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मोदी के जवाब में नीतीश का पैकेज, युवा वोटर पर लगाया दांवसत्तर पचहत्तर दिनों से पूर्व सैनिक जंतर मंतर पर अपनी मांग को लेकर धरने पर हैं। यह धरना उन सभी वर्गों के लिए नज़ीर बनना चाहिए जिनसे चुनाव के वक्त नेता वादे करते हैं और सरकार बनने के बाद भूल जाते हैं। उनकी एकजुटता का नतीजा इतना तो निकला है कि सरकार युद्ध स्तर पर प्रयास कर रही है।
धार्मिक आधार पर जनसंख्या के आंकड़े : आबादी वृद्धि दर कम होना अच्छा संकेतव्हाट्सऐप पर अफवाह फैलाने वाले गिरोहों के लिए मसाला अच्छा है जिस पर हम चर्चा करने जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए ये तो ज़बरदस्त मसाला है ही। प्रधानमंत्री तो हमेशा आबादी को संभावना मानते हैं। खुल कर रैलियों में भी बोलते हैं। इसी आबादी में युवाओं का प्रतिशत बढ़ा है तो वे भारत के लिए संभावनाएं देख पाते हैं।
आखिर आंदोलन पर क्‍यों उतरे पटेल?अहमदाबाद की सड़कों पर सेना की गाड़ियां गुजरात के लिए राहत से पहले किसी अपशकुन की आहट की तरह हैं। 2002 के बाद पहली बार अहमदाबाद की सड़कों पर लौटी सेना की ये तस्वीरें बता रही हैं कि 25 अगस्त से लेकर 26 अगस्त की शाम के बीच गुजरात की पुलिस ने इतना कुछ गंवा दिया है कि अब मामला उससे संभलने वाला नहीं है।
भारतीय शेयर बाजार में कोहराम, चीन के आर्थिक संकट का असरसोमवार सुबह जब सेंसेक्स खुलते ही 500 अंक के आस पास गिरा तो लोगों को लगा कि इतना तो कई बार गिर चुका है लेकिन जल्दी ही बाज़ार 800 के आंकड़े को पार करते हुए 1000 अंक तक जा गिरा।
क्या पटेल समाज को आरक्षण मिले?राजनीति वो दरिया है जिसकी सतह पर जब धारा शांत लगती है तभी सतह के भीतर की धारा अंगड़ाई ले रही होती है। सबका ध्यान बिहार की चुनावी राजनीति की तरफ है लेकिन गुजरात में एक 22 साल का नौजवान राजनीति की क्षितिज पर उभरता दिखाई दे रहा है।
बिहार के विकास पर सियासत, मोदी का नीतीश पर निशानाविशेष दर्जा और विशेष पैकेज में क्या अंतर है इसे राजनीतिक विद्वान बांचते रहेंगे लेकिन जिन्हें मंच लूटना था वो लूट ले गए। जनता को एक फाइनल फीगर मिल गया है। चौक चौराहे पर लोग सेक्टर के आधार पर हिसाब नहीं लगाएंगे।
आरोप के जवाब में सुषमा के आरोप, क्या सुषमा की सफ़ाई काफ़ी है?स्पीकर सुमित्रा महाजन जी, एक न्यूज़ एंकर होने के नाते आज आपकी पीड़ा को भी समझ रहा था और आपकी चुनौती को भी। मुल्क की निगाहें आपकी तरफ थीं कि कहीं आपसे तराजू का पलड़ा उनकी तरफ तो नहीं झुक रहा है जो कभी आपके अपने थे या उनकी तरफ तो नहीं झुक रहा है जो आपको शक की निगाह से देख रहे होंगे।
क्या GST बिल जल्द पास हो पाएगा?जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स। वित्त मंत्री ने इस टैक्स के बारे में कहा है कि जिस तरह से देश का राजनीतिक एकीकरण 1947 में हुआ उसी तरह से आर्थिक एकीकरण नहीं हो सका। जीएसटी आने से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली एक समान हो जाएगी। टैक्स की उगाही बढ़ेगी और जीडीपी को भी लाभ होगा।
क्‍या मोदी सरकार की चमक फीकी पड़ रही है?तो क्या वाकई मोदी सरकार की चमक फीकी पड़ने लगी है। क्या आलोचक उनके साथ नाइंसाफी कर रहे हैं या वाकई ऐसा कुछ हो रहा है जिस पर प्रधानमंत्री को ध्यान देना चाहिए।
क्या सुषमा स्वराज ने नहीं की ललित मोदी की मदद?अगर आप भी मानते हैं कि राजनीति में आरोपों से मिलने वाला अपयश किसी ग्रह के कारण होता है तब आपको इस्तीफा उस ग्रह से मांगना चाहिए जिसके कारण यह सब हो रहा होता है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने लोकसभा में कहा कि ज़रूर मेरा कोई अपयश का ग्रह चल रहा होगा।
पाक के साथ क्या रुख़ अपनाए भारत?जब तक आतंकवाद का चेहरा नकाब से ढका होता है वो क्रूर तो लगता है लेकिन जब नकाब हटता है तो उससे भी क्रूर हो जाता है क्योंकि तब आप देख पाते हैं कि कैसे फर्ज़ी मज़हबवाद और राष्ट्रवाद के नाम पर नौजवानों को आग में झोंका जा रहा है।
संसद में हंगामा है बरपा, लोकतंत्र पर काला धब्बा कब लगता है...आपके दिमाग़ में उस वक्त क्या तस्वीर बनती है, जब नेता कहते हैं कि फलां कार्यवाही लोकतंत्र पर काला धब्बा है। लोकतंत्र का काला धब्बा किसे कहते हैं और यह कब और कैसे लगता है।
क्‍या फांसी की सजा खत्‍म कर देनी चाहिए?ऐसा कभी हुआ तो नहीं था लेकिन जो हुआ उसे होते देख भारत ही नहीं दुनिया भर में भारतीय टीवी और इंटरनेट से चिपके रहे कि आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देती है। फांसी की सज़ा के विरोधी और पक्षधर दोनों जागते रहे कि अदालत क्या फैसला सुनाती है।
याकूब मेमन की फांसी पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अंतिम मुहरयाकूब मेमन को फांसी दी जाएगी। दो दिनों के भीतर देश की सबसे बड़ी अदालत की दो प्रकार की बेंचों ने उसकी याचिका पर सुनवाई की है। पहले दो जजों की बेंच और फिर तीन जजों की बेंच के बाद तय पाया गया कि किसी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं हुई है। याकूब मेमन का डेथ वारंट पूरी तरह से कानूनी है।
लोगों के कलाम, कलाम के लोगशायद इसीलिए वे अनगिनत लोगों के किस्सों में बस गए हैं। वे थे तब भी किस्सा ही रहे और अब नहीं हैं तो भी किस्सा हैं। अनगिनत स्कूलों में गए। कई शहरों में कई बार गए। लगातार लोगों से मिलते रहे। रामेश्वरम के एक बड़े से संयुक्त परिवार से आते थे। उससे भी बड़ा परिवार छोड़ कर गए हैं।
फांसी की सजा और उस पर होती राजनीतिदुनिया में 90 ऐसे देश हैं जो फांसी की सज़ा का विरोध करते हैं। इनमें भूटान और नेपाल भी शामिल हैं। ज़रूर इन देशों में भी जघन्य अपराध होता होगा और इन देशों में भी राष्ट्रभक्तों और मज़हब को मानने वालों की कमी नहीं होगी। भारत में फांसी की सज़ा पर रोक नहीं है।
दिल्ली में राज किसका होना चाहिए, उपराज्यपाल का या मुख्यमंत्री का?इम्तहानों में अब यह सवाल आना चाहिए कि दिल्ली में सरकार कौन है इसकी उदाहरण सहित व्याख्या करें। शर्त यह होनी चाहिए कि इसका जवाब विद्यार्थी लिखें न कि उप राज्यपाल या मुख्यमंत्री। इस स्थिति में एक सवाल यह भी खड़ा होना चाहिए कि फिर जनता कौन है और क्यों है।
सियासी खींचतान में फंसी संसद, विपक्ष संसद न चलने देने पर आमादामंगलवार को इज़ इक्वल टू की थ्योरी का प्रतिपादन करते वक्त मुझे भी अंदाज़ा नहीं था कि प्रतिपादन के अगले ही दिन इसका फैक्ट्री उत्पादन शुरू हो जाएगा। आज तो दिल्ली में जिस तरह से इज़ इक्वल टू हुआ है क्या बतायें।
मॉनसून सत्र शुरू होते ही गतिरोध, ये 'is equal to' क्या है?हमारी राजनीति में इज़ इक्वल टू हो गया है। इज़ इक्वल टू वो अवस्था है जहां राजनीति की हर बहस बराबर हो जाती है। ऐसा तभी होता है जब किसी मुल्क या राज्य में दो दलों को बारी-बारी से राज करने का मौका मिलता है। ऐसा होने से दोनों पर लगने वाले आरोपों का इज़ इक्वल टू हो जाता है।
शिक्षण संस्थाओं का भगवाकरण?किसी भी राज्य में होने वाला धरना या प्रदर्शन उस राज्य की जनता द्वारा चुनी गई सरकार के ख़िलाफ़ ही होता है। कुछ प्रदर्शन कामयाब होते हैं, कुछ नाकाम और गुमनाम रह जाते हैं और कुछ लाठी खाकर खत्म हो जाते हैं।

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