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 IST 21,  2009  12:01 नवंबर Last Updated :
फोकस
प्रभाष जोशी : कागद अब कोरे ही रहेंगे
भाषा
नई दिल्ली, शुक्रवार, नवंबर 6, 2009
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हिन्दी पत्रकारिता के प्रमुख स्तंभ प्रभाष जोशी के निधन के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता के एक युग का अवसान हो गया। उन्हें परंपरा और आधुनिकता के साथ भविष्य पर नजर रखने वाले पत्रकार के रूप में सदा याद किया जाएगा।

वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह ने कहा, ‘‘अब ‘कागद कारे’ पढ़ने को नहीं मिलेगा, कागद अब कोरे ही रहेंगे। ऐसा लगता है, कल आधी रात सचिन के 17 हजार रन से एक तरफ उन्हें खुशी हुई और भारत की हार का आघात लगा...।’’

वरिष्ठ कवि और समालोचक अशोक वाजपेयी ने कहा, ‘‘यह सिर्फ हिन्दी पत्रकारिता का नुकसान नहीं है, बल्कि हिन्दी समाज और बुद्धिजगत की भी क्षति है। हिन्दी में उनके जैसे सर्वमान्य बुद्धिजीवी काफी कम है, जिन्हें सभी ध्यान से पढ़ते हों।’’

उन्होंने कहा कि प्रभाष जी ने अनोखी लेखनी विकसित की और पत्रकारिता के माध्यम से हिन्दी को बेहतरीन गद्य दिए। कहां क्रिकेट और कहां कुमार गंधर्व, कहां राजनीति और कहां हिन्द स्वराज, इन सभी विपरीत ध्रुवों को एक साथ साधना हर किसी के बस में नहीं है।

मृत्यु की खबर पाकर प्रभाष जी के आवास पर पहुंचने वालों में भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और कलराज मिश्र, पूर्व सांसद संतोष भारती व एमजे अकबर, हंस के संपादक राजेन्द्र यादव, एनडीटीवी के पंकज पचौरी, सीएनएन-आईबीएन के राजदीप सरदेसाई, समाजसेवी सुनीता नारायण प्रमुख थे।

ज्ञानपीठ के निदेशक रवीन्द्र कालिया ने समूचे ज्ञानपीठ परिवार की ओर से गहरी संवदेना प्रकट करते हुए कहा कि प्रभाष जी हिन्दी पत्रकारिता का उज्ज्वल नाम थे और दिल्ली के सांस्कृतिक जीवन में उनकी उपस्थिति बेहद अहम थी।

उन्होंने कहा कि वह क्रिकेट से लेकर राजनीति तक लिखने वाले हिन्दी के एक मात्र संपादक थे, उनकी राजनीति की समझ काफी गहरी थी और क्रिकेट पर वह दिल से लिखते थे। हिन्दी समाचार का विश्लेषण करने में वह लोकप्रिय नाम थे।

हिन्दी अकादमी के अध्यक्ष अशोक चक्रधर ने व्यक्तिगत क्षति बताते हुए कहा, ‘‘ ‘युग का अंत’ मुहावरा होता है, लेकिन प्रभाष जी के निधन के साथ ही परंपरा और आधुनिकता के साथ भविष्य दृष्टि रखने वाली बेलाग और निर्भीक पत्रकारिता के एक युग का सचमुच अवसान हो गया।’’

उन्होंने कहा कि गांधीवादी होने के बावजूद क्रिकेट के प्रति उनका रागात्मक लगाव रहा, जिसके चलते उनमें युवाओं जैसा जोश दिखाई देता था। हिन्दी पत्रकारिता में क्रिकेट को जोड़ना उनका एक अहम योगदान रहा।

उन्होंने कहा कि मालवी भाषा को पत्रकारिता में लाना उनका दूसरा सबसे बड़ा योगदान था। जोशी के निधन के साथ ही हिन्दी ने राजेन्द्र माथुर की पीढ़ी का सबसे सशक्त हस्ताक्षर खो दिया।

‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव ने कहा, ‘‘मैं उन्हें हिन्दी का तीसरा सबसे बड़ा पत्रकार (अज्ञेय और राजेन्द्र माथुर के बाद) मानता हूं, जिन्होंने भाषा, प्रतिमानों और छवि को बदलने में अहम योगदान दिया।’’ उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें क्रिकेट का बड़ा क्रेज था और क्रिकेट ही उन्हें ले डूबा...। मैंने उनसे अधिक क्रिकेट का क्रेजी पत्रकार नहीं देखा। वह हर विषय पर बेलाग बोलने वाले बुद्धिजीवी थे।’’
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