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अन्ना...! और भी हैं तरीके लड़ाई के, राजनीति के सिवाय...

 
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अन्ना...! और भी हैं तरीके लड़ाई के, राजनीति के सिवाय...
अन्ना हजारे और उनकी टीम ने नारियल पानी पी लिया है और उनका कहना है कि अब वे नई ताकत के साथ 'कीचड़ में उतरकर कीचड़ की सफाई' करेंगे। लोगों को शक है कि कीचड़ की सफाई करते समय वे खुद कितना कीचड़ से बचेंगे... लेकिन टीम अन्ना का दावा है कि वे 'जरूर' बचे रहेंगे।

अरविंद केजरीवाल ने कई तरीके बताए भी हैं कि कैसे वे खुद को 'कालिमा' से बचाएंगे। केजरीवाल का कहना है कि उनका उद्देश्य सत्ता हथियाना नहीं है। दिल्ली केंद्रित सरकार को खत्म कर वे सरकार को गांवों में और लोगों के पास ले जाना चाहते हैं। उनके दल में कोई भी हाईकमान नहीं होगा, घोषणा पत्र को जनता ही बनाएगी... और खास बात यह कि जिन पार्टियों के नेता अपने दल में 'घुटन' महसूस कर रहे हों वे उनके 'देशभक्त आंदोलन' में शामिल हो सकते हैं। इतना सब करने के बाद उनके अनुसार अगले तीन सालों में भारत 'बदल' जाएगा।

इतने 'साफ' और 'सुलझे' हुए दृष्टिकोण का यह नमूना हाल-फिलहाल की राजनीति में बिल्कुल नई बात है। लेकिन, ये हो सकता है कि यह संभव हो... शायद हो भी जाए...। लेकिन इस आदर्श स्थिति को पाने के लिए किए जाने वाले 'ईमानदार' प्रयासों की तीव्रता और क्षमता पर कई सवालिया निशान दिखते हैं।

नेताओं की मानें तो एक सीट पर चुनाव लड़ने के लिए कम से कम 60 लाख रुपयों की जरूरत पड़ती है और इसमें काला धन जोड़कर यह पांच-छह करोड़ का आंकड़ा बनता है। चुनाव लड़ने के दौरान यह 'जरूरी' धन और इसे पाने के लिए 'बल' वह कहां से लाएंगे, इसके बारे में उन्होंने कोई खास खुलासा नहीं किया है। इसके अलावा सबसे बड़ी चुनौती सभी विधानसभाओं और संसद के लिए प्रत्याशियों के चरित्र की 'गारंटी' है। अन्ना अपनी गारंटी ले सकते हैं, केजरीवाल भी ले रहे हैं... लेकिन बाकियों का क्या होगा।

छीछालेदार राजनीति के शिकार वे होंगे, इसमें कोई शक नहीं है। आरोप लगने के बाद कितने लोगों को वे वापस लेंगे...और कब तक उनके साफ चरित्र होने का सर्टिफिकेट प्राप्त करने का इंतजार करेंगे। और सबसे खास बात... जिन लोगों पर आरोप लगेंगे उनका विकल्प वे कितना बेहतर और कितनी जल्दी उपलब्ध करा पाएंगे। इन सवालों के जवाब या तो टीम अन्ना ने सोचे नहीं हैं या अभी तक बताए नहीं हैं। हो सकता है आने वाले दिनों में इससे निपटने का कोई 'फॉर्मूला' उनके पास हो लेकिन अभी तक इस पर अंधेरा ही दिखता है।

फिलहाल वे चंद उन लोगों से एसएमएस मांगकर राजनीतिक फैसले कर रहे हैं जो वोट देने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। हर चुनाव में वोट डालने वाले 60 फीसदी लोग तो एसएमएस करते ही नहीं हैं।

तब फिर कैसे इस लड़ाई को जारी रखा जा सकता था...

कई तरीके थे और हैं... लेकिन उनके लिए धैर्य होना चाहिए और महत्वाकांक्षाओं को परे रखने की जरूरत है।

हमारे करीब 60 साल पुराने लोकतंत्र में एक राजनीतिक लड़ाई और एक सामाजिक लड़ाई लड़ने के तौर-तरीके अलग-अलग हो गए हैं। राजनीति पर सामाजिक रूप से दबाव बनाया जाना ज्यादा आसान और संभाव्य के नजदीक होता है। राजनीतिक पार्टियों पर सामाजिक दबाव बनाकर चीजें हासिल की जा सकती हैं। बेहतर होता अन्ना और उनकी टीम इस दिशा में और प्रयास करती। यह तय करने में लोगों की मदद करती कि कौन संसद और विधानसभाओं में जाने के काबिल है और किसे जाने से रोकना है। इसे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर किया जा सकता था। 'राइट टू रिजेक्ट' का उनका हथियार था, उसका उपयोग करने पर जोर दिया जा सकता था... जो कमियां हैं उन्हें दूर करने की लड़ाई भी लड़ी जा सकती है। परिणाम आते... धीरे-धीरे आते, लेकिन जरूर आते, लोग पहले से भी कई दबाव समूहों के प्रभाव में वोट करते आए हैं। बाद में उन्होंने बदलाव भी किए हैं।

अन्ना के आंदोलन से, खासकर पहले चरण से, काफी लोगों ने सीख ली... वे राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक लगे। इस चरण के बाद कुछ राज्यों में हुए चुनावों पर उसका साफ असर भी दिखा। लेकिन अब राजनीति में कूदने के बाद वे इस काम को कितना कर पाएंगे... यह सोचने लायक विषय है।

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार एक मुद्दा है... लेकिन सिर्फ एक मुद्दा ही है। इसके अलावा भी कई और मुद्दे हैं जो राजनीति को प्रभावित करते हैं। वोट डालने से पहले मतदाता भ्रष्टाचार के साथ-साथ कई दूसरे मसलों पर भी सोचता है और तब फैसला करता है।

अन्ना सिर्फ भ्रष्टाचार के मसले पर चुनाव लड़ेंगे और वोट भी चाहेंगे... तो उन्हें नहीं मिलेंगे।

धर्म, जाति, उपजाति और आरक्षण जैसे मसलों पर टीम अन्ना क्या रुख अपनाएगी और इसे कैसे वे अपनी प्रकृति के अनुरूप बनाएंगे, यह देखने वाली बात होगी।

छंटे हुए खांटी राजनीतिज्ञों के साथा 'चौसर का खेल' खेलने के बाद अन्ना और उनकी टीम का चीरहरण अवश्यंभावी लग रहा है। कौन 'कृष्ण' उन्हें बचाएगा इस चीर हरण से... यह भी देखने लायक होगा।

कुल मिलाकर अन्ना आंदोलन खत्म होता दिख रहा है। इस मोड़ पर, निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आंदोलन भटक गया है। बल्कि आंदोलन की 'मौत' हो चुकी है। बेहतर होता कि अन्ना लोगों को और ज्यादा राजनीतिक शिक्षा देते, उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिए और ज्यादा तैयार करते।

लेकिन, एक बात यह कही जा सकती है कि देश की युवा पीढ़ी के एक हिस्से को इस आंदोलन के जरिए यह बताने में अन्ना आंदोलन जरूर सफल हुआ कि कैसे किसी मसले पर जनमत जुटाया जाए... खासकर तब जब उसे फेसबुक और दूसरे गैजेट्स में सिर खपाने से फुरसत न मिल पाती हो...।

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