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 IST 10,  2010  01:56 फरवरी Last Updated :
विस्तृत ब्लॉग
 
राजनीति मे न्यूनतम शिक्षा का मापदंड होना ज़रूरी है।
राजनीति में न्यूनतम शिक्षा का मापदंड होना जरूरी है। बहुत पुरानी कहावत है कि "विद्या ददाति विनयम्"। आप सबको इस श्लोक की यह पंक्ति ज़रूर याद होगी। जीवन के प्रारंभ मे ही इस तरह की पंक्तियाँ विधालय में हर छात्र को पढ़ाई जाती है। यह सब इसलिए नहीं कि हम पढ़कर परीक्षा उतीर्ण कर लें और अगली कक्षा में पहुंच जाएं। अपितु ये हमारी बौद्धिक बुनियाद को सुदृढ़ करने के लिए हैं और यह समझाने का प्रयास है कि जितना पढ़ोगे और जैसा अच्छा पठन होगा जीवन उतना ही सरल, उत्तम और परिपक्व होगा। इसका लाभ इस समाज को मिलेगा और समाज उन्नति करेगा, फिर समाज के साथ साथ देश भी तरक्की करेगा। मतलब देश के साथ-साथ आम आदमी का गौरव भी बढ़ेगा या आप इसे उल्टा भी कह सकते हैं कि आम आदमी के साथ साथ देश का गौरव भी बढ़ेगा। बात को किसी भी तरह से कह लीजिये लौट कर वहीं आ जाएंगे "विद्या ददाति विनयम्"। राजतंत्र मे पहले राजा के सिपहसालार और मंत्री अपनी एक खास पहचान रखते थे और जो भी जिस विद्या या कला में निपुण होता था, उसे उसकी क्षमता के लिहाज से विभाग बांट दिए जाते थे। वहां केवल गुण और निपुणता मायने रखती थी न की आरक्षण और सिफारिश या वर्ण भेद या ज़ाति विशेषता। सब अपनी अपनी कला में माहिर और निपुण। राजा भी उनकी बात को गौर से सुनता था और उनकी सलाह से निर्णय लेता था। कई-कई भाषाओं का ज्ञान होता था राजा को, मंत्री को और रणनीतिकारों को। उसकी वजह थी कि विभिन्न भाषा -भाषी प्रजा की बात समझना और उनकी बेहतरी के लिए निर्णय लेना। कहने का तात्पर्य यह है कि राज्य के कर्णधार अति शिक्षित होते थे और समय के हिसाब से निर्णय लेते थे। एक उम्र के बाद जब शारीरिक और मानसिक शक्तियां क्षीण होने लगती हो, अपने यथा योग्य उत्तराधिकारी को सब अधिकार देकर संन्यास आश्रम में प्रवेश कर लेते थे। और शायद यही उस राज्य या क्षेत्र की उन्नति का कारण था। जितना शिक्षित राजा और राजा का मंत्रिमंडल और सभासद उतना ही उन्नत साम्राज्य। बिना किसी आदेश के और नियम के यह परिपाटी चलती रही और शासन चलता रहा। जिस किसी भी राजा ने इस नियम का पालन नहीं किया, वो इतिहास भी न बना सका और इतिहास के पन्नों में ही खो गया। आज हम सिर्फ उन्हीं राजा-महाराजाओं को याद करते हैं, जो समाज में अपनी पहचान छोड़ गए। समय ने करवट ली और प्रजा ही राजा बन गई, लेकिन हम इस राजसत्ता की चाहत में बहुत कुछ पीछे छोड़ आए। आरक्षण, वर्णवाद, जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, वंशवाद न जाने क्या-क्या समा गया हमारी राजनीति में और देश एक अँधेरे कुँए में गिरता रहा। आज तो हालत यह हो गई कि पता ही नहीं चल रहा कि राजनेता कौन हैं और मूढ़ कौन। सिर्फ ज़ाति, धर्म, वंश, क्षेत्र, भाषा के नाम पर राजनेता चुन कर आते हैं और किस भाषा का प्रयोग करते हैं आप सब से तो छिपा ही नहीं है। "मतलब देश लगातार दुखों को सह रहा है।" जब इस देश में हर पद, ओहदे और पदवी के लिए एक शारीरिक, शैक्षिक और आयु का मानदंड है, तो राजनीति में क्यों नहीं? यह बात आज तक गले के नीचे नहीं उतरती। राजनीति में भी एक मापदंड होना चाहिए कि कोई भी नेता पहले एक स्नातक या समकक्ष हो और मंत्री पद के लिए उसके पास उस क्षेत्र की परा स्नातक योग्यता या समकक्ष तकनीकी निपुणता हो और जिस विभाग का मंत्रिपद उसे दिया जा रहा है उसका उपमंत्री पद का कुछ वर्ष का अनुभव हो।
दीपक शर्मा,deepakshandiliya@gmail.com
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