ब्रिटिश अख़बार ने मनमोहन को 'पालतू' कहा, फिर 'कठपुतली', फिर 'अंडर एचीवर'
NDTVcom,
Last Updated: जुलाई 16, 2012 02:29 PM IST
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नई दिल्ली से अमित चतुर्वेदी: कुछ ही दिन पहले 'टाइम' पत्रिका द्वारा अपने मुखपृष्ठ (कवर) पर भारतीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को 'अंडर एचीवर' बताए जाने की शर्मिन्दगी से केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) उबर भी नहीं पाया था, कि अब इंग्लैण्ड के प्रमुख दैनिक 'द इन्डिपेन्डेन्ट' ने बहुत स्पष्ट शब्दों में मनमोहन को कांग्रेस व यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का 'पालतू' बताया, हालांकि कुछ ही घंटे बाद उन्होंने अपने शीर्षक में 'पालतू' शब्द को हटाकर 'कठपुतली' लिख दिया, और फिर 'अंडर एचीवर'।
इस बीच, कांग्रेस पार्टी ने इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है, जिस दौर में दुनिया के तमाम देश आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं, उस दौर में मनमोहन सिंह शानदार नेतृत्व देते हुए देश को आर्थिक विकास की ओर आगे बढ़ा रहे हैं।
दो दशक पहले तक भारत को तरक्की और उदारीकरण के पथ ले जाने के लिए प्रशंसा के पात्र बने रहे प्रधानमंत्री के विषय में इस दैनिक पत्र ने पत्रिका 'टाइम' से भी एक कदम आगे जाते हुए 'मनमोहन सिंह : सेवियर ऑर सोनिया'ज़ पूडल' (मनमोहन सिंह : रक्षक या सोनिया का पालतू) शीर्षक से सोमवार को प्रकाशित आलेख में लिखा है, "मनमोहन सिंह की समस्याओं में से एक यह है कि उनके पास कोई वास्तविक राजनैतिक ताकत नहीं है, बल्कि उनकी प्रधानमंत्री के रूप में मौजूदगी सोनिया (गांधी) के कारण बनी हुई है... इसी के कारण कभी-कभी वह अपने कैबिनेट को भी नियंत्रित नहीं कर पाते हैं।"
बाद में समाचारपत्र ने अपने शीर्षक को बदलकर 'मनमोहन सिंह : इंडिया'ज़ सेवियर ऑर पपेट' (मनमोहन सिंह : भारत का रक्षक या कठपुतली), और भारतीय समयानुसार दोपहर को यह शीर्षक किया गया, 'मनमोहन सिंह : इंडिया'ज़ सेवियर ऑर जस्ट द अंडर-एचीवर' (मनमोहन सिंह : भारत का रक्षक या सिर्फ अंडर-एचीवर)।
इन बदलते शीर्षकों के साथ पत्रिका में प्रकाशित आलेख के अनुसार, "उनके (मनमोहन की) सुधारों का जोश और उत्साह खत्म हो चुका है, और देश की तरक्की धीमी हो चुकी है। विपक्षियों के अनुसार उन्होंने ऐसे प्रशासन की अगुआई की, जो पूरी तरह भ्रष्टाचार में लिपटा हुआ साबित हुआ है। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी में से, भले ही अप्रत्यक्ष रूप से, बार-बार ऐसी मांग की जाती रही है कि उन्हें अपने उत्तराधिकारी माने जाने वाले राहुल गांधी के लिए गद्दी छोड़ देनी चाहिए।"
आलेख लिखने वाले एन्ड्रयू बनकॉम्ब (Andrew Buncombe) के मुताबिक, "हालांकि पूरे प्रशासन के लिए उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना अनुचित हो सकता है, लेकिन यदि वह इतिहास में अपने लिए बेहतर स्थान बनाना चाहते हैं, तो अब उन्हीं को कोई कदम उठाना होगा।"
उल्लेखनीय है कि पिछले ही सप्ताह पत्रिका 'टाइम' ने अपने एशिया संस्करण में कवर पेज पर मनमोहन की तस्वीर छापकर लिखा था, 'द अंडर एचीवर : इंडिया नीड्स अ रीबूट' (क्षमता से कम हासिल करने वाला : भारत को नए सिरे से करनी होगी शुरुआत)। पत्रिका ने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाते हुए देश के सुस्त आर्थिक विकास के लिए उनकी और उनकी सरकार की आलोचना की थी। पत्रिका ने कहा था कि वह निर्णायक ढंग से काम करने में विफल रहे हैं।
जुलाई 16, 2012 के इस अंक में 'ए मैन इन शैडो' शीर्षक से प्रकाशित पत्रिका के आमुख लेख (कवर स्टोरी) में कहा गया कि प्रधानमंत्री सुधारों पर 'जोखिम लेने के इच्छुक नहीं' हैं, जिससे देश विकास के पथ पर अग्रसर होता। पत्रिका में यह भी कहा गया था, "घरेलू व अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में निराशा पैदा हो रही है। महंगाई के कारण मतदाताओं का भी विश्वास डिग रहा है। एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों ने सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।"
पत्रिका में कहा गया, "मनमोहन, जिस पर विपक्षी दल नीतिगत फैसलों में रुकावट डालने का आरोप लगाते हैं, अपने मंत्रियों पर नियंत्रण करने में विफल रहे। अब वित्त मंत्रालय का प्रभार अपने पास होने के बावजूद वह आर्थिक सुधारों पर जोखिम लेने के इच्छुक नजर नहीं आते।"
पत्रिका ने लिखा, "ऐसे में, जबकि आर्थिक विकास में सुस्ती भारत के लिए ठीक नहीं है; वे कानून, जो नौकरियों का सृजन व विकास का मार्ग खोल सकते थे, संसद में अटके हैं। राजनेताओं ने चुनाव-जिताऊ लघुकालिक तथा लोकप्रिय साधनों पर ध्यान केंद्रित कर रखा है, जो चिंता का कारण है।"
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इस बीच, कांग्रेस पार्टी ने इस पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है, जिस दौर में दुनिया के तमाम देश आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं, उस दौर में मनमोहन सिंह शानदार नेतृत्व देते हुए देश को आर्थिक विकास की ओर आगे बढ़ा रहे हैं।
दो दशक पहले तक भारत को तरक्की और उदारीकरण के पथ ले जाने के लिए प्रशंसा के पात्र बने रहे प्रधानमंत्री के विषय में इस दैनिक पत्र ने पत्रिका 'टाइम' से भी एक कदम आगे जाते हुए 'मनमोहन सिंह : सेवियर ऑर सोनिया'ज़ पूडल' (मनमोहन सिंह : रक्षक या सोनिया का पालतू) शीर्षक से सोमवार को प्रकाशित आलेख में लिखा है, "मनमोहन सिंह की समस्याओं में से एक यह है कि उनके पास कोई वास्तविक राजनैतिक ताकत नहीं है, बल्कि उनकी प्रधानमंत्री के रूप में मौजूदगी सोनिया (गांधी) के कारण बनी हुई है... इसी के कारण कभी-कभी वह अपने कैबिनेट को भी नियंत्रित नहीं कर पाते हैं।"
बाद में समाचारपत्र ने अपने शीर्षक को बदलकर 'मनमोहन सिंह : इंडिया'ज़ सेवियर ऑर पपेट' (मनमोहन सिंह : भारत का रक्षक या कठपुतली), और भारतीय समयानुसार दोपहर को यह शीर्षक किया गया, 'मनमोहन सिंह : इंडिया'ज़ सेवियर ऑर जस्ट द अंडर-एचीवर' (मनमोहन सिंह : भारत का रक्षक या सिर्फ अंडर-एचीवर)।
इन बदलते शीर्षकों के साथ पत्रिका में प्रकाशित आलेख के अनुसार, "उनके (मनमोहन की) सुधारों का जोश और उत्साह खत्म हो चुका है, और देश की तरक्की धीमी हो चुकी है। विपक्षियों के अनुसार उन्होंने ऐसे प्रशासन की अगुआई की, जो पूरी तरह भ्रष्टाचार में लिपटा हुआ साबित हुआ है। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी में से, भले ही अप्रत्यक्ष रूप से, बार-बार ऐसी मांग की जाती रही है कि उन्हें अपने उत्तराधिकारी माने जाने वाले राहुल गांधी के लिए गद्दी छोड़ देनी चाहिए।"
आलेख लिखने वाले एन्ड्रयू बनकॉम्ब (Andrew Buncombe) के मुताबिक, "हालांकि पूरे प्रशासन के लिए उन्हीं को जिम्मेदार ठहराया जाना अनुचित हो सकता है, लेकिन यदि वह इतिहास में अपने लिए बेहतर स्थान बनाना चाहते हैं, तो अब उन्हीं को कोई कदम उठाना होगा।"
उल्लेखनीय है कि पिछले ही सप्ताह पत्रिका 'टाइम' ने अपने एशिया संस्करण में कवर पेज पर मनमोहन की तस्वीर छापकर लिखा था, 'द अंडर एचीवर : इंडिया नीड्स अ रीबूट' (क्षमता से कम हासिल करने वाला : भारत को नए सिरे से करनी होगी शुरुआत)। पत्रिका ने प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाते हुए देश के सुस्त आर्थिक विकास के लिए उनकी और उनकी सरकार की आलोचना की थी। पत्रिका ने कहा था कि वह निर्णायक ढंग से काम करने में विफल रहे हैं।
जुलाई 16, 2012 के इस अंक में 'ए मैन इन शैडो' शीर्षक से प्रकाशित पत्रिका के आमुख लेख (कवर स्टोरी) में कहा गया कि प्रधानमंत्री सुधारों पर 'जोखिम लेने के इच्छुक नहीं' हैं, जिससे देश विकास के पथ पर अग्रसर होता। पत्रिका में यह भी कहा गया था, "घरेलू व अंतरराष्ट्रीय निवेशकों में निराशा पैदा हो रही है। महंगाई के कारण मतदाताओं का भी विश्वास डिग रहा है। एक के बाद एक सामने आ रहे घोटालों ने सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।"
पत्रिका में कहा गया, "मनमोहन, जिस पर विपक्षी दल नीतिगत फैसलों में रुकावट डालने का आरोप लगाते हैं, अपने मंत्रियों पर नियंत्रण करने में विफल रहे। अब वित्त मंत्रालय का प्रभार अपने पास होने के बावजूद वह आर्थिक सुधारों पर जोखिम लेने के इच्छुक नजर नहीं आते।"
पत्रिका ने लिखा, "ऐसे में, जबकि आर्थिक विकास में सुस्ती भारत के लिए ठीक नहीं है; वे कानून, जो नौकरियों का सृजन व विकास का मार्ग खोल सकते थे, संसद में अटके हैं। राजनेताओं ने चुनाव-जिताऊ लघुकालिक तथा लोकप्रिय साधनों पर ध्यान केंद्रित कर रखा है, जो चिंता का कारण है।"
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First Published:
जुलाई 16, 2012 11:48 AM IST

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