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 IST 10,  2010  01:56 फरवरी Last Updated :
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हरियाणा : कांग्रेसी मस्त, विपक्षी पस्त
ब्रजमोहन सिंह
सोमवार, सितंबर 7, 2009
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किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की सफलता के लिए बेहद ज़रूरी है कि वहां सत्तापक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी भूमिका मजबूती से निभाएं। सत्ताधारी पार्टी का ज़्यादा मजबूत हो जाना या विपक्ष का ज़्यादा कमज़ोर हो जाना समाज के हित में नहीं होता। इस लिहाज़ से एक संतुलन का होना ज़रूरी है, वरना सत्ता का गुरूर शासकों पर हावी हो जाता है। हरियाणा कांग्रेस में ज़रूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास है, वहीं विपक्षी पार्टियां बैसाखी के सहारे भी खड़ी नहीं हो पा रही हैं। सत्तालोलुपता के सामने सिद्धांतों की कोई अहमियत नहीं रह गई है।

यहां अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस सत्ता के मद में चूर अपनी उपलब्धियां गिनाने में लगी हुई है। जनता के पैसे से अख़बारों और टीवी में हरियाणा के नंबर-1 होने का जश्न मनाया गया। यहां सब कुछ वैसा ही लग रहा था, जब केन्द्र में एनडीए सरकार ज़मीनी हक़ीकत से बेख़बर 'इंडिया शाईनिंग' का हौवा खड़ा कर रही थी। शुक्र हो, चुनाव आयोग का, जिसने समय रहते चुनाव आचार संहिता लागू कर बाबू लोगों के हाथ-पैर बांध दिए। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा शायद पहले ऐसे मुख्यमंत्री नहीं होंगे, जिन्होंने कार्यवाहक होकर भी सरकारी धन के जरिये अपनी सरकार और पार्टी के लिए तर्कहीन तरीक़े से प्रचार किया... और, उपर से तुर्रा यह कि यह सब तब हो रहा था, जब प्रदेश का आधा हिस्सा सूखे से जूझ रहा था। हरियाणा के दक्षिणी इलाकों में किसान सूखे की मार से इस कदर परेशान हैं कि बहुत-सी जगहों पर किसानों ने अपनी धान की फसल को न बचा पाने की सूरत में उस पर ट्रैक्टर फेर दिए। किसानों की इस व्यथा पर किसी ने तवज्जो नहीं दी।

हुड्डा का पलटवार होगा कितना कारगर...?

राजनीतिक स्तर पर हु्ड्डा की चुनावी रणनीति सबको चौंकाने वाली थी। लोकसभा चुनाव में मिली सफलता के बाद हुड्डा सरकार ने विपक्ष को संभलने का मौका नहीं दिया। यहां तक कि केन्द्र में बैठे नेता भी सकते में थे। महंगाई के मसले से अभी तक केन्द्र निबट नहीं पाया है, और न ही आने वाले कुछ महीने में बहुत राहत मिलने के संकेत हैं। कई मायनों में यह बड़ा राजनीतिक जुआ था, लेकिन फ्रंट फुट पर आकर खेलने का माद्दा हुड्डा ने दिखाया।

अब उनके लिए यह दिखाना ज़रूरी होगा कि वह पूरे हरियाणा के नेता बन गए हैं। अक्सर हुड्डा पर आरोप लगते रहे हैं कि वह रोहतक के मुख्यमंत्री ज़्यादा हैं, हरियाणा के कम। क्योंकि ज़्यादा विकास रोहतक के आस-पास के इलाके में ही हुआ है, और हरियाणा के बाकी हिस्सों पर अपहरणकर्ता काबिज़ रहे हैं। चंडीगढ की तर्ज पर बने पंचकूला शहर पर तो यह ख़ासे मेहरबान रहे हैं। दिनदहाडे़ लूट और मार-पीट की घटनाओं से परेशान हो, यहां कोई अच्छा अफसर पोस्टिंग नहीं लेना चाहता।

तू नहीं और सही, और नहीं, और सही...

विपक्षी दल कुछ इस तरह व्यवहार कर रहें हैं, जैसे आजकल लोगों के बीच रिश्तों को लेकर गड़बड़झाला है। दिन किसी और के साथ, रात किसी और के साथ, और अगला दिन, फिर किसी और के साथ... जैसे इस शेर पर अमल करने के अलावा कुछ सही न हो - तू नहीं और सही, और नहीं, और सही... राजनीतिक मर्यादा नाम की चीज़ नहीं है, और बॉलीवुड का सीधा-सीधा असर यहां दिख रहा है।

हरियाणा में चुनाव से पहले ही विपक्षी पार्टियों को सांप सूंघ गया है। हर दिन यहां नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल रहे हैं। मुद्दों के अभाव में इनका भाईचारा बिखर जाता है। जैसे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) - इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) के बीच गठबंधन कुछ ही महीने में बिखर गया। पांच साल तक राज्य में सरकार चलाने के बावजूद अगर दोनों दलों के बीच आपसी विश्वास नहीं पनप सका, तो फिर ज़रूर कहा जा सकता है - इनके समझौते का आधार ही ग़लत रहा होगा।

क़समें हैं, वादे हैं...

भजनलाल की हरियाणा जनहित कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के ज़िक्र के बगैर यहां बात पूरी नहीं होगी। दोनों ही पार्टियों ने बड़ी शान से दिल्ली में समझौता किया था, लेकिन किसका हाथ ऊपर रहेगा, यह देखना भी ज़रूरी था। राज्य की 90 सीटों मे से 50 सीट हरियाणा जनहित कांग्रेस को मिले और 40 सीट बसपा को मिले, यह डील थी... लेकिन खबर यह मिलने लगी कि हरियाणा जनहित कांग्रेस चाह रही थी, बसपा कुछ सीटें भाजपा के लिए भी छोड़ दे।

भजनलाल के सुपुत्र कुलदीप बिश्नोई को यह तो समझना ही चाहिए था कि बसपा और भाजपा एक साथ कैसे चुनाव लड़ सकती हैं, हालांकि उनका इरादा बुरा नहीं था। आखिरकार भजनलाल ने सालों पहले छोटी पार्टियों की एक महापंचायत बनाने का शिगूफा छोड़ा था। अब बिश्नोई चाहते हैं कि भाजपा और हजका हाथ मिला लें... असंभव नहीं है यह संभावना... राजनीति है, कुछ भी हो सकता है।

उधर, 'ताऊ' ओमप्रकाश चौटाला ने तो वादों की पोटली खोल दी है। बिजली मुफ्त... पानी मुफ्त... सारे कर्ज़े माफ... बेरोज़गारी भत्ता बढ़ा दिया... लड़कियों को स्कूटर पर भी चढ़ा दिया... महिलाओं को गैस कनेक्शन और चूल्हे मुफ्त... फिर काम करने की ज़रूरत कहां रह गई...?

जनता लाचार नहीं है, लेकिन लाचारी इस बात की है कि विपक्ष के पास भी ठोस मुद्दे नहीं हैं। अगर विपक्ष को मुक़ाबला करना है तो कमर कसकर लड़ाई करनी पडे़गी, लेकिन इतना मानकर चलिए, जनता बहुत समझदार है, वह सब कुछ देख रही है। वादों के बाज़ार में सभी कूद पड़े हैं, लेकिन यह तो देख लीजिए, आपके वादे कोई खरीद भी रहा है या नहीं...?
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