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'कांग्रेस के जातिवाद के जख्म की उपज हैं नीतीश कुमार'

 
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'कांग्रेस के जातिवाद के जख्म की उपज हैं नीतीश कुमार'
नई दिल्ली: कांग्रेस भले ही नीतीश कुमार के साथ लंबे समय से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रही हो लेकिन ऐसा लगता है कि वह इस तथ्य को भूल गई है कि बिहार के मुख्यमंत्री राजनीति में इस जख्म के साथ आए हैं कि पार्टी ने उनके पिता के साथ सही बर्ताव नहीं किया था।

यह दावा हाल में ही जारी एक पुस्तक में किया गया है। इसमें कहा गया है कि कांग्रेस ने कुमार के स्वतंत्रता सेनानी पिता रामलखन सिंह को बिहार विधानसभा के 1952 में हुए पहले विधानसभा चुनाव और 1957 के चुनाव में बख्तियारपुर सीट से टिकट देने से मना कर दिया था।

इससे आहत कुमार के पिता ने आखिरकार कांग्रेस छोड़ने का फैसला किया और कांग्रेस के खिलाफ जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े। हालांकि, उन्हें जीत नहीं मिली थी। यह दावा नीतीश के बचपन के मित्र अरुण सिन्हा द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘‘नीतीश कुमार एंड द राइज ऑफ बिहार’’ में किया गया है।

पुस्तक में दावा किया गया है, ‘‘नीतीश के दिमाग में कहीं न कहीं यह बात घर कर गयी कि उनके पिता के साथ कांग्रेस ने सही सलूक नहीं किया। उनके पिता अपने राजनैतिक जख्म की विरासत उन्हें सौंप गए।’’ नीतीश के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। वह पटना के बाहरी हिस्से में स्थित बख्तियारपुर में आयुर्वेदिक चिकित्सक थे।

महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने 1942 में अपनी चिकित्सा प्रैक्टिस छोड़ दी और भारत छोड़ो आंदोलन में कूद गए। उन्हें गिरफ्तार किया गया और गंभीर आरोपों के साथ जेल भेज दिया गया। कांग्रेस पार्टी का सक्रिय सदस्य होने के बावजूद 1951-52 के चुनाव में रामलखन को सूची से हटा दिया गया क्योंकि श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह के नेतृत्व वाले कांग्रेस के दो समूहों में से किसी ने भी सभी जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देने की अपनी समूची रणनीति में उन्हें उपयुक्त नहीं पाया। रामलखन पिछड़ी जाति का प्रतिनिधित्व करते थे।

दोनों गुटों के बीच एक ‘समझौते’ के बाद तारकेश्वरी सिन्हा (भूमिहार) को पटना पूर्व (बाद में बाढ़) सीट से टिकट दिया गया और एक कायस्थ उम्मीदवार सुंदरी देवी (दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की बहन) को बख्तियारपुर विधानसभा सीट से टिकट दिया गया। उन्होंने सुंदरी देवी की जीत के लिए कठोर प्रयास किया।

रामलखन की अनदेखी करते हुए दोनों सीटों से 1957 में फिर उन्हीं दोनों उम्मीदवारों को कांग्रेस ने मैदान में उतारा। हालांकि, रामलखन को 1957 के विधानसभा चुनाव में टिकट देने का वादा किया गया था लेकिन टिकट नहीं मिलने से वह काफी आहत हुए। पुस्तक में कहा गया है, ‘‘उनके सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने दोनों गुटों को सबक सिखाने का फैसला किया।’’

पुस्तक में कहा गया है कि रामलखन सिंह कांग्रेस छोड़कर रामगढ़ के राजा आचार्य जगदीश के नेतृत्व वाली जनता पार्टी में शामिल हुए और 1957 में बख्तियारपुर सीट से मैदान में उतरे। हालांकि, वह खुद पर्याप्त वोट नहीं हासिल कर सके लेकिन वह सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के हाथों कांग्रेस प्रत्याशी की हार सुनिश्चित कर गए क्योंकि कांग्रेस और जनता पार्टी के बीच वोट बंट गए। पुस्तक में दावा किया गया है कि ‘‘राजनीति की ओर नीतीश का आकर्षण कांग्रेस के प्रति नफरत से ही हुआ क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों में उसके मंत्रियों को अपना प्रभुत्व बढ़ाते और जनहित का बेहद कम खयाल रखते देखा गया।’’

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