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SME
 IST 23,  2009  00:56 नवंबर Last Updated :
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अपने ही जादू में घिरता बाज़ीगर...
प्रियदर्शन
नई दिल्ली, बुधवार, नवंबर 4, 2009
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क्या फिल्मी सितारों के जीवन में एक दौर ऐसा आता है, जब वे खुद अपनी शोहरत के जादू में फंस जाते हैं - जैसे, मान बैठते हों कि पर्दे पर जिस महानायकत्व का प्रदर्शन वे कर रहे हैं, वह अभिनय नहीं, उनका वास्तविक जीवन है और वे कुछ भी करें, कामयाब होंगे... क्या '80 के दशक की शुरुआत में अमिताभ बच्चन के जीवन में ऐसा समय आया था, और इन दिनों शाहरुख खान के जीवन में आया हुआ है...

पहले अमिताभ को याद कर लें। 'ज़ंजीर', 'दीवार', 'शोले', 'अमर अकबर एंथनी', 'डॉन', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'शक्ति', 'लावारिस', 'नसीब' और 'नमकहलाल' जैसी दिलचस्प फिल्में देने के बाद ऐसा क्या हुआ कि वह 'महान', 'तूफान', 'जादूगर', और 'शहंशाह' जैसी अजीबोगरीब फिल्मों के जाल में फंस गए - जैसे, उन्होंने मान लिया हो कि वह जिस चीज को छू देंगे, सोना हो जाएगी। शायद इसी महानायकत्व का भ्रम था कि उन्होंने एबीसीएल नाम की एक कंपनी भी बना ली − शायद फिल्म 'त्रिशूल' के खुद के नायकत्व को याद करते हुए − कि अभी पांच फूटी कौड़ी भी न हों, पांच करोड़ जमा करने में वक्त नहीं लगेगा। हालांकि जब एबीसीएल बना रहे थे, तब अमिताभ फूटी कौड़ी नहीं खोज रहे थे, बल्कि करोड़ों में खेल रहे थे... लेकिन हुआ क्या... उनकी फिल्में भी पिट गईं, और एबीसीएल भी मार खा गई। एक दौर ऐसा भी आया, जब अमिताभ ने खुद को घोर माली संकट और कर्ज़ के बीच दबा पाया। इसी दौर में उन्हें ऐसे लोगों का भी सहारा लेना पड़ा, जिनके साथ वह अपनी फिल्मों में शायद दोस्ती भी नहीं करते... क्या त्रासदी है कि फिल्मों में जो नायक गिरे हुए पैसे नहीं उठाता था, वह अपने वास्तविक जीवन में नेताओं और उद्योगपतियों के गले मिलते, और उनके पांव छूते देखा गया।

अमिताभ इलाहाबाद से चले, और शाहरुख दिल्ली से। अमिताभ '70 के दशक के सुपरस्टार रहे, शाहरुख '90 के दशक के। शायद इस देशकाल का भी फर्क है, जो शाहरुख को अमिताभ बच्चन वाले जाल में फंसने नहीं देता। शाहरुख को मालूम है कि उन्हें बस मनोरंजन का धंधा आता है। वह खुद को एंटरटेनर बताते रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में शाहरुख की जो फिल्में आ रही हैं, वे बता रही हैं कि शाहरुख पर भी अपने स्टारडम का जादू हावी हो रहा है। उनकी इधर की फिल्मों का नायक जैसे कहानी का चौखटा तोड़कर बाहर निकलना चाहता है, याद दिलाता हुआ कि असल में वह स्टार है, उसको सिर्फ एक किरदार में बांधकर न देखा जाए। इतना ही नहीं, उनकी फिल्में बेहद खास हैं, जिनकी कहानियां कोई और − ईश्वर नहीं तो और कौन − लिख रहा है।

'ओम शांति ओम' में शाहरुख यही बोलते हैं। कहानी कोई और लिख रहा है, क्योंकि फिल्म में ऐसे इत्तफाक हो रहे हैं, जो जीवन में मुमकिन नहीं हैं। हिन्दी सिनेमा में यह कोई नई बात नहीं है... नया सिर्फ इतना है कि इस बार यह सीक्वेंस किसी लेखक का नहीं, सीधे ईश्वर का लिखा बताया जा रहा है।

अगली फिल्म 'रब ने बना दी जोड़ी' में भी लगभग यही संवाद दोहराया जाता है। शाहरुख की पत्नी − नई नवेली नायिका − अनुष्का शर्मा अपने पति को हल्के से मेकअप में नहीं पहचान पाती तो इसे भी शाहरुख किसी ईश्वर की इच्छा के हवाले कर देते हैं। कहानी इंसान नहीं, भगवान लिख रहा है − जोड़ी रब बना रहा है।

इस बड़े नायक का काम एक नायिका से नहीं चलता। 'ओम शांति ओम' में उसके साथ बॉलीवुड की करीब 30 नायिकाएं नाचती हैं। 'रब ने बना दी जोड़ी' में भी कई नायिकाएं नाचने को आती हैं। आखिरी फिल्म 'बिल्लू' में यह सब नहीं है, लेकिन वहां भी शाहरुख स्टार ही हैं। और अब उनकी जो नई फिल्म आ रही है, उसके नाम पर भी शाहरुख की छाया है − माई नेम इज ख़ान...

इस बात में कोई हर्ज नहीं कि कोई नायक अपने नाम पर, शोहरत पर गरूर करे, लेकिन जिस दिन वह अपने नायकत्व को ही आखिरी लकीर बना लेता है, उसकी ढलान शुरू हो जाती है। फिल्में सितारों के दम पर चलती हैं, लेकिन सितारे भी फिल्मों के दम पर ही चलते हैं। जब सितारा अपनी फिल्म पर बुरी तरह हावी होता दिखे तो समझना चाहिए कि उसके आखिरी दिन शुरू हो गए। जब तक राजेश खन्ना अच्छी पटकथा. अच्छे संगीत और अच्छी फिल्मों के सहारे चले, उन जैसा सुपरस्टार कोई नहीं दिखा, लेकिन जहां काका ने खुद को थोपना शुरू किया, वह खत्म हो गए। अमिताभ बच्चन का भी एक दौर में यही हश्र होता दिखा। हालांकि यह भी सच है कि उनके बुढ़ापे ने उन्हें बचा लिया।

शाहरुख के लिए अभी वह वक्त नहीं आया है, लेकिन जब सारी कहानियां ईश्वर ही लिखेगा तो ईश्वर के भरोसे ही फिल्म रह जाएगी। शाहरुख इसका खयाल रखें तो उनकी बादशाहत की उम्र कहीं ज्यादा लंबी होगी। अगर वह अपने सम्मोहन के खुद ही शिकार हो गए तो दर्शकों पर उनका जादू नहीं चलेगा। क्योंकि तब वह अपने−आप में खोए, अपनी भव्यता में अभिभूत ऐसे स्टार रह जाएंगे, जिसका लोगों से कोई वास्ता नहीं होगा।

विशेष नोट : यह आलेख लेखक के निजी विचार हैं, और एनडीटीवीख़बर.कॉम और एनडीटीवीसमूह का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है...
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आपकी बात से सहमत हूं।
परमजीत बाली, paramjitbali@gmail.com, दिल्ली
में अमिताभ के बारे में आपके विचारों से सहमत नहीं हूं। शायद आप भी न हों और ये आपकी मजबूरी रही हो की आपको अगर शाहरुख के बारे में लिखना है तो अमिताभ जी के ... पढ़ें
मनोज मिश्र, manojj_m@yahoo.co.in, जयपुर
 
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