार लोगों की मौत के कारण पूरा प्रदशर्न सीआरपीएफ के खिलाफ हो गया। दबाव में आए उमर अब्दुल्ला ने बारामूला से सीआरपीएफ को हटा दिया, लेकिन हालात तब भी नहीं सुधरे, तो सीआरपीएफ को ही बुलाना पड़ा। इनकार करने पर सेना बुलाई गई। फिलहाल बारामूला कुछ शांत है।
घाटी में हो रहे इन प्रदर्शनों में राजनीतिक ताकत न होती तो, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बारामूला से सीआरपीएफ को जाने का आदेश न देते। बारामूला घाटी का पहला शहर है, जहां सीआरपीएफ तैनात नहीं है। उमर फंस गए हैं। शोपियां में पुलिस पर भरोसा कर लोगों को नज़रअंदाज़ करते हैं तो आंदोलन भड़क जाता है, लेकिन बारामूला में लोगों की मांग पर भरोसा कर सीआरपीएफ को चलता कर देते हैं, तब भी गुस्सा शांत नहीं होता।
सीआरपीएफ तो अब बारामूला में नहीं है, लेकिन हालत बिगड़ती देख सेना को सड़कों पर उतरना पड़ा। केंद्र ने भी इस बार सीआरपीएफ हटाने की उमर अबदुल्ला की बात मान ली। पिछले चार महीने में दूसरी बार लोगों के दबाव में सुरक्षाबलों को हटाया गया है।
मार्च में सोपोर के बोमई गांव में दो लोगों की हत्या के बाद वहां से आर्मी कैंप हटाया गया था। यहां दो लोगों की हत्या का आरोप राष्ट्रीय राइफल्स पर लगा था। अब बारामूला शांत दिख रहा है, लेकिन यहां से आग श्रीनगर जा चुकी है।
उमर अब्दुल्ला कश्मीर की नई उम्मीद की तरह देखे गए हैं। उमर अब्दुल्ला की कोशिश कश्मीर में बेहतर प्रशासन देने की रही है, लेकिन राजनीति कुछ और इम्तहान मानती है। सेना की मौजूदगी कम करने के लिए बेचैन उमर के लिए रास्ते इतने आसान नहीं हैं।
बारामूला से सीआरपीएफ तो हटा दी, लेकिन जब दूसरे शहरों से हटाने की मांग ज़ोर पकड़ी, तो उमर अब्दुल्ला की परेशानी बढ़ गई। सवाल है कि केंद्रीय बलों के बिना घाटी में हालात सामान्य रह पाएंगे। क्या ये वक्त सही है कि राज्य से केंद्रीय बलों को जाने दिया जाए, क्या राज्य पुलिस इतनी सक्षम है...उमर अब्दुल्ला की परेशानी जायज है। राज्य पुलिस की संख्या काफी कम है। सिर्फ संख्या ही नहीं आतंकवाद के ज़माने में पुलिस का व्यावहार भी अर्धसैनिक बलों जैसा हो गया है।
घाटी में इस समय केंद्रीय बलों की 75 कंपनियां हैं, जबकि पुलिस की सिर्फ 25 कंपनियां हैं। उमर समझ नहीं पा रहे कि 75 कंपनियों की कमी 25 कंपनियों से कैसे पूरी होगी। बेशक पिछले महीनों से आतंकी वारदात नहीं हुई हैं, लेकिन सेना की मानें तो अभी भी 6000 आतंकवादी घाटी में सक्रिय हैं। ज़ाहिर है बारामूला से सीआरपीएफ हटाने का फैसला तात्कालिक है न कि नीतिगत। कश्मीर में लोकतंत्र तो लौटा है, लेकिन आतंकवाद खत्म हो गया है यह कोई यकीन नहीं करना चाहता।
उधर, इस्लामाबाद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने कहा है कि पाकिस्तान ने अपनी तात्कालिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आतंकवादी पैदा किए और उन्हें पाला पोसा। उमर एक तरफ आतंकवाद तो दूसरी तरफ प्रशासन को भरोसेमंद बनाने की चुनौती से जूझ रहे हैं।
गृह मंत्रालय के सूत्रों की मानें, तो इन प्रदर्शनों के बहाने आतंकवादी अपनी पैठ बना रहे हैं। अचानक किसी का अगवा होना और मार दिया जाना, मामूली अपराध की घटनाएं हैं या किसी साज़िश का नतीजा। तब सवाल यह उठता है कि राज्य और सेना की साख खराब करने की कोशिशें तो पहले से होती रही हैं। सीमापार के योजनाकार लोगों के कंधे से बंदूकें चलाते रहे हैं। इस बार इतना हंगामा क्यों है...
केंद्र सरकार अब उन आंकड़ों को देख रही है कि इन प्रदर्शनों में सेना और सीआरपीएफ को किस तरह से निशाना बनाया जा रहा है। 6 महीने से घाटी में आतंकवाद की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार− सेना की 200 से ज्यादा गाड़ियां या तो जलाई गई हैं या फिर तोड़फोड़ की गई है। − तमाम प्रदशर्नों में सीआरपीएफ के 1200 जवान घायल हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सुरक्षा बलों बलों को सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर किया जा रहा है।
एनडीटीवी इंडिया ने आतंकवादियों की बातचीत के कई रिकार्ड देखें हैं, जिनसे पता चलता है कि सीमा पार के योजनाकार सुरक्षा बलों की छवि बिगाड़ना चाहते हैं। अब सवाल यह है कि कश्मीर मसले को लेकर सुरक्षा बलों की छवि पर आज से दाग नहीं लग रहे हैं।
अलगावादी पहले भी ऐसी कोशिश कर चुके हैं। हाल की घटनाओं से वे कौन से बड़े मकसद को पूरा करना चाहते हैं, समझना मुश्किल है। समझना यह भी मुश्किल है कि केंद्रीय मंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता भी क्यों सुरक्षा बलों के खिलाफ बोल रहे हैं। क्या वे इस वक्त लोगों के साथ खड़े होकर उन्हें किसी और तरफ जाने से रोकना चाहते हैं या वाकई सुरक्षा बल इस इम्तहान में फेल हो रहे हैं।
अगर आतंकवादियों की यह नई चाल है, तो फिर सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर राजनीतिक सहमति क्यों बनती दिख रही है। क्यों कांग्रेस के भी सांसद कहते हैं कि पूरे राज्य से सीआरपीएफ हटाने को लेकर केंद्र के विकल्प खुले हैं।
अभी तक जितने भी प्रदशर्न हुए हैं, उनमें लापता, हत्या और बलात्कार के ही मामले हैं। जहां कई मामलों में सुरक्षा बलों की चूक साफ दिखती है। क्या उन लोगों पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने हाल के चुनाव में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और अलगाववादियों को किनारे कर दिया। ऐसे में यह सवाल वाजिब है।
प्रशासन की गंभीर और मामूली नाकामियों का फायदा कौन उठा रहा है, इसका मकसद क्या है। आतंकवाद की नई हवा खड़ी करना या फिर कश्मीर के इस नौजवान मुख्यमंत्री के सामने मुसीबतें खड़ी करना, जो राज्य में विकास करना चाहता है।
अलगाववादी इस तरह के विरोध प्रदर्शनों से दो मकसद हासिल करने में कामयाब हो रहे हैं। एक तो सुरक्षा बलों की छवि बिगाड़कर केंद्र सरकार को दमनकारी साबित करना चाहते हैं और दूसरी तरफ सुरक्षा बलों में घुसपैठ करके अपने मंसूबे पूरे करना चाहते हैं।