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SME
 IST 20,  2009  11:55 नवंबर Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
किसान क्रेडिट के नाम पर कमीशनखोरी...
भारत की बहुतायत आबादी जीविकोपार्जन के लिए खेती पर ही निर्भर है, लेकिन आजादी के 62 साल बाद भी किसानों की हालत दयनीय ही है। यहां तक कि किसानों के लिए ही बनी सरकारी योजनाएं भी खोखली साबित होती हैं।
हाल ही में शुरू की गई किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना का हश्र भी कुछ वैसा ही होता दिख रहा है। किसानों की फसल का निश्चित उत्पादन तय कराने के लिए तथा उन्हें निश्चित लाभ दिलाने के लिए सरकार ने केसीसी नामक यह योजना शुरू की थी, लेकिन आज तक यह किसानों को साख, सृजन या लाभ दिलाने में कितना सफल रही, यह बहस का मुद्दा है।
लेकिन केसीसी किस तरह किसानों को कष्ट दे रही है, यह बात बिहार के औरंगाबाद जिले में लेखक द्वारा की गई छानबीन से स्पष्ट है।
केसीसी मूलतः सभी बैंकों द्वारा अपने क्षेत्राधिकार के किसानों को उनकी कृषि योग्य जमीन के स्वामित्व के आधार पर साख के रूप में मुहैया कराई जाती है। यहां इसके दो पक्ष स्वतः ही जुड़ जाते हैं। एक, स्वामित्व के सर्टिफिकेट प्राप्त करने का पक्ष और दूसरा, बैंकों द्वारा साख प्रदान करने का पक्ष। और इन दोनों पहलुओं की कागजी खानापूरी के साथ ही किसानों के शोषण की शुरुआत हो जाती है।
हर किसान को लैण्ड पज़ेशन सर्टिफिकेट (एलपीसी) अंचल अधिकारी देता है। इस पर पहले-पहल हलके का राजस्व कर्मचारी जमीन का रकबा लिखता है। कुटूम्बा ब्लॉक के किसान नरेश पांडेय का कहना है कि मालगुजारी रसीद कटवाने और अपनी जमीन होने के बावजूद राजस्व कर्मचारी एलपीसी पर लिखने के एवज में प्रति एकड़ 3,000 रुपये के हिसाब से खुल्लम-खुला रिश्वत मांगता है।
यह पूछने पर कि आप शिकायत क्यों नहीं करते, देवरिया पंचायत के किसान रणजीत यादव कहते हैं कि हमनें कई बार अंचल अधिकारी से शिकायत की, परन्तु कोई कार्रवाई नहीं की गई। तहकीकात के बाद पता चला कि अभी तक बिहार में भूमि स्वामित्व हस्तांतरण का कार्य पूरा नहीं किया गया है, जिसकी धौंस में राजस्व कर्मचारी खुलेआम वसूली करता है और पब्लिक आपाधापी में अपनी खानदानी जमीन को भी नाजायज समझ बैठती है तथा उस पर जायज की मुहर लगवाने के लिए मोटी रकम अदा करती दिखती है।
एलपीसी लेने के बाद किसान केसीसी के लिए बैंकों के चक्कर लगाते हैं। औरंगाबाद जिले के बैंकों के मुआयने से पता चला कि हर ब्रांच मैनेजर के चैम्बर में मैनेजर के साथ ही 'केसीसी बाबू' नाम से मशहूर दलाल बैठते हैं। केसीसी संबंधी पूछताछ करने पर केसीसी बाबू बड़े अधिकार से मैनेजर से पहले ही बोल पड़ते हैं, हमसे बात कीजिए। फिर बाबू बाहर आते हैं, और केसीसी दिलवाने की एवज में अपना कमीशन प्लान समझाते हैं। साक्ष्य के तौर पर बाबू ने डायरी में दर्ज किसानों के नाम और मोबाइल नंबर भी दिखाए। तकरीबन यही कहानी सभी ब्रांच के केसीसी बाबुओं की है।
मेरी मुलाकात एसबीआई, औरंगाबाद शाखा के मशहूर केसीसी बाबू - सुनील सिंह (09939709845) से हुई। उनका कहना था - मैं अपने धंधे में ईमानदार हूं और महीने में कम से कम सौ केसीसी बनवाता हूं। पैसा मंजूर होने के बाद ही मैनेजर हर केसीसी खाते से 35 फीसदी डिडक्ट करते हैं और फिर अपना और मैनेजर का कमीशन बंटता है। मैं कभी किसानों की जेब पर भार नहीं पड़ने देता हूं।
ठीक ऐसे ही दो अन्य मशहूर केसीसी बाबुओं - जगन्नाथ पांडेय और भोलालाल से पीएनबी की कुटूम्बा ब्रांच में मुलाकात हुई। सभी ब्रांचों में कमोबेश यही स्थिति थी।
इस 'सुविकसित' तंत्र पर चर्चा और शिकायत के लिए हमने जिले के टॉप आफिशियल से समय मांगा, मगर तकरीबन सभी अफसर मिलने से बचते रहे। खैर, बड़ी मशक्कत के बाद एसडीएम, औरंगाबाद ने समय दिया, किन्तु मेरे डेटा-बेस उपलब्ध कराने के बावजूद कार्रवाई से बचते दिखे और इसे भ्रष्टाचार का अंग बताकर अफसोस जाहिर करते हुए बात को चलता करने की भरपूर कोशिश की। हालांकि मेरे काफी दबाव के बाद उन्होंने दो प्रखंडों के बीडीओ को कार्रवाई की हिदायत दी।
हम शुक्रगुजार हैं, उन्होंने कुछ तो किया, क्योंकि कहते हैं - न मामा से तो कहीं अच्छा है कंस मामा का होना...
पूरी छानबीन से कई बातें स्पष्ट हुईं...
नीतीश सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी कमीशन तंत्र पूर्ण स्थापित सत्य बन चुका है...
इतने हाई कमीशन के बाद किसानों से केसीसी रिकवरी की उम्मीद नाइंसाफी होगी...
यह भी स्पष्ट है कि बैंकों के ज्यादातर लोन डूबते क्यों हैं...
टॉप ऑफिशियल की मनाही साबित करती है कि भ्रष्टाचार अब स्वीकार्य अंग बन चुका है और उनके लिए अब ऐसी बातें एक्शन के लायक नहीं रही हैं, या फिर कोई न कोई मजबूरी जरूर है, जो उन्हें एक्शन लेने से रोकती हैं।
- बी - 1 / 8 - ए, यमुना विहार, दिल्ली - 110053
राकेश कुमार (स्वतंत्र पत्रकार),rakeshkpandey539@gmail.com
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