गृहमंत्री करेंगे माओवाद से संवाद
प्रियदर्शन
नई दिल्ली,
बुधवार,
अक्टूबर 21,
2009
गृहमंत्री पी चिदंबरम माओवादियों के ख़िलाफ़ साझा मुहिम की तैयारी में जुटे हैं। इस महाभारत से पहले शांतिदूत की तरह आखिरी चेतावनी उछाल रहे हैं माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़ें और बातचीत की मेज पर आएं।
लेकिन माओवादी बातचीत की मेज पर क्यों आएं उनसे आखिर क्या बातचीत करना चाहते हैं गृहमंत्री। क्या माओवाद किसी स्थानीय असंतोष से उपजी प्रतिक्रिया भर है जिसे चंद आश्वासन या विकास के पैकेज संतुष्ट कर लेंगे? दरअसल जिस सरलीकरण ने गृह मंत्री को नक्सलियों के ख़िलाफ बंदूक उठाने की सूझ दी है उसी का दूसरा सिरा यह समझ है कि विकास की बांसुरी बजाकर नक्सली या माओवादी ताकतों को अपने पीछे किया जा सकता है।
समझने की जरूरत यह है कि माओवाद एक पूरी विचारधारा है। यह विचारधारा संसदीय लोकतंत्र पर ही भरोसा नहीं करती। संसदीय लोकतंत्र के मौजूदा स्वरूप को उखाड़ फेंकना उसके चरम लक्ष्यों में एक है। क्योंकि सत्ता की यह धूरी नष्ट किए बिना वह पूंजीवादी व्यवस्था ख़त्म नहीं की जा सकती जिसमें शोषण और दमन अंतर्निहित है।
यह विचारधारा मानती है कि उसका स्थानीय प्रतिरोध धीरे−धीरे एक बड़ी शक्ल अख्तियार करेगा एक ऐसे जनांदोलन में बदल जाएगा जिसके विरुद्ध सेना भी नहीं जाएगी और आखिरकार वह एकदलीय साम्यवादी व्यवस्था की नींव रखेगा।
भले ही दूसरों की नज़र में यह शेखचिल्ली जैसा सपना हो लेकिन माओवादी इसी बिना पर काम कर रहे हैं। दस राज्यों में उनका गलियारा अब जाना−पहचाना है और इसके विरुद्ध कार्रवाई में हिस्सा लेने से एक तरह से वायुसेना इनकार कर चुकी है।
बहरहाल मूल सवाल पर लौटें। चिदंबरम माओवादियों से कैसे निबटें इसका कोई सीधा रास्ता अब नहीं बचा है। चिदंबरम जिस राजनीतिक तंत्र को साथ लेकर माओवादियों का सामना करना चाहते हैं वह अपने चरित्र में इतना लुंजपुंज, निकम्मा, भ्रष्ट, अपराधी और हिंसक है कि किसी भी कार्रवाई की वैधता खो देता है। राज्य की हिंसा अपनी तमाम शक्लों में कहीं ज्यादा ख़ौफ़नाक हो उठती है। उसके पास दमन के सारे औजार हैं− बारीक से बारीक बड़े से बड़े। उसके पास शोषण के सारे उपाय हैं− विकास से लेकर बंदूक तक। वह अपने लिए हवाई अड्डे बनाता है तो आदिवासियों को बेदखल करता है वह अपने लिए बिजलीघर बिठाता है तो आदिवासी घरों में अंधेरा होता है वह अपने लिए बड़ी बांध परियोजनाएं लागू करता है तो आदिवासियों को विस्थापित करता है।
यह वह शोषण है जो सरकारी कायदों के मुताबिक और कानून और तरक्की की आड़ में किया जाता है। शोषण की दूसरी परत और भयावह है। इसका वास्ता इन इलाकों के संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से है। इस काम में अलग−अलग महकमों के आला अफसर से लेकर नेताओं के गुर्गे तक लगे होते हैं। वे जंगल की बेशकीमती लकड़ियां उठा लाते हैं, वे खनिज पदार्थों पर बंदूक का पहरा बिठाए रखते हैं और खुलेआम रंगदारी वसूलते हैं। वे श्रम कानूनों का मजाक बनाते हैं और अगर किसी गरीब ने उन्हें इनकी याद दिलाने की कोशिश की तो उसे मार भी डालते हैं। झारखंड के कोयलांचल में जो माफिया गिरोहबंदी है उसकी कहानी किसी से छुपी नहीं है। छत्तीसगढ़ के मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी को कई साल पहले जिस तरह मारा गया था उसके पीछे भी ऐसे ही लोग थे।
सवाल है इस खौफ़नाक दमन और शोषण के मुजरिम क्यों बच निकलते हैं? वे कहां चले जाते हैं?
जवाब है राजनीति के गलियारों में। नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने निकले चिदंबरम भूल जाते हैं कि उनकी संसद तक दागी नेताओं से भरी है और संसद के बाहर यह दाग और बड़ा और खौफनाक है। उनके नेता और मंत्री छोटे अपराधियों से लेकर माफिया गिरोहों तक को संरक्षण देते हैं जो बदले में उनके लिए काम करते हैं। आम लोगों की सुरक्षा के नाम पर रखी गई पुलिस भी खास लोगों के ही हित पहचानती है। जाहिर है इस काम की मार सबसे ज्यादा उस तबके पर पड़ती है जो हाशिए पर है।
इस लिहाज से देखें तो संसदीय लोकतंत्र की सैद्धांतिक मुखालफ़त कर रहे नक्सलियों से ज्यादा खतरनाक वे लोग हैं जो संसद को भीतर से खोखला कर रहे हैं। संसदीय राजनीति को दरअसल इन लोगों ने एक जनविरोधी उपक्रम में बदल डाला है और कानून और संविधान को अपने बचाव की छतरी में। यही वजह है कि नक्सलवाद जैसी हिंसक अवधारणा भी गरीबों और आदिवासियों में लोकप्रिय हो रही है।
इस पूरे संकट का एक पहलू और है। जो लोग इस देश पर शासन कर रहे हैं वे उसी अल्पतंत्र का हिस्सा हैं जो गुलाम भारत के दिनों में अंग्रेजों का हिमायती था और आजाद भारत के दिनों में उनका प्रतिनिधि बन गया। इस अल्पतंत्र ने विकास के नाम पर पूरे भारत को दो हिस्सों में बांट डाला है। एक तरफ वह छोटा सा चमचमाता हुआ इंडिया है जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों की टक्कर लेता है और दूसरी तरफ एक विशाल−बदहाल भारत है जिसे देखने की किसी को फुरसत नहीं। आंध्र प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ और झारखंड के सुदूर जंगलों में बसे आदिवासी इस बदहाल भारत के सबसे बड़े नुमाइंदे हैं जो एक तरह का नस्ली परायापन झेल रहे हैं। यही वे लोग हैं जो नक्सलवादियों की सेना का काम करते हैं और भारतीय राष्ट्र राज्य के सामने एक बड़ी चुनौती उछालते हैं।
लेकिन अगर भारतीय राष्ट्र राज्य का यही रवैया जारी रहा अमीर और गरीब भारत के बीच यही फांक बनी रही तो किसी भी दिन यह नक्सली आंदोलन पलामू और अबूझमाड के जंगलों से निकल कर दिल्ली और मुंबई तक पसर जाएगा। दिल्ली में कोबाड गांधी जैसे माओवादी को देखकर हैरान होने वाले लोग तब शायद ज्यादा हैरान होंगे जब वे पाएंगे कि उनके लिए साफ−सफाई का काम करने वाले, रिक्शा चलाने वाले उनका कूड़ा उठाने वाले, उनके लिए सब्जी बेचने वाले और ऐसे ढेर सारे दूसरे अनजान मासूम दिखते लोग एक दिन उनके खिलाफ खड़े हो गए हैं। दिल्ली की सवा करोड़ की आबादी में झुग्गी−झोंपड़ी बस्तियों वाली 40−50 लाख को छूती जो आबादी है वह एक सोयी हुई नक्सली सेना ही है जो किसी भी दिन खड़ी हो सकती है।
अगर ऐसे किसी अराजक दिन के अंदेशे से बचना है तो गृह मंत्री को पहले अपना घर देखना होगा और फिर नक्सली इलाकों में पत्थर उछालने होंगे। वे नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई तो करने निकले हैं लेकिन ये कार्रवाई आसान नहीं होगी। क्योंकि जिन जंगलों और बस्तियों में यह कार्रवाई होनी है वहां आम नागरिक और नक्सली के बीच का फर्क करना भी आसान नहीं होगा। इसके बावजूद कार्रवाई हुई तो वैसी ही होगी जैसी श्रीलंकाई सेना ने एलटीटीई को ख़त्म करने के लिए श्रीलंका में की। क्या हम अपने ही नागरिकों के विरुद्ध ऐसे नरसंहार के लिए तैयार हैं अगर नहीं तो हमें दूसरे उपाय सोचने होंगे।