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 IST 22,  2009  14:14 नवंबर Last Updated :
फीचर्ड ब्लॉग
चीन ने पूछा, हिन्दुस्तानी क्यों नहीं बोलते हिन्दी...
हृदयेश जोशी
बीजिंग, बृहस्पतिवार, अक्टूबर 1, 2009
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चीन जब अपनी 60वीं वर्षगांठ की तैयारियों में डूबा था, मैं अपने साथियों को पीछे छोड़ चुपके से बीजिंग की सड़कों पर निकल गया... यह खोजने के लिए कि क्या हिन्दुस्तान के कुछ रंग यहां भी बिखरे हैं...

यह लीजिए, मुझे बहुत देर तक खोजना भी नहीं पड़ा... होटल से कुछ ही दूर पेकिंग विश्वविद्यालय में मेरी मुलाकात डॉ जियांग जिंकोई से हो गई, जो यहां हिन्दी सिखाते हैं... 42-साला डॉ जियांग से मिलकर उस ऊर्जा का बड़ी आसानी से एहसास हो गया, जो चीनियो को इतना जोशीला-फुर्तीला बनाए रखती है...

उन्होंने आज से लगभग 20 साल पहले हिन्दुस्तान में ही हिन्दी भाषा सीखी और महज़ दो छात्रों के साथ यहां पढ़ाना शुरू किया... आज उनके हिन्दी विभाग में 50 से अधिक लड़के-लड़कियां बड़े चाव से हिन्दी सीख रहे हैं...

हिन्दी की एक क्लास में ले जाते हुए डॉ जियांग ने कहा, “इन सब बच्चों ने अपने हिन्दुस्तानी नाम भी रख लिए हैं...” जब तक मैं कुछ समझ पाता, एक बच्चे ने खड़े होकर कहा, “मेरा नाम सुनील है...” और उसके बाद मैं कई चीनी बच्चों से मिला, और उनके हिन्दुस्तानी नाम सुने...

इसी बीच एक और आवाज़ सुनाई दी, “मैंने भी अपना हिन्दी नाम रखा है, चेतना...” मैंने पलटकर देखा, तो उसी विश्वविद्यालय की 27 साल की हिन्दी टीचर यांग सुई खड़ी थीं... फिर डॉ जियांग ने मुझे समझाया कि हिन्दी नाम रखने का फायदा यह है कि ये लोग इस भाषा से अधिक जुड़ाव महसूस करने लगते हैं और सीखने की रफ्तार बढ़ जाती है...

इसके बाद बच्चे फिर हिन्दी की पढ़ाई में लग जाते हैं और मैं डॉ जियांग के साथ विश्वविद्यालय घूमने निकल जाता हूं... कुछ ही देर में मेरी मुलाकात होती है चार महीने से यहीं रह रहे प्रोफेसर देवन्द्र शुक्ला से, जो दिल्ली से बीजिंग आए हैं... डॉ जियांग ने उन्हें छात्रों को यह समझाने की जिम्मेदारी सौंपी है कि हिन्दी सीखना इस बदलती दुनिया में क्यों ज़रूरी है...

मुझे तुरंत एहसास हो गया कि चीन कितनी अच्छी तरह जानता है कि बदलती दुनिया में भारत के समाज और उसके बाज़ार की क्या जगह है... ये दोनों पड़ोसी एक-दूसरे से प्यार करें या नफरत, लेकिन दोनों को साथ-साथ ही रहना है और होड़ भी करनी है...

फिर मैंने जाते-जाते पूछा, “क्या आपको इन्हें हिन्दी सिखाते हुए कोई दिक्कत भी पेश आई, डॉ जियांग...?”

डॉ जियांग ने गंभीर चेहरे के साथ मेरी तरफ देखा, और कहा, “हां, ये बच्चे अक्सर पूछते हैं कि हिन्दुस्तानी खुद आपस में हिन्दी में बात क्यों नहीं करते...?” इतना कहकर डॉ जियांग ज़ोर से ठहाका लगाकर हंसे, जैसे मुझे दिलासा देने के लिए बात को हंसी में उड़ा रहे हों... क्या करता मैं, सोचता रह गया...
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दोस्त आप डॉ जियांग जिनकी को नहीं जानते हैं उनका ये मतलब नहीं था। वह भारत से बहुत प्यार करते हैं और इसे अपना दूसरा घर कहते हैं। इस बात को लिख कर मैं सिर्फ ... पढ़ें
hridayesh joshi , hriday@ndtv.com, न्यू delhi
आप इतने सुलझे पत्रकार होकर भी जवाब नहीं दे पाये...कहना था न कि हमारे यहां के लोग दंभी नहीं हैं और हमारी संस्कृति प्रगति और पुरातन का बेमिसाल जोड़ है, ... पढ़ें
निशांत प्रतिहस्त, pratihasta@gmail.com, दिल्ली
एक चीनी बन्दे द्वारा किया गया कटाक्ष आज हर एक भारतीय के दिल को चोट पहुचाता है।
अभिषेक खरे , abhishek.khareindia@gmail.com, डेल्ही
 
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