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  • प्राइम टाइम इंट्रो : टिकट बंटवारे में जमकर चला परिवारवाद
    अब मतदाता को तय करना है कि वो चुनाव में सरकार चुने या उम्मीदवार चुने. उम्मीदवार चुनते वक्त दल-बदल, परिवारवाद का भी इलाज करे. वैसे मतदाता का काम उम्मीदवार चुनना होता है, सरकार चुनना उसका काम नहीं है. आप मतदाता ही बता सकेंगे कि राजनीति और राजनीतिक दल के भीतर प्रतिभाओं को कौन ज़्यादा रोक रहा है. पैसा या परिवारवाद.
  • उत्तर प्रदेश में गठबंधन की खिचड़ी हमेशा कड़वी साबित हुई...
    उत्तर प्रदेश में एक बार फिर चुनावी गठबंधन की खिचड़ी पकाने की तैयारी चल रही है. हालांकि इस प्रदेश के पिछले 25 सालों के इतिहास पर नजर डालें तो यह साफ हो जाता है कि यहां गठबंधन की खिचड़ी हमेशा कड़वी ही साबित हुई है. गठबंधन चुनाव पूर्व किया गया हो या फिर बाद में, अल्प समय बाद ही नतीजे दरार के रूप में ही सामने आए हैं.
  • नोटबंदी की नाकामी से परेशान दिखेगा बजट : पार्ट 2
    जिस दिन नोटबंदी का ऐलान हुआ था तब पता नही चल पा रहा था कि सरकार के मन में क्या है. लेकिन उसके कारणों को अब जरूर समझा जा सकता है. सबको पता है कि अपनी सरकार शुरू से ही जिस तरह की मुश्किल में पड़ी है उससे निजात के लिए उसे बस ढेर सारे पैसे की जरूरत थी, उसी से वादे पूरे होने थे. लेकिन नोटबंदी के जरिए ढेर सारा काला धन बरामद करने में सरकार फेल हो गई
  • यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन से किसे क्या मिलेगा?
    यह प्रदेश में एक दशक से भी अधिक समय के बाद किन्हीं दो बड़े राजनीतिक दलों के बीच चुनावी गठबंधन है और ख़ास बात यह है कि इसकी घोषणा होने से पहले कांग्रेस ने प्रदेश की सपा सरकार को ही लपेटते हुए आक्रामक तौर पर अपना जनसंपर्क और सभा कार्यक्रम शुरू कर दिया था.
  • मानव श्रृंखला का बड़ा संदेश यही है,  'बिहार में बदलाव है नीतीश कुमार हैं'
    बिहार में विधानसभा चुनाव के पहले जनता दल यूनाइटेड का एक नारा था, "बिहार में बहार हैं नीतीशे कुमार हैं", लेकिन शनिवार को नीतीश कुमार के शराबंदी से नशाबंदी तक के कार्यक्रम की सफलता के बाद ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 'बिहार में बदलाव हैं नीतीशे कुमार हैं'. इस पूरी मानव श्रृंखला को एक दिन के इवेंट के रूप में देखना शायद नाइंसाफी होगी.
  • बजट पर सबसे कम ध्यान रहा इस साल - भाग एक
    आमतौर पर देश के सालाना बजट पर सोचने विचारने का काम डेढ़ दो महीने पहले से शुरू हो जाता था. लेकिन इस साल नोटबंदी ने देश को इस कदर उलझाए रखा कि यह काम रह ही गया. वैसे नवंबर के दूसरे हफ्ते में नोटबंदी करते समय सरकार के सामने इस साल का बजट ही रहा होगा. सबको पता है कि पिछले साल बजट बनाने में सरकार कितनी मुश्किल में पड़ गई थी.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : अमेरिका में ट्रंप आगमन का मंगलाचरण
    अमेरिका में ट्रंपागमन का मंगलाचरण शुरू हो चुका है. चुनाव के दौरान ट्रंप ने कहा था कि वे अमेरिका को फिर से महान बनाएंगे. अब कह रहे हैं कि भूतो न भविष्यति टाइप महान बना देंगे. समर्थक नारे लगाते हैं कि अमेरिका को महान बना दो, ट्रंप कहते हैं बना देंगे. बना देंगे. ग्रेट और ग्रेटर कंट्री का इतिहास युद्ध का इतिहास रहा है. उस ताकत को हासिल करने का इतिहास रहा है जिसे लिखने के लिए दुकानें ही नहीं खोलनी होती हैं, तोपें भी चलानी होती हैं.
  • सांडों का खेल, संविधान फेल : जल्लीकट्टू विवाद पर 10 अहम सवाल...
    सरकार और अदालत आम जनता के जीवन और रोज़गार के संवैधानिक अधिकार को लागू नहीं कर पाए, जिस कारण देश में 30 करोड़ लोग जानवरों से बदतर जीवन जी रहे हैं.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या पत्रकारों की विश्वसनीयता कठघरे में?
    पत्रकार को चमचा होने की ज़रूरत नहीं है. उसे संदेहवादी होना चाहिए. मतलब सरकार के हर दावे को संदेह की निगाह से देखे. यह वाक्य अमेरिका के अस्ताचल राष्ट्रपति ओबामा का है. पद छोड़ने से 48 घंटे पहले ओबामा ने व्हाइट हाउस के पत्रकारों से बात करते हुए अंग्रेज़ी में इस वाक्य को यूं कहा, "You are not supposed to be sycophants, you are supposed to be skeptics."
  • क्या उम्मीदों को पूरा करेगा आने वाला आम बजट 2017...?
    यह भी रोचक है कि बजट पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने के बाद आ रहा है, और ऐसे संकेत दिए गए हैं कि इन पांच राज्यों से संबंधित कोई विशिष्ट घोषणाएं नहीं की जाएंगी. लेकिन फिर भी, कुल मिलाकर इस बजट से देश के हर व्यक्ति को बड़ी उम्मीदें हैं, क्योंकि विमुद्रीकरण के बाद घरों के और व्यापार के बजट में आए भूचाल के बाद अब देश के बजट से ही स्थिति संभलने की उम्मीद है.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : चुनाव से पहले दल-बदल का दलदल
    बीजेपी ने सफाई न दी होती तो 91 साल की उम्र में तिवारी दलबदल कर रिकार्ड बना देते. कुछ समय पहले तक अपने पुत्र को लेकर सोनिया गांधी से मिलते रहे तिवारी अमित शाह से मिल गए. दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहने वाले वे अकेले कांग्रेसी हैं. भले ही तिवारी ने बीजेपी की सदस्यता न ली हो लेकिन ऐन चुनाव के वक्त कोई नेता दूसरी पार्टी के अध्यक्ष के घर पर कॉफी पीने नहीं जाता है. उन्होंने सदस्यता फॉर्म भले न भरा हो मगर बेटे की खातिर वे कांग्रेस की काया से निकल कर बीजेपी की काया में प्रवेश कर ही गए होंगे.
  • 1 फरवरी को पेश होने की वजह से 'खास' बजट में क्या-क्या है मुमकिन
    इस बार का बजट कैसा होना चाहिए, इसके अनुमान के लिए हमारे पास फिलहाल दो सबसे प्रमुख तत्व हैं. इनमें से एक आर्थिक है, तो दूसरा विशुद्ध राजनीतिक. आर्थिक के केंद्र में है - विमुद्रीकरण के बाद बनी देश की आर्थिक तस्वीर. राजनीतिक फ्रंट पर तात्कालिक रूप में पांच राज्यों के चुनाव हैं.
  • उसका फिर बरी होना : अब तो न्याय की देवी को देखना चाहिए
    भारत की जनता को दो फैसले लेने चाहिए. एक, न्याय की देवी की जो मूर्तियां अदालतों के सामने लगी हैं, उनकी आंखों से पट्टी को अब खोल दिया जाए, जिससे वे सच को सच की तरह देख सकें, दूसरे, उसके हाथ में जो तलवार है, उसे छीन लिया जाए, जिससे वह तराजू के किसी पलड़े में रखे पैसों को दूर फेंक सके.
  • पंचर साइकिल संग कांग्रेस, परिवारवाद संग बीजेपी...
    दरअसल भारतीय राजनीति में आदर्श और विचारधारा एक तमाशा है. संगठन और कार्यकर्ता सबसे बड़ा मिथक. जनता को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता. राजनीतिक दल इंटरनेट की तरह ओपन प्लेटफॉर्म हैं. कोई भी बीजेपी से आईपी अड्रेस खरीद कर अपनी वेबसाइट बना सकता है. दूसरे दलों के साथ भी यही है.
  • बजट: नोटबंदी के असर से परेशां अर्थव्यवस्था व आम आदमी, चाहिए राहत
    केंद्रीय बजट क्या होगा, इसका सीधा असर हमारे-आपके घरेलू बजट पर पड़ता है. इस बार आम बजट पर आम आदमी से लेकर उद्योग जगत की पेशानी पर हर बार के मुकाबले कुछ अधिक बल हैं.
  • प्राइम टाइम इंट्रो : मोहसिन शेख हत्याकांड के तीन आरोपियों को जमानत पर सवाल
    सांप्रदायिकता और कट्टरता इन दो तत्वों को लेकर हमेशा क्लियर रहना चाहिए. ये दोनों ही तत्व बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों पाले में मिलेंगे. एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त होते हैं. बहुसंख्यक सांप्रदायिक गिरोह अपनी सांप्रदायिकता नहीं देखेगा, लेकिन अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता की तरफ इशारा करेगा.
  • क्या उत्तर प्रदेश की राजनीति भी बदल डालेंगे अखिलेश यादव...?
    अखिलेश सपा की राजनीति के साथ ही यूपी की राजनीति भी बदल सकते हैं... यही नहीं, कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अखिलेश ने एक ऐसी राजनैतिक पहल की है, जिसके बाद बीजेपी को अपनी रणनीति बदलनी ही होगी...
  • 2017 गांधी के चरखे के सौ साल : बहन गंगाबाई ने जिसे खोज निकाला था
    गांधी का चरखा जिस साल सौ साल पूरे कर रहा है उसी साल में चरखे पर उनकी जगह प्रधानमंत्री की तस्वीर छप जाने को लेकर विवाद हो रहा है. सौ साल के फासले में हम कितना कुछ भूल गए कि याद ही नहीं रहा कि 1917 में ही गांधी को चरखा मिलने की उम्मीद जगी थी.
  • अखिलेश को मिली सपा की विरासत, क्या होगा मुलायम सिंह का भविष्य...
    क्या ‘साइकिल’ चुनाव चिन्ह मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव फिर से चुनावी रेस में आगे आ सकते हैं? क्या उनके ऊपर अपने पिता मुलायम सिंह यादव की पार्टी और उनके चुनाव चिन्ह पर कब्जा कर लेने का आरोप उन्हें नुकसान पहुंचाएगा? और क्या अब अखिलेश एक भावनात्मक अपील करते हुए अपने पिता से यह कहेंगे कि पार्टी तो मुलायम की ही है, और तीन महीने बाद – फिर से सत्ता हासिल करके – वे (मुलायम) ही फिर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे?
  • उत्तर प्रदेश के दंगल में सुल्तान बनेगा लोकतंत्र...
    उत्तर प्रदेश के चुनाव, चाहे वे लोकसभा के हों या विधानसभा के, उस पर उस प्रदेश की ही नहीं बल्कि पूरे देश की नजर हमेशा से ही रही है, सो इस बार भी है. गणना वाली राजनीतिक प्रणाली में सबसे बड़ी जनसंख्या वाले राज्य की हैसियत भी बड़ी हो जाती है, वह तो है ही, लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम और चुनावी परिदृश्य, दोनों अपने अंदर इससे कई गुना अधिक अर्थों को समेटे हुए हैं.

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