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 IST 22,  2009  14:14 नवंबर Last Updated :
फीचर्ड ब्लॉग
चांद...चांद... कितना पानी!
प्रियदर्शन
नई दिल्ली, सोमवार, अक्टूबर 12, 2009
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चांद पर पानी अभी मिला नहीं है, पानी के प्रमाण मिले हैं। फिलहाल ये प्रमाण बता रहे हैं कि पूरे चांद को निचोड़कर शायद हम एक झील भर पानी जमा कर सकें।

इसमें शक नहीं कि यह वैज्ञानिक उपलब्धि भी छोटी नहीं। इस उपलब्धि के साथ जो चांद अब तक उजाड़ और सूखा लग रहा था, अचानक वह कुछ भीगा−भीगा लगने लगा है। विज्ञान के नजरिए से देखें तो धरती के बाहर जल और फिर जीवन की तलाश की एक रोमानी सी कल्पना पहली बार इस उपलब्धि के साथ नए पंख हासिल करती है।

लेकिन विज्ञान को जादू की तरह देखने और पेश करने की हमारी फितरत ने कुछ ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब चांद पर बस्तियां बसेंगी और सैलानी जाएंगे। वहां जादू की तरह दिखा पानी अब धरती का संकट हर लेगा।

काश कि ऐसा हो! चांद में और चांद के पार भी पानी के और सोते मिलें और धरती जलो नहाए। लेकिन क्या धरती पर जल की कमी है? जो सैकड़ों नदियों अलग−अलग गांवों, शहरों और मुल्कों के आरपार बहती अंत में किसी समंदर में तिरोहित हो जाती हैं, वे भी इतना पानी तो उलीचती हैं, जिनसे हमारे खेत सींच जाते हैं, हमारे कंठ तृप्त हो जाते हैं।

दरअसल धरती का तीन-चौथाई हिस्सा पानी से भरा है। जिन सात समंदरों से घिरे हमारे महाद्वीप बनते हैं, वे जब चाहें इस पूरी धरती को लील लें। मगर यह पानी हमारे किसी काम का नहीं। कम से कम पीने लायक तो नहीं, क्योंकि यह खारा है। क्या विज्ञान इस पानी को मीठा नहीं बना सकता? अक्सर अपने जल संकट का एक हल यह भी सुझाया जाता है, लेकिन यह मिठास फिलहाल इतनी महंगी पड़ती है कि इसका बोझ उठाना आसान नहीं।

सवाल यहीं से खड़ा होता है। जब अपने पास बह रहे समंदर का पानी हम पीने लायक नहीं बना सकते, तो चांद की मिट्टी से ऐसा कौन सा अमृत निकलेगा, जिससे हमारे सारे घड़े भर जाएंगे? चांद पर अभी जो मिल रहा है, वह ठेठ धरती वाला पानी नहीं है। पानी के गुणों को समेटे एक परत है, जिसमें पानी की उम्मीद छुपी है। उसे पीने लायक बनाने का संयंत्र कितना महंगा पड़ेगा और धरती और आकाश के बीच वह पाइप कैसे लगाई जाएगी, जिससे वह पानी हमारे जलाशयों तक आ जाए, इस सवाल पर किसी ने विचार तक नहीं किया है।

दरअसल यह सवाल अभी विचार करने योग्य है ही नहीं। चांद पर पानी मिलने का मतलब एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि है, जिसका वास्ता चांद की प्रकृति को ठीक से समझने से है। चांद में अगर पानी की परत है, तो क्या उसमें कोई जीवाणु भी होगा? क्या वहां अमीबा और हाइड्रा सरीखी जैविक उपस्थितियां होंगी? ये सवाल असल में इस धरती के बाहर जीवन की संभावनाओं की ठोस तलाश का हिस्सा हैं और चांद पर पानी की खोज इस दिशा में एक बड़ी छलांग है।

इस बड़ी छलांग को उसके सही परिप्रेक्ष्य में देखें, तो हम इस वैज्ञानिक उपलब्धि का सही मतलब भी समझ सकेंगे और अपनी सामाजिक जरूरत की प्राथमिकताएं भी। जिस वक्त देश के वैज्ञानिक यह दावा कर रहे थे कि चांद पर पानी सबसे पहले− नासा से भी पहले− उन्होंने देखा है, उस वक्त पानी की तलाश में हमारे गांवों−देहातों की औरतें मीलों का सफर तय कर रही होंगी।

किसी समाज में विज्ञान और जीवन के बीच इतनी फांक हो, तो समझना चाहिए कि कोई असंतुलन इतना बड़ा है, जिसे दुरुस्त करने की ज़रूरत है। चांद पर पानी की ख़बर सुनकर थिरक पड़ने की प्रवृत्ति दरअसल इसी असंतुलन का एक और प्रमाण है।

इसी असंतुलन का नतीजा है कि हम चांद पर पानी खोजने तो जा रहे हैं, लेकिन अपनी रेतीली और बंजर होती ज़मीन को बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। क्योंकि जो लोग इस देश में विज्ञान की, वित्त की या राजनीतिक निणर्यों की प्राथमिकताएं तय करते हैं, वे इस बढ़ रहे ऊसर से बहुत ऊपर हैं। उनकी फिक्र के दायरे में यह दूर का सवाल है और जो लोग यह सवाल पूछना चाहें, वे हिकारत से देखे जाने योग्य हैं।

चांद भी उनके लिए जरूरत का नहीं, शौक का सामान है। वह उन्हें वैज्ञानिक शोध के लिए नहीं, सैलानी सैर के लिहाज से लुभाता है। असली संकट यही है− यहां से राजनीति की ही नहीं, विज्ञान की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं, वैज्ञानिक दृष्टि व्यावसायिक नज़रिए से संचालित होने लगती है।
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मुझे नहीं पता आपका ये लेख कितना पुराना है, लेकिन आज मेरी नज़र इस पर पड़ी। आपकी सोच सही है, लेकिन एक बात जो आप लिख रहे हैं कि चांद से धरती तक पाइपलाइन बिछाने ... पढ़ें
चन्द्र कुमार, chankp007@gmail.com, बीकानेर
आज पहली बार आप तक पहुंचने की स्थिति बनी। सोचता रहा, क्यों नहीं पहुंचना हुआ पहले। खैर अब तो आना जाना बना ही रहेगा। सुंदर काम हो रहा है। बेबाकी से आप अपनी ... पढ़ें
विजय गौड़, vggaurvijay@gmail.com, देहरादून
mujhe lagta hai priyadarshan ke is lekh ne bahas k liye kai sawaal paida kiye hain. 1. kya dharti ke pranio ko hum theek se sambhal pa rahe hai jo hame ... पढ़ें
vinod sharma, sharmavinod991@gmail.com, delhi
 
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