• Sign Up
  • |
  • Sign-In Sign Out
  • |
  • Make us your home
  • |
  • RSS
1 42 Video %>
1 52 News %>
1 57 Photo %>
1 64 Interactives %>
1 69 Leisure %>
1 74 Filmhai %>
1 80 Auto Guide %>
1 141 Dharm and Sahitya %>
1 81 Astro %>
1 179 Jobs %>
SME
 IST 22,  2009  14:40 नवंबर Last Updated :
फीचर्ड ब्लॉग
पंजाब में टूट रहा है हरित क्रांति का भ्रम
ब्रजमोहन सिंह
शुक्रवार, सितंबर 25, 2009
टिप्पणियां:
पढ़ें (0)
पंजाब में किसी भी राजमार्ग की यात्रा कर लें, आपको यकीन हो जाएगा कि जिस सूखे की बात राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में की जा रही है, उसका नामोनिशान नहीं है पंजाब में। पिछले दिनों मैंने चंडीगढ़ से बठिंडा तक का रास्ता सड़क मार्ग से तय किया, यही देखने के लिए कि वाकई पंजाब में सूखे का कितना असर पड़ा है। पटियाला, संगरूर, बरनाला और फरीदकोट के बहुत से हिस्सों में छोटे-बड़े और मंझोले किसानों से मिलकर ऐसा नहीं लगा कि पंजाब में किसान सूखे से बेहाल हैं और सूखे की वजह से आत्महत्या कर लेंगे। संगरूर के बहुत से हिस्सों मे किसानों ने बासमती धान भी लगाया है, जिसकी खुशबू अभी से महसूस की जा सकती है। कई जगह पर धान की कोपलें फूटने लगी हैं। यही हालत कमोबेश पूरे पंजाब की है। देर से हुई बारिश की वजह से फिलहाल पानी की कमी ख़त्म हो गई है। अगर फसल कामयाब होती है तो किसानों की मुसीबत बहुत हद तक खत्म हो जाएगी। छोटे किसान जिन्होंने कर्ज़ लेकर खेती की है, उनकी ज़िन्दगी पटरी पर लौट आएगी।

हरित क्रांति का दुखद पहलू

फसल अगर लहलहा रही है तो इसका मतलब यह कतई नहीं लगाना चाहिए कि पंजाब में किसान बहुत खुश हैं और यहां मानसून की अच्छी बारिश हुई है। दरअसल धान की इस फसल को किसानों ने अपने खून-पसीने से सींचा है। पंजाब में राज्य सरकार आठ घंटे की मुफ्त बिजली देती है, ताकि किसान फसल को बचा सकें और सूबे की खुशहाली बरकरार रहे। राज्य में कुल बजट प्रावधान का 30 फीसदी हिस्सा सिर्फ बिजली की खरीद और इसके वितरण पर ही खर्च होता है। पंजाब में 6841 मेगावाट बिजली पैदा होती है, लेकिन अभी जब धान की फसल खड़ी है, पंजाब को 9000 मेगावाट बिजली की दरकार है। इसके लिए सरकार को कभी-कभी 7-9 रुपये प्रति यूनिट कीमत अदा करके बिजली दूसरे ग्रिडों से खरीदनी होती है। यह सब इसलिए, ताकि पूरे देश का अनाज़ भंडार लबालब भरा रहे। किसानों की मेहनत और सरकार की दरियादिली से पंजाब की हरित क्रांति का सफ़र चल रहा है।

धरती सोना उगल रही है। धरती मां है, इसलिए हर साल कुछ न कुछ उम्मीद से बेहतर देती है। किसानों को निराश नहीं करती। लेकिन मां की ममता की झोली रीत रही है। बाहर की दुनिया के लिए पंजाब की कहानी किसी रुपहले पर्दे पर बिल्कुल रंगीली लगती है, लेकिन इस हरित क्रांति के गर्भ में पल रहे विरोधाभास को समझना भी बेहद ज़रूरी है।

पंजाब में मानसून की बरसात इस साल बहुत कम हुई। किसानों ने धान की खेती के लिए मानसून का इन्तज़ार नहीं किया। कमज़ोर मानसून की वजह से हुई कम बारिश की भरपाई के लिए किसानों ने 15 जून के बाद ही धान की रोपाई शुरू कर दी थी। फसल तो लगा ली गई, लेकिन इसने भूजल स्तर को और नीचे धकेल दिया। भूजल का इस्तेमाल यहां 80 फीसदी खेती के लिए किया गया।

अभी चेतो, नहीं तो धरती जाएगी सूख : नासा

नासा ने अपने हालिया अध्ययन में पाया है कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में ग्राउंड वाटर की स्थिति भयावह हो चुकी है। नासा के ग्रेस मिशन (Gravity Recovery And Climate Experiment) से जुड़े अनुसंधानकर्ता मानते हैं कि दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत में जलस्तर हर साल औसतन 1.6 इंच गिर रहा है। हैरत की बात है कि एक किलो चावल पैदा करने के लिए 3000-4000 लिटर पानी का इस्तेमाल करना पड़ता है।

पंजाब की अगर बात करें तो यहां हर क्षेत्र के 141 में से 100 प्रखंडों में जलस्तर 'अति शोषण ज़ोन' की सीमा कई साल पहले ही पार कर चुका है। इन प्रखंडों में 98 फीसदी भूजल का दोहन हो चुका है, जबकि ख़तरे की सीमा 80 फ़ीसदी जल निकालने के बाद पैदा हो चुकी थी। वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि अगर भूजल का दोहन इसी तरह बरकरार रहा तो 2015 तक ज़मीनी पानी ख़त्म हो जाएगा। खतरे की घंटी बज चुकी है, लेकिन हम कान बंद करके इसे अनसुना कर रहे हैं।

वोट के मोहजाल में फंसी पार्टियां

यहां सरकार किसानों को नाराज़ नहीं करना चाहती। खासकर शिरोमणि अकाली दल, जिसका वोट बैंक ग्रामीण पंजाब में है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, जिनका पूरा परिवार किसानी करता है, मुफ्त बिजली का मुद्दा इनके हाथों में किसी झुनझुने की तरह है।

भले ही बहुत से अकाली मंत्री अब कह रहे हैं - बस करो, मुफ़्त बिजली नहीं दी जा सकती, लेकिन बादल किसानों की राजनीति करते हैं, मुफ्त बिजली नहीं देना उनकी सरकार के हित में नहीं है। युवा वित्तमंत्री मनप्रीत खुद को एक ऐसा बॉक्सर बताते हैं, जिसको दस्ताने पहनाकर बॉक्सिंग रिंग में उतार दिया गया है, लेकिन दोनों हाथ बांध दिए गए है। जहां सुधार की बात करने की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। पंजाब ने 3160 करोड़ रुपये किसानों को दी जा रही बिजली की सब्सिडी पर खर्च किए हैं। पंजाब के ऊपर अलग-अलग एजेंसियों का कर्ज़ बढकर 63,000 करोड़ रुपये हो गया है। किसानों के ऊपर बैंकों और सूदखोरों की देनदारी 35,000 करोड़ रुपये है।

हज़ारों किसान पंजाब में खुदकुशी कर चुके हैं, सरकार मौत की वजह कुछ और बताती है। सुखी होने का भ्रम होना अलग बात है, लेकिन इस फेर में सच्चाई से मुंह मोड़ लेना खतरनाक है। हक़ीकत यह है कि पंजाब की खुशहाली के पीछे लाखों अप्रवासी लोगों का हाथ है, जो हर साल अपने रिश्तेदारों को अकूत दौलत भेजते रहते हैं। राज्य या केन्द्र सरकार को ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए, जो दीर्घकालिक हों... जिनसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का हित हो।
विशेष नोट : यह आलेख लेखक के निजी विचार हैं, और एनडीटीवीख़बर.कॉम और एनडीटीवीसमूह का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है...
टिप्पणियां:
पढ़ें (0)
खोजें
 
फोकस
मेघालय के राजभवन में लगभग 50 वर्ष पुराना लोहे का संदूक रहस्य का केंद्र बना हुआ है। कइयों ने इसे खोलने की कोशिश की लेकिन कोई भी सफल नहीं हो सका।