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किसकी हिन्दी, कैसी हिन्दी...
प्रियदर्शन
नई दिल्ली,
शुक्रवार,
सितंबर 18,
2009
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अधिक्तम अक्षर -
हिन्दी दिवस पर होने वाले पाखंड-भरे समारोह जितने पुराने हैं, उनकी अधकचरी आलोचना भी उतनी ही पुरानी है। अक्सर इस आलोचना के कुछ जाने−पहचाने बिन्दु दिखते हैं... एक - क्लिष्ट हिन्दी का रोना, दूसरा - साहित्यकार संपादकों के दबदबे की दहशत, तीसरा - यह पुलक कि बाज़ार में हिन्दी खूब बिक रही है... हिन्दी फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता और इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी के दूसरे माध्यमों - मसलन मोबाइल या कम्प्यूटर - में हिन्दी की बढ़ रही गुंजाइश को इसके प्रमाण के तौर पर पेश किया जाता है।
लेकिन क्या हिन्दी का वास्तविक संकट बस यही है और क्या क्लिष्ट का आसान भाषा जैसा सरलीकरण अक्सर भाषा की मूल भूमिका और ज़रूरत की अनदेखी नहीं करता... हिन्दी की सबसे कामयाब फिल्मों में एक मुगल-ए-आज़म क्या सरल भाषा की फिल्म है या हिन्दी के सबसे कामयाब सीरियलों में एक महाभारत सरल हिन्दी की मिसाल है... दरअसल, भाषा सरल या जटिल नहीं होती, वह सहज या नकली ज़रूर हो सकती है। जो लोग अच्छी भाषा के नाम पर एक नकली भाषा लिखने की कोशिश करते हैं, वे खराब लेखक या पत्रकार होते हैं, लेकिन जो लोग सरल भाषा लिखने के नाम पर किसी विषय की जटिलता के साथ ही समझौता करते हैं, वे और ज्यादा खराब पत्रकार हो सकते हैं। क्रिकेट में स्लिप, गली या कवर पुल, कट ड्राइव ग्लांस जैसे शब्द कितने लोगों को समझ में आते हैं, फिर भी क्रिकेट की पत्रकारिता सहज ढंग से इन शब्दों का इस्तेमाल करती है और लोग भी सबसे ज्यादा क्रिकेट की ख़बरें पढ़ते हैं। इसी तरह आर्थिक मामलों में सीआरआर या जीडीपी या फिर कैश रिजर्व रेशो या ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट या फिर हिन्दी में सुरक्षित नगद अनुपात या सकल घरेलू उत्पाद जैसे शब्द आम लोग नहीं समझ पाते। फिर भी आर्थिक पत्रकारिता इन शब्दों का निषेध करके नहीं चल सकती। हम यह कोशिश कर सकते हैं कि किसी बात को सहज ढंग से पाठक को समझाएं, लेकिन इस कोशिश में विषय की अपनी ज़रूरत और संजीदगी को नष्ट नहीं कर सकते। फिर दोहराने की जरूरत है कि भाषा सरल या जटिल नहीं होती, शब्द प्रचलित या अप्रचलित ज़रूर होते हैं। अगर किसी शब्द का आप बार−बार इस्तेमाल करते हैं तो वह प्रचलित भी हो जाता है और इस हिसाब से सरल भी।
बहरहाल यह संकट हिन्दी पत्रकारिता या साहित्य का नहीं, पूरे समाज का है। इस समाज में भाषाएं अपना चरित्र खो रही हैं। दुनिया भर के भाषाविज्ञानियों की शिकायत है कि भाषाओं की मौलिकता मर रही है। अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, रूसी, हिन्दी सबका सिन्टैक्स यानी वाक्य विन्यास एक जैसा हुआ जा रहा है। सवाल कर सकते हैं कि इससे क्या फर्क पड़ता है, अगर दुनिया एक जैसे वाक्य लिखे तो अच्छा ही है। लोगों को चीजें आसानी से समझ में आएंगी, लेकिन यह इकहरा नज़रिया यह नहीं समझ पाता कि भाषा अलग से गढ़ी नहीं जाती, वह हमारे अनुभव संसार से, हमारी जीवन शैली से, हमारी आदतों से, हमारे तौर−तरीकों से, हमारी स्मृतियों से, हमारे संस्कारों से पैदा होती है। भाषा की विविधता ख़त्म होने का मतलब दुनिया की विविधता ख़त्म होना है। उसमें एक ऐसा इकहरापन पैदा करना है, जिसकी वजह से पहले एकाकीपन और फिर उचाटपन ही पैदा होगा। फाइव स्टार होटलों में सुविधाएं सारी मिल जाती हैं, लेकिन वे घर नहीं मिलते, जहां आकर आप सहज महसूस करते हैं। भाषा के फाइव स्टार मेन्यू आखिरकार समाज का हाजमा ही खराब करेंगे।
लेकिन सारी दुनिया में भाषा और संस्कृति के स्तर पर जो संकट दिख रहा है, हिन्दी का संकट उससे अलग है। इस संकट को समझना है तो भाषा की भाषावैज्ञानिक भूमिका से आगे जाकर उसकी राजनीतिक भूमिका को समझना होगा। दरअसल किसी देश की राजनीति ही तय करती है कि वहां कौन सी भाषा चलेगी। यही नहीं, मुल्कों की हैसियत से भी तय होता है कि उनकी भाषा चलेगी या नहीं। भारत में जब मुस्लिम शासकों का दौर रहा, फारसी मुख्य भाषा बनी रही। जब अंग्रेज आए, अंग्रेजी हो गई। रूस जब तक ताकतवर रहा, रूसी सीखने वालों की तादाद बहुत बड़ी रही। रूस के खिसकते ही लोग चीनी या जापानी से ज्यादा जुड़ने लगे। आज अगर अंग्रेजी फैल रही है तो इसलिए नहीं कि वह शेक्सपियर की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह बराक ओबामा यानी अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश की भाषा है।
हमारे देश में भी अंग्रेजी का प्रचलन इसलिए नहीं बढ़ रहा है कि वह सीखने में आसान है, बल्कि इसलिए बढ़ रहा है कि वह हुकूमत और हैसियत की भाषा है। इसी नाते उसमें बाज़ार है, रोज़गार है। इस फैलाव को समझना हो तो उसके लिए अखबारों नहीं, स्कूलों के आंकड़े देखने होंगे। इस देश में जिस तेजी से अंग्रेजी स्कूलों की तादाद और मांग बढ़ी है, वह बताती है कि देश का एक बड़ा तबका अंग्रेजी बोलने और अंग्रेजी की हैसियत से जुड़ने को बेताब है।
इस बेताबी में जिन्हें बाजार में हिन्दी का फैलाव दिखाई दे रहा है, वे बड़े भ्रम में जी रहे है। टीवी और फिल्मों में जो हिन्दी दिख रही है, वह अंग्रेजी अनुवाद की हिन्दी है। सिर्फ इस अर्थ में नहीं कि वह अंग्रेजी की कॉपी से अनूदित हो रही है... इस अर्थ में भी कि उसके पीछे जो सोच है, जो प्रेरणाएं हैं, जो विचार हैं, जो शोध है, जो सामग्री है, वह अंग्रेजी के संसार से आई है। यह अंग्रेजी जैसी हिन्दी है, जिसे दोयम दर्जे की हैसियत हासिल है। इस हिन्दी में क्या चलेगा, क्या लिखा जाएगा, यह अंग्रेजी के लोग तय करते हैं। इस हिन्दी की किस्मत का फैसला करने का हक अंग्रेजी का है। जो लोग इस बात से खुश हैं कि हिन्दी में बडी फिल्में बन रही हैं, टीवी चैनल आ रहे हैं, इंटरनेट दिख रहा है और हॉलीवुड भी आ रहा है, उन्हें शायद अहसास नहीं कि हिन्दी वालों के करीब आ रहा यह बाज़ार हिन्दी वालों को अंततः बस अपनी तरफ खींचने के लिए है। कुछ वैसे ही, जैसे भोजपुरी में स्पाइडरमैन डब होकर आता है या कई सतही फिल्मों का बाज़ार दिखता है।
दरअसल हिन्दी की आज की हालत कुछ वैसी ही है, जैसी दो दशक पहले तक बोलियों की थी। तब स्कूलों में हिन्दी पढाई जाती थी और घरों में मगही−मैथिली, ब्रज, अवधी बोली जाती थी। अब स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है और घरों में हिन्दी बोली जा रही है। जिन्हें हिन्दी के 100 साल का इतिहास भरोसा दिला रहा है, उन्हें याद करना चाहिए कि ब्रज और अवधी जैसी भाषाओं का इतिहास कई सदियों तक फैला रहा और उनमें सूर, तुलसी, कबीर जैसे बड़े कवि हुए। वे पहले भाषाएं कहलाती थीं, हिन्दी खड़ी बोली। लेकिन वे बोलियों में बदल गईं, हिन्दी भाषा हो गई। अब अंग्रेजी फिर हिन्दी को बोली के रूप में बदल और बचा रही है।
सवाल है हिन्दी क्यों बचे... क्या इसलिए कि उससे हमारा मोह है... क्या इसलिए कि वह इस देश की राष्ट्रभाषा है...
यहां फिर किसी समाज का किसी भाषा से रिश्ता समझने की जरूरत है। दरअसल सिर्फ समाज भाषा को नहीं बनाते, भाषा भी समाज को बनाती है। हिन्दी का संकट यह है कि उसने एक ऐसा समाज बनाया है, जो अपनी जड़ों से जुड़ा नहीं रहा। ब्रज, अवधी, मैथिली, मगही से नाक-भौं सिकोड़ती रही हिन्दी और अंग्रेजी जैसी होने की कोशिश करती रही। उर्दू से भी उसने वह सहोदर रिश्ता नहीं जोड़ा, जो उसे समाज के करीब लाता। ग़ालिब और मीर इस हिन्दी को पराये लगते रहे। जिन हिन्दीवालों ने ऐसी हिन्दी बनाई, वही अब इस हिन्दी से दूर भाग रहे हैं।
दरअसल यही वजह है कि आज जो हिन्दी बची हुई है, वह एक बोली की तरह बची हुई है। इसका एक संकट पत्रकारिता में भी दिखाई पड़ता है। हिन्दी के पत्रकार बौद्धिक उपक्रमों से घबरा रहे हैं। उन्हें शास्त्रीय संगीत बेतुका लगता है, आधुनिक कला अजूबा दिखती है, समकालीन साहित्य पंडितों का प्रलाप नजर आता है। वे पढ़ने-सुनने−गुनने से बचते हैं, साहित्य से डरते हैं। और ऐसे डरे हुए लोग जब पत्रकारिता करते हैं, उनका छिछलापन छिपाए नहीं छिपता। उनकी पत्रकारिता में न अपने समाज की समझ दिखती है, न उसके सरोकार।
बहरहाल क्या हिन्दी की कोई उम्मीद बची हुई दिखाई नहीं पड़ती... यह उम्मीद बाज़ार में नहीं, बाज़ार से कटे उस बहुत विराट समुदाय में दिखती है, जिसके लिए हिन्दी अब भी एक मजबूरी है। इस देश में लगभग एक तरह का नस्ली परायापन झेल रहे दलित और आदिवासी तबकों के पास फिलहाल कोई दूसरी भाषा नहीं है। यह तबका खुद को व्यक्त करने के तरीके भी सीख रहा है। अगर वह अंग्रेजी के कहर से बचा रहा और अपनी लडाई लड़ सका तो अपनी भाषा भी गढ़ेगा और अपना इंडिया नहीं भारत बनाएगा।
विशेष नोट :
यह आलेख लेखक के निजी विचार हैं, और एनडीटीवीख़बर.कॉम और एनडीटीवीसमूह का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है...
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