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सज्जन कुमार 29 साल बाद दंगों के आरोप से बरी

 
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1984 anti-Sikh riots: Sajjan kumar acquitted by court in one case

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नई दिल्ली: िल्ली की एक अदालत ने वर्ष 1984 के सिख विरोधी दंगे से संबंधित एक मामले में मंगलवार को कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को बरी कर दिया, जबकि अन्य पांच को दोषी करार दिया। फैसला आने के बाद अदालत के बाहर नाराजगी, प्रदर्शन, दुख व आंसू भी देखे गए। एक गुस्साए व्यक्ति ने अदालत के कक्ष में न्यायाधीश पर जूता भी फेंका।

राष्ट्रीय राजधानी और अन्य हिस्सों में दंगों के दौरान 3000 से ज्यादा लोगों की जाने के करीब तीन दशक बाद सज्जन कुमार आरोपों से बरी हुए हैं।

जिला न्यायाधीश जेआर आर्यन की अदालत ने 31 अक्टूबर, 1984 को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ भड़के दंगे के दौरान दिल्ली कैंट इलाके में पांच लोगों की हत्या से जुड़े मामले में सज्जन कुमार को बरी कर दिया, जबकि पांच अन्य- बलवान खोक्कड़, महेंद्र यादव, गिरधारी लाल, किशन खोक्कड़ तथा कैप्टन भागमल को दोषी करार दिया।

कांग्रेस नेता को बरी किए जाने पर पीड़ित परिवार और राजनीतिक नेताओं दोनों तरफ से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने सिख विरोधी दंगा मामलों की जांच के लिए सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दस्ते (एसआईटी) से जांच की मांग की। अदालत के फैसले पर सज्जन कुमार ने कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया।

कड़कड़डूमा अदालत के बाहर विरोध प्रदर्शन के लिए भीड़ जमा हो गई। कांग्रेस के खिलाफ शर्म-शर्म के नारे लगाते हुए कुछ लोग अदालत परिसर में घेरा फांद कर प्रवेश कर गए।

ऑल इंडिया सिख फेडरेशन के अध्यक्ष करनैल सिंह पीर मोहम्मद ने न्यायाधीश पर जूता उछाल दिया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है और उनके खिलाफ धारा 186 (लोक सेवक को अपना कर्तव्य निर्वाह करने से रोकने) और 353 (हमला या लोक सेवक को कर्तव्य निर्वाह करने से रोकने के लिए आपराधिक बल प्रयोग) के तहत मामला दायर किया गया है।

मोहम्मद के वकील ने संवाददाताओं से कहा, "उनका इरादा न्यायाधीश को चोट पहुंचाना नहीं था, बल्कि वे न्याय दिलाने में विफल रही न्यायिक प्रणाली के खिलाफ गुस्से का इजहार कर रहे थे।"

सज्जन तथा दोषी करार दिए गए पांच अभियुक्तों पर दंगों के दौरान भीड़ को सिखों के खिलाफ भड़काने तथा षडयंत्र करने आरोप था।

आरोपी किशन खोक्कड़ और महेंद्र यादव को धारा 147 (दंगा) और धारा 148 (खतरनाक हथियारों से लैस हो कर दंगा) करने जबकि अन्य आरोपियों बलवान खोक्कड़, गिरधारी लाल और कैप्टन भागमल को धारा 147, 148 और 302 (हत्या) दोषी ठहराया गया है।

दंगों की जांच के लिए गठित जीटी नानावती आयोग की सिफारिश पर सज्जन कुमार के खिलाफ 2005 में मामला दर्ज किया गया था।

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने सज्जन कुमार एवं अन्य के खिलाफ 2010 में दो आरोप पत्र दाखिल किया था।

यह मामला एक ही परिवार के सिख समुदाय के पांच लोगों केहर सिंह, गुरप्रीत सिंह, रघुवेंदर सिंह, नरेंदर पाल सिंह और कुलदीप सिंह की हत्या से संबंधित था। सभी हत्या दिल्ली कैंट के राज नगर इलाके में भीड़ ने कर दी थी।

केहर और गुरप्रीत इस मामले की शिकायतकर्ता और प्रत्यक्षदर्शी जगदीश कौर के क्रमश: पति और बेटे थे। रघुवेंदर, नरेंदर और कुलदीप शिकायतकर्ता के भाई थे।

अदालत के फैसले पर सिख समुदाय के लोगों ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्हें सज्जन कुमार के खिलाफ फैसला आने की उम्मीद थी। अदालत परिसर में कांग्रेस के खिलाफ नारेबाजी भी सुनी गई और कुछ लोगों ने नाकेबंदी तोड़कर परिसर के भीतर दाखिल होने की कोशिश की।

एक नाराज सिख ने कहा, "कांग्रेस हत्यारों की पार्टी है, हालांकि हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन हम फैसले से दुखी हैं। हमें कभी नहीं लगा कि सज्जन कुमार बरी हो जाएंगे।"

अदालत के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने कहा, "जब गुजरात दंगों की जांच सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में एसआईटी से कराई जा सकती है तो सिख विरोधी दंगों की जांच क्यों नहीं हो सकती है। आखिर दोनों दंगों को अलग-अलग तरह से क्यों लिया गया है।"

शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख और पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने आरोप लगाया कि सदी के सबसे बड़े नरसंहार के 29 वर्ष बाद दिल्ली पुलिस और सीबीआई की कांग्रेस के प्रति भक्ति के कारण न्याय की आशा धूमिल हो गई।

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