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SME
 IST 22,  2009  01:05 नवंबर Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
गुलशन रहे 'गुलज़ार'
एक किताब है 'रावी पार', उसको पढ़िए। मुझे यक़ीन है कि आप यक़ीन नहीं कर पाएंगे कि एक फ़नकार कैसे आपकी बनी- बनाई ख्यालों की दुनिया को रेजा रेजा कर बिखेर सकता है, और फिर उसी बिखराव को समेटकर उम्मीद बना सकता है। आपको रुला सकता है, हंसा सकता है। वो भी कई- कई बार...
ये किताब है गुलज़ार साहब की। तकरीबन ४० सालों से अपने अल्फाजों के ज़रिए वो हमारे करीब...और करीब आते गए हैं। इतने करीब कि हमारे दिल-ओ-जेहन की उन आवारा गलियों से भी गुज़र गए, जो हमारे लिए ही अजनबी थीं। उनके हर हर्फ़ में हम खुद को ढूँढ़ते और पाते रहे। हर किरदार हम जैसा, हर वाकया हमारे जैसा। उनकी कहानियाँ हमारी हकीकत है, और उनकी नज्में हमारे ख्वाब।
गुलज़ार और वक़्त में इस कदर सगापन हैं कि दोनों साथ-साथ चलते और साथ-साथ ही बदलते हैं। ऐसे में दोनों चाहें भी तो एक दूसरे से अजनबी नहीं हो सकते हैं। गुलज़ार साहब ने बॉलीवुड के उस मिथ को भी तोड़ दिया है कि जो दिखता है, वही जाना भी जाता है। वो बीते चार दशकों से हमें पहचान कर अपनी पहचान बना रहे हैं। हर नज़्म के साथ वो अपनी ही बनाआ सरहद को लांघते जाते हैं, हमें और गहराई तक छूते जाते हैं। मिसाल के तौर पर, जब उन्होंने लिखा "देखना मेरे सर से आसमान उड़ गया है। देखना आसमान के सिरे खुल गए हैं ज़मीन से।" और जब तक हम इस नज़्म के लिए मुफीद लफ्ज़ ढूंढ़ पाते, गुलज़ार साहब "धागे तोड़ लाओ चांदनी के नूर के, घूंघट ही बना लो रौशनी से नूर के" साथ हाज़िर हो गए, हमें फिर बेलफ्ज़ करने के लिए.
मीर तकी मीर का एक शेर है: "नाज़ुकी उसके लबों की क्या कहिए, पंखुड़ी एक गुलाब की सी है"। मेरे किसी जानने वाले ने मुझे बताया था कि गुलज़ार ने कभी फ़रमाया था कि मीर के इस शेर के बदले वो अपनी सारी कलमकारी मीर के नाम कर सकते हैं। मुझे यकीन है कि मीर साहब इस ऑफर के बाद जन्नत में बेताब हो गए होंगे।
दरअसल गुलज़ार ने बड़ी नफाजत से अपने अन्दर 'बचपन की मासूमियत', 'जवानी की शरारत' और 'वक़्त का तजर्बा' सजोए रखा है। तभी तो कभी वो 'रात की मटकी फोड़ते' नज़र आते हैं, तो कभी बगैर लिहाज और लिहाफ के ठंडी हवा के खिलाफ हो लेते हैं, फिर कभी चप्पा-चप्पा चलने वाले चरखे के साथ यादों की पुरानी गलियों में आवारा हो जाते हैं, और कभी...लिस्ट बड़ी लम्बी है।
रवि शन्कर 'फ़क़ीर',ravis.mishra@rediffmail.com
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