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 IST 22,  2009  01:05 नवंबर Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
दो बीघा ज़मीन

इस टाइटल की फिल्म बने एक ज़माना बीत चुका है। वो ज़माना लौटकर नहीं आने वाला है, ये भी तय है। पर दो बीघा ज़मीन के लिए किसान का संघर्ष अब भी जारी है। पहले किसान को केवल ज़मीनदार, तहसीलदार और सूदखोरों से लड़ना-भिड़ना पड़ता था। समझदार लोगों की सहानुभूतिउसके साथ हुआ करती थी। पलटवार होने पर कलमवाले ढाल बन जाते थे। पर अब जब कलम के साथ कैमरा भी है, किसान पहले से कहीं ज्यादा अकेला हो चुका है। पर उससे लड़ने वाले घटने की बजाए बढ़ गए हैं। फिलहाल किसान के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है अपने समर्थकों और विरोधियों में फ़र्क करने की। अब नुक़सान पहुंचाने वाले को पहचानना बड़ा मुश्किल हो चला है। किसान हितों की आड़ में पॉलिटिकल पार्टियों और गैर राजनीतिक संगठनों की एक पूरी जमात ही कुकुरमुत्ते की तरह फल-फूल रही है। किसान को उसकी दो बीघा ज़मीन पर मालिकाना हक़ दिलाने की होड़ मची हुई है। किसान के पास ऑफर ही ऑफर हैं, पर उसके पास च्वाइस नहीं है। दरअसल, किसान उम्दा और नुस्ख वाले बीज में अंतर कर सकता है। पर सगों और ठगों की पहचान कर पाना उसके लिए अब भी बड़ा मुश्किल है। किसान गरजने और बरसने वाले बादलों में भेद कर सकता है। पर भेदियों और भेड़ियों को ढूंढनिकालना उसके बस का नहीं है। इसलिए किसान भड़काने पर भड़क जाता है। और फिर या तो मार खाता है या मार दिया जाता है। सिंगूर और कांठीटांड की कहानियां तो यही बताती हैं। किसान को इन लड़ाईयों से न माया मिली न राम। पर उसका राम नाम सत्य ज़रूर हो गया। अब टाटा सिंगूर की ज़मीन लौटाने को तैयार है। पर कंपनी को मुआवजा चाहिए। ममता को अगले इलेक्शन में वोट चाहिए। लाल ब्रिगेड को बंगाल में अपनी लाली वापस चाहिए। पर किसान को क्या चाहिए, इसकी सुध किसी को नहीं। खुद किसान को भी नहीं, तभी तो वो चुप बैठा है। फिर किसान को समझाने वाला भी तो कोई नहीं है। जिस मीडिया पर जनमत तैयार करने की सामाजिक ज़िम्मेदारी थी, वो तो किसान को अपने न्यूज़ कंटेन्ट से कब का निकाल बाहर कर चुका है। किसान के बारे में अब न तो कोई कलम लिखने को तैयार है और न ही कोई कैमरा उस पर फोकस करने में दिलचस्पी रखता है। इसलिए किसान की समझदारी बढ़ने की उम्मीद भी काफी कम ही नज़र आती है।
पर मैं और मुझ जैसे कई दूसरे बिल्कुल नाउम्मीद नहीं हुए हैं। हमें पता है कि भोर होने पर किसान सबसे पहले जागता है। बिना किसी अलार्म और इलैक्ट्रॉनिक बीप की आवाज़ सुने उसे अपने जागने के समय का एहसास हो जाता है। शायद किसान इसी भोर के इंतज़ार में है। तय है कि एक दिन वो जागेगा, अंगड़ाई लेगा, बदलाव की बयार उसे उठ खड़ा होने का संकेत दे देगी। तब जब वो पहला अपनी खाट से उतर कर नीचे रखेगा, तो उसकी दो बीघा ज़मीन उसके पैरों तले होगी।
समीर,ilusameerji@yahoo.com
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