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SME
 IST 23,  2009  13:18 नवंबर Last Updated :
फीचर्ड ब्लॉग
असली भूत देखें सिर्फ हमारे चैनल पर...
उमाशंकर सिंह
नई दिल्ली, बृहस्पतिवार, अगस्त 27, 2009
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प्यारे दर्शकों...

आजकल आप लोग न्यूज़ चैनलों को ख़ामख़्वाह भला-बुरा कहने में लगे हैं... आपको लगता है, हम जो भी करते हैं, हमारी मर्ज़ी से करते हैं... ऐसा नहीं है... बहुत कम्पीटीशन है... कितना है, चैनल चलाने वाले हमारे कुछ दोस्तों से पूछो, सभी फेस कर रहे हैं...

कुछ प्रॉपर्टी डीलरों से पैसा लेकर हमारे एक दोस्त ने एक 'न्यूज़ चैनल' खोला... सोचा, बिज़नेस में नया हाथ मारेंगे। पूंजी कम थी, सो, सुनसान इलाके में दफ्तर खोलना पड़ा। दोस्त ने बताया - एक रात को लाइव था, एंकर सवाल करती गई, कैमरे की तरफ से मेंढ़कों और झींगुरों की आवाज़ें आती रहीं... रिपोर्टर सेट पर नहीं पहुंचा था, एंकर को टॉक-बैक ठीक से नहीं मिल रहा था... उसे लगा, ऑडियो चैनल वन पर एम्बिएन्स आ रहा रहा है तो चैनल टू पर रिपोर्टर की भी कुछ न कुछ आवाज़ आ ही रही होगी... इसी गफलत में सब कुछ चलता रहा... ब्लैक फ्रेम दिखता रहा... दोस्त ने रिपोर्टर को सज़ा के तौर पर नौकरी से निकाल दिया... उसे लगा, इस तरह रिपोर्टिंग करेगा तो नए चैनल की तो भद ही पिट जाएगी...

पर उस हफ्ते की टीआरपी ने दोस्त की आंखें खोल दीं। उस रिपोर्टर-रहित लाइव ओबी के दौरान चैनल की टीआरपी 55 पार थी... (ज़्यादा लगे तो ठीक-ठीक लगा लेना) दोस्त ने उस रिपोर्टर को बाइज्ज़त वापस बुलाया... कहा, कुछ करने की ज़रुरत नहीं, सुनसान-श्मशानी इलाकों में घूमते रहो... जब तक कुछ न दिखे, रिपोर्ट फाइल करते रहो... भूतों की ऐशगाह, चुड़ैलों का डेरा... बिज़नेस चल निकला... एक दोस्त ने शुरू किया तो बाकी भी पीछे हो लिए... कम्पीटीशन बहुत ज़्यादा है...

कम्पीटीशन तो इतना बढ़ गया है कि दोस्त के भूत को दूसरे चैनल वाले ले उड़ रहे हैं... लाइनअप हमारे दोस्त का होता है, पर कैमरा किसी और का पहुंच जाता है... एक रिपोर्टर को तो हमारे दोस्त ने भूत की स्टोरी का ट्रांसफर दूसरे चैनल के कैमरापर्सन को देते हुए पकड़ा... निकाल बाहर किया... आजकल तो हमारा दोस्त अलसुबह ही ओबी वैन निकाल देता है... रिपोर्टरों से कहता है - जाओ, भूत ढूंढ़ो... लाइव करेंगे... जहां थोड़ा भी जंगल-झाड़, पुरानी हवेली टाइप चीज़ नजर आती है, 'मनोहर कहानियां' स्टाइल में शुरु हो जाने को कहता है...

पुराने किलों और हवेलियों पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) वालों की निगाह बेशक न पड़ी हो, हमारी पड़ गई है... एएसआई वालों को भी एक बार 'दिन में भूत' दिख गया... लेकिन परेशान होने की बजाए वे खुश थे... दोस्त को फोन किया, बोले - ख़बर दिखाने वाला कोई और चैनल पहुंच जाता तो कहता, एएसआई की कोताही देखो... ऐतिहासिक धरोहर को संजोकर नहीं रखा, ईंट-ईंट बिखर रही है... बाल की खाल निकालता... अच्छा हुआ, आपके रिपोर्टर आए, सिर्फ भूत पर फोकस किया... लेकिन आपको इतना इंटीरियर में जाने की क्या ज़रूरत थी, हमें बोल देते... लालकिला, कुतुब मीनार, पुराना किला, हुमायूं का मकबरा... कई जगह तो हमने वैसे भी अपने हाल पर छोड़ी हुई हैं कि खंडहर बन गई हैं... कुछ और कोताही कर देते तो आपको भूत-बेताल ही नहीं, प्रेत-पिशाच भी यहीं मिल जाते...

ख़ैर, अब डील हो गई है... वे हमारे दोस्त के चैनल के लिए भूत पैदा करेंगे... मुगलकाल के भूत, कुषाण काल और सातवाहन के ज़माने के भूत, मौर्यकाल और गोल्डन एरा यानि गुप्तकाल और मुगलकाल के भूत... साउथ इंडिया से रिपोर्टें फाइल होंगी - चोलों के काल के भूतों की, पल्लवों के काल के भूतों की... लेकिन ये सभी भूत आपको दिखाई न पड़ें तो मज़ाक न उड़ाइगा... जो दिख गया, वह भूत कैसा... आखिर भूत की सैन्क्टिटी भी तो बचाकर रखनी है हमें...

हमारा दोस्त तो अपने चैनल के लिए अपना पैनल तैयार कर रहा है... किस तरह के भूत पर किस तरह की श्मशानी शक्ति काम करेगी। कौन-सी चुड़ैल किस जोगन से भागेगी... रिसर्च चल रहा है... और हां, भागना दिखाना है तो पहले बुलाना पड़ेगा... पहले एक अच्छे गेस्ट के लिए मारामारी-मगज़मारी होती थी, अब अच्छी चुड़ैलों के लिए होगी... वह दिन दूर नहीं, जब एक ही चु़ड़ैल अलग-अलग कोट पहने कई स्टूडियो में दिखाई पड़ेगी... लेकिन दोस्त ने वादा किया है - हम सबसे पहले आपको दिखाएंगे, बिना एक भी पल गंवाए, बिल्कुल तेज़ी से... चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े...

मैं तो अपने मुंह से सिर्फ एक दोस्त की बड़ाई करता जा रहा हूं... पर, ईमानदारी से बताऊं तो आपके पास कई विकल्प मौजूद हैं... एक तरह के भूत से मन भर गया है तो बस रिमोट के एक बटन की दूरी पर दूसरा भूत मिल जाएगा... दबाने भर की देर है... भूतों के अलावा सांप का बिल भी मिलेगा और नाग-नागिन भी, और बाबा के चमत्कार भी... कहने का मतलब यह है कि किसी और न्यूज़ चैनल से कहीं बेहतर चींज़े अब भी अवेलेबल हैं, बिल्कुल लाइव... फिर किसी और का क्या औचित्य... इंतज़ार कैसा...

'तेरा भूत मेरे भूत से सफेद झूठ जैसा! असली भूत सिर्फ हमारे पास! बस देखते रहिए'

आपका ही

भूतख़बरी
 
विशेष नोट : यह आलेख लेखक के निजी विचार हैं, और एनडीटीवीख़बर.कॉम और एनडीटीवीसमूह का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है...
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उमाशंकर सिंह के इस ब्लॉग को पढ़कर मजा आ गया। ऑफिस में बैठे खुद हंसती रही, जब पड़ोस में ध्यान गया तो देखा कि पड़ोसी मुझे अकेले हंसती देख मुस्कुरा रहा है।
स्पर्धा, spardhamann@gmail.com, नोएडा
उमा जी यू आर ग्रेट. आपके चैनल से किसी का मुकाबला नहीं हो सकता।
संदीप पाण्डेय, sandip2003@hotmail.com, न्यू डेल्ही
वाह गुरु..आपने तो धो डाला...लेकिन आप भी सब्जेक्ट की नब्ज़ तक नहीं पहुँच पाए...दरअसल अब मामला भूतों तक सीमित नहीं रह गया है... भूत-प्रेत, चुडैल इत्यादि ... पढ़ें
उत्पल सिद्धार्थ , utpal.siddhartha@gmail.com, मुंबई
 
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