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 IST 10,  2010  01:56 फरवरी Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
लेकिन सच है की भूखे होंठ हँसेंगे सिर्फ़ रोटी से

*मैं भी चाहता हूँ की हुस्न पे ग़ज़लें लिखूँ*
*मैं भी चाहता हूँ की इश्क के नगमे गाऊं*
*अपने ख्वाबों में में उतारूँ एक हसीं पैकर*
*सुखन को अपने मरमरी लफ्जों से सजाऊँ ।*

*लेकिन भूख के मारे, ज़र्द बेबस चेहरों पे*
*निगाह टिकती है तो जोश काफूर हो जाता है*
*हर तरफ हकीकत में क्या तसव्वुर में *
*फकत रोटी का है सवाल उभर कर आता है ।*

*ख़्याल आता है जेहन में उन दरवाजों का*
*शर्म से जिनमें छिपे हैं जवान बदन *
*जिनके **तन को ढके हैं हाथ भर की कतरन*
*जिनके सीने में दफन हैं , अरमान कितने *
*जिनकी **डोली नहीं उठी इस खातिर क्योंकि*
*उनके माँ-बाप ने शराफत की कमाई है*
*चूल्हा एक बार ही जला हो घर में लेकिन *
*सिर्फ़ मेहनत की खायी है, मेहनत की खिलाई है। *

*नज़र में घूमती है शक्ल उन मासूमों की *
*ज़िन्दगी जिनकी अँधेरा , निगाह समंदर है ,*
*वीरान साँसे , पीप से भरी धंसी आँखे*
*फाकों का पेट में चलता हुआ खंज़र है।*

*माँ की छाती से चिपकने की उम्र है जिनकी*
*हाथ फैलाये वाही राहों पे नज़र आते हैं ।*
*शोभित जिन हाथों में होनी थी कलमें *
*हाथ वही बोझ उठाते नज़र आते हैं ॥ *

*राह में घूमते बेरोजगार नोजवानों को*
*देखता हूँ तो कलेजा मुह चीख उठता है*
*जिनके दम से कल रोशन जहाँ होना था*
*उन्हीं के सामने काला धुआं सा उठता है।*

*फ़िर कहो किस तरह हुस्न के नगमें गाऊं*
*फ़िर कहो किस तरह इश्क ग़ज़लें लिखूं*
*फ़िर कहो किस तरह अपने सुखन में*
*मरमरी लफ्जों के वास्ते जगह रखूं ॥*

*आज संसार में गम एक नहीं हजारों हैं*
*आदमी हर दुःख पे तो आंसू नहीं बहा सकता ।*
*लेकिन सच है की भूखे होंठ हँसेंगे सिर्फ़ रोटी से*
*मीठे अल्फाजों से कोई मन बहला नही सकता । । *
दीपक शर्मा,kavyadharateam@gmail.com
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फोकस
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