चंद्रकांता संतति- 303वीं किस्त
बाबाजी ने उन लोगों की तरफ देखकर कहा, नानक को मैं ठिकाने पहुंचा आया हूं। बड़ा भारी ऐयार निकला, हम लोग उसका कुछ न बिगाड़ सके। खैर, उसे गंगा किनारे उसी जगह पहुंचा दो जहां वह बजरे से उतरा था, उसके लिए कुछ खाने की चीज भी वहां रख देना। इतना कहकर बाबाजी वहां से लौटे और महारानी के पास पहुंचे। इस समय महारानी का दरबार उस ढंग का न था और न कुछ भीड़-भाड़ ही थी।
सिंहासन और कुर्सियों का नाम-निशान न था, केवल फर्श बिछा हुआ था जिस पर महारानी रामभोली और वह औरत जिसके घोड़े पर सवार हो रामभोली नानक से जुदा हुई थी, बैठी आपस में कुछ बातें कर रही थी। बाबाजी ने पहुंचते ही कहा, मैं नहीं समझता था कि नानक इतना बड़ा धूर्त और चालाक निकलेगा। धनपति ने कहा था कि वह बहुत सीधा है, सहज ही में काम निकल जाएगा, व्यर्थ इतना आडम्बर करना पड़ा।