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SME
 IST 22,  2009  01:05 नवंबर Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
लोकतन्त्र क चौथा स्तम्भ
भारतीय लोकतन्त्र के एक महत्‍वपूर्ण स्तंभ की अवस्था के बारे मे कुछ तथ्यात्मक विचार और उनका विश्लेषण करना इसलिए आवश्यक हो चला है क्योंकि यह स्तम्भ दिशाहीन सा मालूम पड़ता है|
यह स्तंभ है प्रेस| आइए इसकी कुछ स्वनामधन्य निवर्तमान कारगुजारियों से अवगत होते हैं जो हमारे महान भारत को एक विश्वशक्ति बनाने का दिशाहीन व असंगठित प्रयास कर रहे है|
नाम लेने की आवश्यकता कम ही है की कुछ समाचार चैनल हमे परग्रहियों से, परमानवीय शक्तियों से युक्त करने का प्रयास कर रहे हैं या भूत-प्रेतों की शक्तियों से मुक्त करने का इस बारे मे काफ़ी कुछ लिखा जा चुका है, इसको भी सनसनीखेज बनाने की कवायद में इतना परिश्रम किया जाता है की उतना परिश्रम सुषमा जी ने भी बेल्लारी मे कन्नड़ धारा प्रवाह बोलने में नही किया होगा जिसकी सहायता से वह सोनिया जी को नाकों चने चबवा चुकी हैं|
दक्षिण भारतीय समाचार चेनलों के बारे मे लिखने में तो लाज आ जाती है की अगर लोकतंत्र के इन दो स्तंभों मे संसदीय प्रणाली और प्रेस को एक कर दिया जाए तो या तो तीन ही स्तंभ बचते हैं या एक अपारदर्शी दीवार खड़ी हो जाती है जिसके पीछे ना जाने किन-किन अलोकतांत्रिक गतिविधियों को अंजाम तक पहुँचाया जा रहा है| इसकी जीती जागती मिसाल हैं कुछ या कहें अधिकतर समाचार चेनल|
कुछ एक जो अपने नवजातकाल मे अपनी विशुद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते थे या कुछ मात्रा में तो अभी भी जाने जाते हैं, वे भी एक अजीब सी दुविधा के वशीभूत होकर अब अपने समकालीनो जैसा आचरण करने लगे हैं|
व्यक्ति केंद्रित होना या अपनी इस ज़िम्मेदारी का एहसास ना होना या इस लोकतंत्र के स्तंभ का भार स्वयं ना वहाँ करने की क्षमता ही इन्हें इनके उद्देश्य से दूर ले जा रही है, अन्यथा किसी विषय पर अपने ही पत्रकार से सवालात करना और उसका प्रसारण इस तरह करना मानो किसी प्रकांड विद्वान से उसके संबंधित ज्ञानरूपी सागर की कुछ बूँदें ली जा रही हों| जबकि पत्रकार को ही विश्लेषक बनाने की नौबत आ जाए तो समझिए आप लक्ष्य से कितना भटक चुके हैं|
कुछ समाचार चैनलों पर आप प्रस्तोता के विचारों का सजीव प्रसारण भी देख सकते हैं, कोशिश थी कुछ बेहतर रखने की कुच्छ बेहतर कर दिखाने की, गुणवत्तापरक था मगर सफलता हर कोई पचा नही पाता, काफ़ी समय बीत जाने के बाद अब प्रस्तोता अपने निजी विचारों को अपने ही तर्कों के सहारे ऐसा दिखाने की कोशिश में लगा दिखा मानो यह भारतात्मा की आवाज़ हो, इस नकारात्मक पत्रकारिता ने तो आडवाणी और भाजपा के विगत नकारात्मक चुनाव प्रचार की सीमाएँ उन्ही के विरुद्ध ध्वस्त कर डाली|
बेशक कुछ अच्छा भी है, हरियाली के प्रति ध्यानकर्षण, स्वयंसेवी सहायता समूहों को स्थान देना, कुछ देश दुनिया से जनता को अवगत कराना, अंधविश्वास को वैज्ञ्यानिकता से दूर करने का प्रयास और भी काफ़ी कुछ|
क्या रह गया या क्या किया जा सकता है इसका विवरण दिए बिना यह लेख भी नकारात्मकता का एक उदाहरण बन सकता है, इसलिए क्या प्रेस ने भारत को एक सूत्र में बाँधने का ईमानदार प्रयास किया, क्या हिन्दी भाषी चैनलों के विचार अहिंदीभाषी तक पहुँचाने या इसका इसका विलोम करने का प्रयास किया गया, क्या भारतीय प्रेस के कुल बीस-तीस ही स्वनामधन्य व्यक्तित्व अपने विचारों को निष्पक्ष रख पाने मे विफल नहीं हुए, कही लाल विचारधार का अमित प्रवाह कहीं कहीं भगवा से भक्ति कहीं इनसे ही अतिवादी विरक्ति, कहीं अति क्षेत्रवाद, कहीं भाषावाद, कहीं इतिहास की मनमानी विवेचना, हर संवेदनशील या असंवेदनशील न्यायिक विषय का मीडिया ट्रायल|
आतिफ तिवारी,indian.ace@rediffmail.com
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