उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी 'ज़िला गाज़ियाबाद'
फ़िल्म फौजी और सतबीर के बीच गैगवॉर की कहानी है, जिसे खत्म करना चाहते हैं, प्रीतम सिंह यानी संजय दत्त। खबरों के मुताबिक यह फ़िल्म 90 के दशक में गाज़ियाबाद में घटी कुछ सच्ची घटनाओं पर आधारित है, पर जब इसे फ़िल्म का रूप दिया गया, तो यह 80 और 90 के दशक की बॉलीवुड फ़िल्म के रूप में उभरी।
निर्देशक आनंद कुमार 'दबंग' 'सिंघम' और 'ओमकारा' जैसी फ़िल्मों से काफ़ी प्रेरित दिखे, तभी तो स्टार्स का इंट्रोडक्शन सीन, गाने और कोरियोग्राफ़ी इन फ़िल्मों से मिलती-जुलती नज़र आई। फ़िल्म में आइटम सॉन्ग ज़बरदस्ती डाले हुए नज़र आते हैं। फ़िल्म इंटरवल के बाद थोड़ी संभलती नज़र आती है, लेकिन तब तक खेल खत्म हो चुका होता है।
अब बात अभिनय की। अरशद वारसी का अभिनय क़ाबिल−ए तारीफ़ है। संजय दत्त भी कुछ सीन्स में अच्छे दिखे, पर लगता है डायरेक्टर ने उनसे वो करवा दिया, जो शायद उनके बस की बात नहीं। मसलन उनका टाइटल सॉन्ग पर नाचना या कुछ ऐसे एक्शन सीन्स, जिन्हें सही ढंग से अंजाम तक नहीं पहुंचाया गया। रवि किशन की अदाकारी अच्छी रही।
फ़िल्म में आशुतोष राणा जैसे एक्टर का इस्तेमाल ढंग से नहीं हुआ। कई सीन्स में बजट की कमी नज़र आई। मसलन फ़िल्म के इफेक्ट्स और संगीत शोर मचाते नज़र आए। कुल मिलाकर यह एक साधारण फ़िल्म है, इसलिए फ़िल्म को हमारी ओर से 2 स्टार...
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