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 IST 23,  2009  13:18 नवंबर Last Updated :
फोकस
'आज भी नहीं भरे सिखों के घाव'
भाषा
नई दिल्ली, शनिवार, अक्टूबर 31, 2009
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1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों का कहना है कि 25 बरस बाद भी उनके घाव हरे हैं जिनकी टीस वे हर दिन और हर पल महसूस करते हैं। इन लोगों की दुआ है कि अब दोबारा कभी ऐसे दंगे न हों और तबाही न मचे।

अपनी आंखों के सामने अपने बेटे और दामाद को मौत के मुंह में जाते देखने वाले हरचरण भोगल कहते हैं ‘‘कैसे भूलूं वह दिन। दंगा फैल रहा था। मैंने खुद अपने बेटे और दामाद को समय से पहले दुकान से घर जाने के लिए कह दिया। त्रिलोकपुरी में हमारी कपड़े की दुकान थी और थोड़ी ही दूरी पर घर था।’’ वह कहते हैं कि मैं नहीं जानता था कि मैं अपने बेटे और दामाद को मौत के मुंह में भेज रहा हूं। रास्ते में हंगामे से बचते हुए किसी तरह मैं जब घर पहुंचा तो पूछने पर पता चला कि मेरा बेटा और दामाद घर नहीं पहुंचे। मैंने पता करने की कोशिश की। काफी देर बाद मुझे पड़ोसियों ने बताया कि भीड़ ने दोनों को मार डाला। 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजधानी और देश के कुछ भागों में सिख विरोधी दंगे भड़के थे।

भोगल कहते हैं  कि मैं आज तक नहीं समझ पाया कि ऐसा क्यों हुआ। हमारा क्या कसूर था। मेरी बेटी की उम्र उन दिनों केवल 33 साल थी और उसके तीन बच्चे थे। बेटा अविवाहित था। एक बाप के लिए इससे बड़ा दुख और क्या होगा। मुकदमा व मुआवजा सब चलता रहता है लेकिन जो मैंने खोया उसकी भरपाई कौन करेगा।

उम्र के 72 साल पूरे कर चुकी कुलवंत कौर पथराई आंखों से दरवाजे की ओर देखती रहती हैं। उनकी बहू मंजीत कहती हैं कि दंगों में हमारा सब कुछ बर्बाद हो गया। मेरे ससुर, पति और जेठ को भीड़ ने मार डाला। हमारी दुकान जला दी गई। मेरी जिठानी अपने दोनों बच्चों को लेकर घर छोड़ कर चली गई। हमारे पास आजीविका के लिए कुछ भी नहीं बचा। वह कहती हैं कि मैंने किसी तरह सिलाई शुरू की। बेबे (मंजीत की सास) की हालत तब से ही ऐसी है कि एक न एक व्यक्ति उनकी देखभाल करने के लिए उनके पास रहता है। मैं अधिक पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए सरकारी नौकरी या अच्छी नौकरी मुझे नहीं मिल सकती थी लेकिन अपनी बेटी की परवरिश तो किसी न किसी तरह करनी ही थी। देश के विभाजन के दौरान सुरिन्दर सिंह ने कराची के पास स्थित डेरा बख्शियां गांव को छोड़ कर भारत आना बेहतर समझा था लेकिन सिख विरोधी दंगों के बाद उन्हें लगता है कि काश! यहां न आते।

उन्होंने कहा कि विभाजन की एक पीड़ा, अपनों से दूर होने का दर्द तो किसी तरह सह लिया था लेकिन 84 के दंगों में अपने तीनों बेटों को खोने का दर्द इससे कहीं ज्यादा है। काश मैं यहां न आता। शायद आज मेरे बेटे मेरे पास होते। अब तो दीवारों को देखते हुए दिन गुजरता है और रात गुजरने का नाम ही नहीं लेती। उन्होंने आगे कहा कि यह घाव मेरी मौत के बाद ही भरेगा। इसका दर्द तब तक महसूस करूंगा जब तक जीता रहूंगा। अब तो इस बारे में मैं किसी से बात भी नहीं करना चाहता क्योंकि मुझे किसी की हमदर्दी या झूठी सहानुभूति नहीं चाहिए।

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itne dardnak hadse ke khalnayak aaj bhi ajad ghum rahe hai, kya unke liye koi saja nahi? kya woh inka aadha dard bhi samaj sakenge?
Amit tguran, amitturan2001@gmail.com, karnal
 
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