मौत का डर जिंदगी जीने की इच्छा परिवार की चिंता और आईसीयू वॉर्ड का अकेलापन दोनों मरीजों को करीब ले आता है। आईसीयू के बाहर भी एक जैसे हालात मरीजों की पत्नियों को करीब ले आते हैं जो अलग-अलग बैकग्राउंड से हैं। आइडिया अच्छा है लेकिन कहानी छोटी-सी है इसमें टि्वस्ट और टर्न की कमी है। ज्यादातर सीन्स आईसीयू के अंदर या बाहर होने के कारण कहीं-कहीं ये मोनोटोनस भी लगती है लेकिन फ्लैशबैक खूबसूरती से डाले गए हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक में मौत का डर है। नवनी परिहार, अनंत महादेवन, रंजना सासा के अच्छे परफॉरमेंस लेकिन सौरभ शुक्ला गैंगस्टर के रोल में छाप छोड़ गए। क्लाइमैक्स बेहतरीन है जब मौत के साये में जिंदगी मुस्कुराहट के पल चुरा लेती है। यही फिल्म की जीत है….और इसके लिए मेरी रेटिंग है 3 स्टार।
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Neha Dixit reaches Switzerland