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रवीश कुमार


'रवीश कुमार' - 538 न्यूज़ रिजल्ट्स

  • प्राइम टाइम इंट्रो : टिकट बंटवारे में जमकर चला परिवारवाद

    प्राइम टाइम इंट्रो : टिकट बंटवारे में जमकर चला परिवारवाद

    अब मतदाता को तय करना है कि वो चुनाव में सरकार चुने या उम्मीदवार चुने. उम्मीदवार चुनते वक्त दल-बदल, परिवारवाद का भी इलाज करे. वैसे मतदाता का काम उम्मीदवार चुनना होता है, सरकार चुनना उसका काम नहीं है. आप मतदाता ही बता सकेंगे कि राजनीति और राजनीतिक दल के भीतर प्रतिभाओं को कौन ज़्यादा रोक रहा है. पैसा या परिवारवाद.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अमेरिका में ट्रंप आगमन का मंगलाचरण

    प्राइम टाइम इंट्रो : अमेरिका में ट्रंप आगमन का मंगलाचरण

    अमेरिका में ट्रंपागमन का मंगलाचरण शुरू हो चुका है. चुनाव के दौरान ट्रंप ने कहा था कि वे अमेरिका को फिर से महान बनाएंगे. अब कह रहे हैं कि भूतो न भविष्यति टाइप महान बना देंगे. समर्थक नारे लगाते हैं कि अमेरिका को महान बना दो, ट्रंप कहते हैं बना देंगे. बना देंगे. ग्रेट और ग्रेटर कंट्री का इतिहास युद्ध का इतिहास रहा है. उस ताकत को हासिल करने का इतिहास रहा है जिसे लिखने के लिए दुकानें ही नहीं खोलनी होती हैं, तोपें भी चलानी होती हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : क्या पत्रकारों की विश्वसनीयता कठघरे में?

    प्राइम टाइम इंट्रो : क्या पत्रकारों की विश्वसनीयता कठघरे में?

    पत्रकार को चमचा होने की ज़रूरत नहीं है. उसे संदेहवादी होना चाहिए. मतलब सरकार के हर दावे को संदेह की निगाह से देखे. यह वाक्य अमेरिका के अस्ताचल राष्ट्रपति ओबामा का है. पद छोड़ने से 48 घंटे पहले ओबामा ने व्हाइट हाउस के पत्रकारों से बात करते हुए अंग्रेज़ी में इस वाक्य को यूं कहा, "You are not supposed to be sycophants, you are supposed to be skeptics."

  • प्राइम टाइम इंट्रो : चुनाव से पहले दल-बदल का दलदल

    प्राइम टाइम इंट्रो : चुनाव से पहले दल-बदल का दलदल

    बीजेपी ने सफाई न दी होती तो 91 साल की उम्र में तिवारी दलबदल कर रिकार्ड बना देते. कुछ समय पहले तक अपने पुत्र को लेकर सोनिया गांधी से मिलते रहे तिवारी अमित शाह से मिल गए. दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहने वाले वे अकेले कांग्रेसी हैं. भले ही तिवारी ने बीजेपी की सदस्यता न ली हो लेकिन ऐन चुनाव के वक्त कोई नेता दूसरी पार्टी के अध्यक्ष के घर पर कॉफी पीने नहीं जाता है. उन्होंने सदस्यता फॉर्म भले न भरा हो मगर बेटे की खातिर वे कांग्रेस की काया से निकल कर बीजेपी की काया में प्रवेश कर ही गए होंगे.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : मोहसिन शेख हत्याकांड के तीन आरोपियों को जमानत पर सवाल

    प्राइम टाइम इंट्रो : मोहसिन शेख हत्याकांड के तीन आरोपियों को जमानत पर सवाल

    सांप्रदायिकता और कट्टरता इन दो तत्वों को लेकर हमेशा क्लियर रहना चाहिए. ये दोनों ही तत्व बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों पाले में मिलेंगे. एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त होते हैं. बहुसंख्यक सांप्रदायिक गिरोह अपनी सांप्रदायिकता नहीं देखेगा, लेकिन अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता की तरफ इशारा करेगा.

  • 2017 गांधी के चरखे के सौ साल : बहन गंगाबाई ने जिसे खोज निकाला था

    2017 गांधी के चरखे के सौ साल : बहन गंगाबाई ने जिसे खोज निकाला था

    गांधी का चरखा जिस साल सौ साल पूरे कर रहा है उसी साल में चरखे पर उनकी जगह प्रधानमंत्री की तस्वीर छप जाने को लेकर विवाद हो रहा है. सौ साल के फासले में हम कितना कुछ भूल गए कि याद ही नहीं रहा कि 1917 में ही गांधी को चरखा मिलने की उम्मीद जगी थी.

  • चरखे का संसार, उससे जुड़े शब्द और अपना कुर्ता बनाने की आसान विधि

    चरखे का संसार, उससे जुड़े शब्द और अपना कुर्ता बनाने की आसान विधि

    तीन मीटर कपड़े के लिए नौ हजार मीटर धागा कातना होगा. एक हजार मीटर धागा कातने में ढाई से तीन घंटे का वक्त लगता है. यानी सत्ताईस घंटे चरखा चलाकर आप अपने लिए कुर्ते का कपड़ा बना सकते हैं.

  • बिल्कुल हानिकारक नहीं है बापू का चरख़ा चलाते मोदी की तस्वीर...

    बिल्कुल हानिकारक नहीं है बापू का चरख़ा चलाते मोदी की तस्वीर...

    खादी ग्रामोद्योग के किसी कैलेंडर में गांधी की मुद्रा में प्रधानमंत्री की यह तस्वीर बहुत कुछ कह रही है. कोई उन तस्वीरों में प्रायश्चित भी देख सकता था. कोई उन तस्वीरों में उस राजनीति की हार देख सकता था जो गांधी को खलनायक मानती है.

  • 'धावक' उर्जित पटेल और 'कमेंटेटर' रवीश कुमार

    'धावक' उर्जित पटेल और 'कमेंटेटर' रवीश कुमार

    आरबीआई गवर्नर ने साबित कर दिया है कि वह पत्रकारों से भागने में भारत के लिए मेडल ला सकते हैं. तालियां. तालियां. तालियां. आप देख रहे थे कमेंट्री लाइव. मैं रवीश कुमार, विदा लेता हूं. ऐसा मंज़र फिर न देखें, देवताओं से दुआ करता हूं.

  • राजनीति में जूतों का क्‍या काम...

    राजनीति में जूतों का क्‍या काम...

    पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल 90 साल के हैं और देश के वरिष्ठ राजनेताओं में से हैं. मौजूदा समय में वे अकेले ऐसे राजनेता होंगे जो आज़ादी के समय भी 28-30 साल के नौजवान रहे होंगे. हर राजनेता से जनता अलग अलग कारणों से नाराज़ रहती है. ख़ूब विरोध करती है मगर इन सब तौर तरीकों की एक परंपरा है.

  • बीएसएफ जवान तेजबहादुर ने सवाल तो मीडिया से भी किया है...

    बीएसएफ जवान तेजबहादुर ने सवाल तो मीडिया से भी किया है...

    बीएसएफ के जवान तेजबहादुर यादव के वीडियो को लेकर मीडिया ज़रूर सरकार से जवाब मांग रहा है. मगर अपने वीडियो में तेजबहादुर ने मीडिया से भी सवाल किया है. मीडिया से भी जवाब मांगा है. उनकी यह लाइन तीर की तरह चुभती है कि हम जवानों के हालात को कोई मीडिया भी नहीं दिखाता है.

  • बहन जी को आने दो, क्या यही होगा BSP का नारा?

    बहन जी को आने दो, क्या यही होगा BSP का नारा?

    सोशल मीडिया और मीडिया के मामले में बहुजन समाज पार्टी बदल रही है. मायावती पिछले कुछ महीनों से नियमित रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही हैं.

  • बामुलाहिज़ा होशियार…2017 में स्वर्ण युग आ रहा है…

    बामुलाहिज़ा होशियार…2017 में स्वर्ण युग आ रहा है…

    2017 उम्मीदों का साल है. इस साल दुनिया अर्थव्यवस्था के नए मॉडल देखेगी. भारत में एक फरवरी के बजट से पहले दो जनवरी को कोई नया मॉडल लांच हो सकता है. आलोचकों को खूब मौका मिला. समर्थकों को भी मिला. नोबेल कमेटी को भी दो जनवरी की रैली में आना चाहिए. उन्हें स्वीकार करना चाहिए कि राजनेता से बड़ा अर्थशास्त्री कोई नहीं होता.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : नेताओं के भाषण और बयान आधारित राजनीति में विचार गायब

    प्राइम टाइम इंट्रो : नेताओं के भाषण और बयान आधारित राजनीति में विचार गायब

    हमारे नेता कैसे बात करते हैं. इससे एक-दूसरे का मुकाबला कर रहे हैं या भारत की राजनीति को समृद्ध कर रहे हैं. भारतीय राजनीति बयान आधारित है. हम और आप भी नेताओं का मूल्यांकन हम विचार कम डायलॉगबाजी से ज्यादा करते हैं. इसी पर ताली बजती है, यही हेडलाइन बनती है. टीवी की भाषा भी पत्रकारिता की कम, सीरीयल की ज्यादा हो गई है. इससे आप दर्शकों को बहुत नुकसान है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : अनुपम मिश्र के बारे में आपको क्यों जानना चाहिए...

    प्राइम टाइम इंट्रो : अनुपम मिश्र के बारे में आपको क्यों जानना चाहिए...

    सोचा नहीं था कि जिनसे ज़िंदगी का रास्ता पूछता था, आज उन्हीं के ज़िंदगी से चले जाने की ख़बर लिखूंगा. जाने वाले को अगर ख़ुद कहने का मौका मिलता तो यही कहते कि अरे मैं कौन सा बड़ा शख़्स हूं कि मेरे जाने का शोक समाचार दुनिया को दिया जाए.

  • मैं अनुपम मिश्र को मिस कर रहा हूं...

    मैं अनुपम मिश्र को मिस कर रहा हूं...

    अनुपम मिश्र को खूब पढ़ा है. तीन-चार किताबों को कई बार पढ़ा है. जब भी किताबों से धूलों की विदाई करता हूं, एक बार याद कर लेता हूं. जब भी लगता है कि भाषा बिगड़ रही है तो 'गांधी मार्ग' और 'आज भी खरे हैं तालाब' पढ़ लेता था. उनकी भाषा हिंसा रहित भाषा थी, चिन्ता रहित भाषा थी, आक्रोश रहित भाषा थी. हम सबकी भाषा में यह गुण नहीं हैं. इसीलिए वे अनुपम थे, हम अनुपम नहीं हैं. वे चले गए हैं.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : कौन कर रहा है नोटों की हेराफेरी?

    प्राइम टाइम इंट्रो : कौन कर रहा है नोटों की हेराफेरी?

    8 नवंबर को नोटबंदी के एलान के बाद के दो-तीन हफ्ते तक बैंक कर्मचारियों की साख पर किसी ने सवाल नहीं उठाये. प्रधानमंत्री से लेकर लाइन में लगा आम आदमी भी बैंक कर्मचारियों की तारीफ कर रहा है. लेकिन अब जब रोज़ छापे पड़ रहे हैं और जहां-तहां से भारी मात्रा में नए नोट बरामद हो रहे हैं, आम जनता की नज़र में बैंक वालों की साख गिरने लगी है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : दो महाशक्तियों की लड़ाई का शिकार अलेप्पो

    प्राइम टाइम इंट्रो : दो महाशक्तियों की लड़ाई का शिकार अलेप्पो

    महाशक्ति बनने का ख़्वाब अंत में मुल्कों को हैवान बना देता है. अलेप्पो को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी में शुमार किया जाता था. अब न तो वहां शहर बचा है, न हेरिटेज. बल्कि वहां के लोग उस दुनिया को पुकार रहे हैं जो पांच-छह साल पहले तक अलेप्पो को अपनी विरासत समझती थी.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : ई-वॉलेट से हुई गड़बड़ी की शिकायत किससे?

    प्राइम टाइम इंट्रो : ई-वॉलेट से हुई गड़बड़ी की शिकायत किससे?

    बैंकों के भी ई वॉलेट होते हैं और कंपनियों के भी. बैंकों के वॉलेट तो लोकपाल के दायरे में आते हैं, लेकिन कंपनियों के ई-वॉलेट लोकपाल के दायरे में नहीं आते. अगर यह सही है तो ऐसा क्यों है.

  • प्राइम टाइम इंट्रो : मोबाइल फोन से बैंकिंग कितनी सुरक्षित?

    प्राइम टाइम इंट्रो : मोबाइल फोन से बैंकिंग कितनी सुरक्षित?

    पैसा बोलता तो है, मगर अब पैसा दिखता नहीं है. सिर्फ पल भर में यहां से वहां हो जाता है. कैशलेस दौर में पैसे का यही रूप है. भारत सरकार प्रचार में जुटी है कि एक ही साथ महानगरों से लेकर कस्बों तक में लोगों का बैंकों से नाता बदल जाएगा. एटीएम के कारण ऐसे ही हम या आप बैंक की ब्रांचों में कम ही जाने लगे थे लेकिन अब एटीएम की हालत भी कहीं पुराने ज़माने के पीसीओ जैसी न हो जाए.

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