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दया याचिका पर फैसले में देरी के कारण फांसी को उम्रकैद में बदला SC ने

 
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Delay in deciding mercy petition, Supreme Court commutes death sentence
नई दिल्ली: ुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत दो हत्याओं के दोषी करार दिए गए व्यक्ति की सज़ा को इस आधार पर फांसी से घटाकर उम्रकैद में तब्दील कर दिया है, क्योंकि उसकी दया याचिका को खारिज करने में राष्ट्रपति कार्यालय ने बेहद लंबा समय लिया।

दरअसल, एमएन दास नामक इस हत्यारे पर असम में वर्ष 1990 में एक व्यक्ति की हत्या का आरोप था, और इसके छह साल बाद जब वह जमानत पर आज़ाद था, उसने एक और व्यक्ति की हत्या कर दी थी। इन हत्याओं के लिए दोषी करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ही उसे वर्ष 1999 में फांसी की सज़ा सुनाई थी। लेकिन इसके बाद उसकी दया याचिका तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने उस समय खारिज की, जब याचिका दायर किए हुए 11 साल का समय बीत चुका था।

इस मामले में अब एमएन दास के वकील ने फांसी की सज़ा पाए अन्य अभियुक्तों की ही तरह 'देरी मृत्यु से बदतर है' का तर्क दिया था, और पुनर्विचार की अपील की थी। न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली पीठ ने दास के आवेदन को स्वीकार कर लिया।

उल्लेखनीय है कि पिछले ही महीने 11 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में वर्ष 1993 में हुए बम धमाके के दोषी पंजाब के आतंकवादी देविंदर पाल सिंह भुल्लर की अपील में दिए गए इसी तर्क को खारिज कर दिया था। बम धमाका करके नौ लोगों की हत्या करने के दोषी करार दिए गए भुल्लर की दया याचिका पर फैसला लेने में राष्ट्रपति कार्यालय ने आठ साल का समय लिया था। इस मामले में दायर की गई भुल्लर की याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दया याचिकाओं पर निर्णय में देरी का हवाला देकर कोई आतंकवादी दया की उम्मीद नहीं कर सकता है।

अब इस फैसले का असर फांसी की सज़ा पाए 15 से भी ज़्यादा लोगों की याचिकाओं पर पड़ सकता है, जिनमें भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के तीन दोषी, जो तमिलनाडु की जेल में बंद हैं, तथा कुख्यात चंदन तस्कर वीरप्पन के कर्नाटक की जेल में बंद चार साथी शामिल हैं।

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