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डीजल, गैस के दाम उनके बाजार मूल्य के अनुरूप रखने की जरूरत : 12वीं योजना

 
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नई दिल्ली: 12वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेजों में तेल और गैस के दाम नियंत्रण मुक्त करने की वकालत की गई है और अनुमान लगाया गया है कि तेल व गैस के दाम ऊंचे बने रहेंगे तथा योजना के दौरान आयात पर निर्भरता भी भी बढ़ेगी।

योजना के दस्तावेजों में कहा गया है कि ऐसे में क्षेत्र की बेहतरी के लिए जितना जल्द हो सके तेल और गैस के घरेलू दाम उनके बाजार मूल्य पर छोड़ दिए जाने चाहिए।

12वीं योजना दस्तावेज के अनुसार ‘‘योजनावधि के दौरान देश में पेट्रोलियम पदार्थों की खपत में 4.7 प्रतिशत औसत सालाना वृद्धि होने का अनुमान है। इस दौरान इनकी खपत 2011-12 के 14.79 करोड़ टन से बढ़कर योजना के अंतिम वर्ष 2016-17 तक 18.62 करोड़ टन तक पहुंच जाएगी। डीजल की मांग सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ेगी, उसके बाद पेट्रोल और फिर एलपीजी सिलेंडर की खपत बढ़ेगी।’’

योजना दस्तावेज के अनुसार पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बाजार के अनुरूप तय होने से उपभोक्ता और उत्पादक दोनों को ही उचित संकेत जाएगा और इससे सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को नई परियोजनाओं के लिए आंतरिक स्रोतों से ही संसाधन जुटाने में काफी मदद मिलेगी। दाम खुले बाजार पर छोड़ दिए जाने के बाद इसमें निजी कंपनियां भी आएंगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

हालांकि, इसमें यह भी कहा गया है कि मूल्य प्रणाली में सुधार करते समय गरीब और वंचित तबके का ध्यान रखा जाना चाहिए। यह काम कई तरह से किया जा सकता है। इसके लिए सभी को सामान्य सब्सिडी देने की आवश्यकता नहीं है।

दस्तावेज में कहा गया है कि 12वीं योजनावधि में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को डीजल, रसोई गैस और दूसरे उत्पादों की बिक्री पर कुल 8,32,737 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है।

पेट्रोलियम पदार्थों की बिक्री पर तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ते रहने से उनकी वित्तीय स्थिति बिगड़ रही है और नई परियोजनाओं के लिए उन्हें धन मिलने में समस्या आ रही है।

दस्तावेज में कहा गया है कि 12वीं योजना के पहले वर्ष में पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य स्थिति सुधार की दिशा में कुछ कदम उठाए गए। डीजल के दाम पांच रुपये लीटर और सस्ते सिलेंडर की आपूर्ति सीमित की गई। लेकिन इससे तेल कंपनियों का नुकसान पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

‘‘इस दिशा में यदि आगे और कदम नहीं उठाए जाते हैं, और वैश्विक बाजार में दाम मौजूदा स्तर पर ही रहते हैं, तब भी 12वीं योजना में कंपनियों की कुल ‘अंडर रिकवरी’ 8.32 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। यह स्थिति व्यावहारिक नहीं होगी।

योजना दस्तावेज के अनुसार 12वीं योजना में कच्चे तेल का उत्पादन मामूली रूप से बढ़ेगा और योजना के अंतिम वर्ष इसमें 3.26 प्रतिशत की गिरावट आएगी। परिणामस्वरुप पेट्रोलियम पदार्थों के आयात पर निर्भरता जो कि 11वीं योजना के अंतिम वर्ष 2011-12 में 76.6 प्रतिशत थी, 12वीं योजना के अंत तक बढ़कर 77.8 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी।

12वीं योजना के दौरान 2013-14 में कच्चे तेल का उत्पादन 4 करोड़ 55 लाख टन तक बढ़ने के बाद अंतिम वर्ष 2016-17 में घटकर 4 करोड़ 11 लाख टन रह जाने की आशंका है। यह गिरावट सार्वजनिक क्षेत्र की ओएनजीसी, संयुक्त उपक्रमों तथा निजी क्षेत्र की कंपनियों के उत्पादन में आने वाली गिरावट की वजह से आएगी। केवल ऑयल इंडिया का उत्पादन इस दौरान लगातार बढ़ने की उम्मीद है।

पांच वर्ष की अवधि में प्राकृतिक गैस की मांग में औसतन 19.2 प्रतिशत सालाना वृद्धि का अनुमान है। बिजली, उर्वरक और दूसरे उद्योगों में ईंधन के रूप में गैस की मांग बढ़ने और शहरी गैस नेटवर्क का विस्तार होने से भी गैस की मांग बढ़ेगी। योजना के अंतिम वर्ष तक देश के 300 शहरों में घरों की रसोई तक सीधे गैस नेटवर्क का विस्तार होने की संभावना है।

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