बहुत धीरे-धीरे सुरूर देती है 'कॉकटेल'...
अब कहानी शुरू होती है... लंदन में एक-एक कर तीनों किरदार एक-दूसरे से मिलते हैं... एक साथ में खुशियों के पल बांटते हैं... लेकिन जब इन तीनों के दिलों में एक-दूसरे के लिए सच्चे प्यार की भावनाएं आ जाती हैं, सबकी ज़िन्दगी दुख से भर जाती है...
धीमी शुरुआत वाली डायरेक्टर होमी अदजानिया की 'कॉकटेल' का फर्स्ट हाफ बेहद मज़ेदार है... दीपिका, सैफ, सैफ के मामा बने बोमन ईरानी, और मां के रोल में डिम्पल कपाड़िया पर कई ज़ोरदार सीन्स हैं, और इन किरदारों के वन-लाइनर्स तो आपको हंसा-हंसाकर लोटपोट कर देंगे...
प्यार की साइकोलॉजी समझने में इम्तियाज़ अली का कोई सानी नहीं, जिन्होंने साजिद अली के साथ यह फिल्म लिखी है... इम्तियाज़ ने प्यार की छोटी से छोटी फीलिंग को भी बेहद बारीकी से पेश किया है...
दीपिका पादुकोण ने आश्चर्यजनक ढंग से फैशनेबल ज़िन्दगी से लबालब और साफदिल लड़की का बेहतरीन किरदार निभाया है... नई एक्ट्रेस डायना पेंटी भी इम्प्रेसिव रही... सैफ अली खान तो अपने करियर की शुरुआत से ही फ्लर्ट के रोल में जमते आए हैं... ऊपर से प्रीतम का म्यूज़िक भी कमाल का है...
लेकिन दुख होता है, जब इंटरवल तक इतनी इम्प्रेसिव रही फिल्म सेकंड हाफ में कुछ ही समय बाद डूबने लगती है... लव ट्राएंगल (प्रेम त्रिकोण) अपने साथ उदासी लेकर आता है, लेकिन काश, उदासी के साथ बोरियत मुफ्त न मिलती... लगने लगता है, जैसे सेकंड हाफ में राइटर-डायरेक्टर के पास कहने को कहानी ही नहीं बची थी, इसीलिए सैफ, दीपिका और डायना के किरदारों को उन्होंने लम्बे-लम्बे डायलॉग्स से लाद दिया...
इस 'कॉकटेल' के सुरूर का एहसास आपको बहुत धीरे-धीरे होता है, सो, अगर आपमें इतना सब्र है तो 'कॉकटेल' आपके लिए है... फिल्म के लिए हमारी रेटिंग है - 2.5 स्टार...
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