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व्‍यापमं घोटाला : एक के बाद एक मौत के पीछे साजिश?बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद कैलाश विजयवर्गीय पहली बार भोपाल आए तो स्वागत में गाड़ियों का काफिला इतना लंबा हो गया कि दो घंटे का जाम लग गया। इस जाम में फंसी एक एंबुलेंस में नवजात बच्ची थी जिसे जल्दी अस्पताल ले जाने के लिए उसका पिता एंबुलेंस का दरवाज़ा पीटता रह गया।
इतने से काम नहीं चलता! वेतन बढ़वाना चाहते हैं AAP विधायकहमारे नेता खुद को महाराजा समझने लगे हैं। राजनीति में सादगी एक तमाशा है और तमाशा ही असली सादगी। मुश्किल से साल पूरा हुआ है, तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने अपने लिए 5 करोड़ की मर्सिडिज़ बस बनवाई है।
जन प्रतिनिधियों के वेतन का मुद्दा : क्या सांसदों का वेतन बढ़ाना ठीक?पंद्रह जून से हमारे सैनिक जंतर मंतर पर वेतन और पेंशन के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं लेकिन हमारे सांसद कितनी आसानी से अपनी सुख सुविधा और सैलरी बढ़ाने का प्रस्ताव भेज देते हैं।
डिजिटल इंडिया के लाभ और सवाल?अगस्त 2014 में ही मोदी मंत्रिमंडल ने डिजिटल इंडिया का फैसला कर लिया था, करीब एक साल की गहन तैयारी के बाद बुधवार शाम को इसे धूमधाम के साथ लांच किया गया। अगले चार साल में ढाई लाख पंचायत ब्राड बैंड से जोड़ दिए जाएंगे। गांव गांव में ब्राड बैंड का जाल बिछाया जाएगा।
धौलपुर महल पर जारी है महाभारतहर दिन आने वाला एक नया आरोप वसुंधरा के लिए ढाल ही बन रहा है। नया मामला इतना उलझा हुआ है कि इसे अदालत ही सुलझा सकती है। धौलपुर पैलेस सरकार का है या वसुंधरा के बेटे और सांसद दुष्यंत सिंह का है।
कितना व्‍यापक है व्‍यापम घोटाला?2006 के साल से ही व्यापक की भर्तियों और प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ी की ख़बरें आने लगी थीं लेकिन 2013 में डॉक्टर जगदीश सागर के पकड़े जाने से मामला खुला तो पता चला कि मध्य प्रदेश के योग्य छात्रों की एक पूरी पीढ़ी इस घोटाले की भेंट चढ़ चुकी है।
क्‍या इस्‍तीफा देंगी वसुंधरा राजे?25 जून 1975 को चालीस साल हो गए। इस घटना को याद रखना चाहिए क्योंकि इस तारीख के बाद लोकतंत्र को बचाये और बनाए रखने के लिए एक लंबी लड़ाई शुरू होती है जो आज भी जारी है। उन अर्थों में आपातकाल दोबारा भले न आया हो मगर लोकतंत्र का सारा जश्न मतदान के प्रतिशत और शांतिपूर्ण चुनावों की तैयारियों में ही सिमट कर रह गया है।
ललित कथा में फंसी वसुंधरा, दस्‍तखत वाला हलफनामा आया सामनेनहीं नहीं इसमें मंत्रियों के इस्तीफे नहीं हुआ करते भईया, ये यूपीए नहीं एनडीए government है। राजनाथ सिंह की बात हैरान करने वाली थी लेकिन उन्हें भी अंदाज़ा नहीं होगा कि उनके इस बेतकल्लुफ़ अंदाज़ पर शाम होते होते वसुंधरा राजे का वो हलफनामा भारी पड़ सकता है जिस पर उनके दस्तखत हैं।
ललित मोदी को लेकर ऐसी नरमी क्‍यों?किसी राष्ट्रीय परीक्षा में एक प्रश्न पूछा जाए कि निम्नांकित श्रेणियों में से किन्हीं तीन के आगे टिक करें और बतायें कि ललित मोदी क्या हैं। जैसे मैंने एक प्रश्न का लंबा सा प्रश्नपत्र बनाया है ताकि आप टिक कर सकें।
बीजेपी का वसुंधरा से पहले किनारा अब बचावइस पूरे विवाद में कोई विजेता बनकर निकला है तो वह है ललित मोदी। मोन्टिनिग्रो की ख़ूबसूरती ने ललित मोदी की इस जीत में और भी चार चांद लगा दिये हैं। जिस व्यक्ति से जुड़े मामले में छह दिनों तक प्रधानमंत्री बोल नहीं सके, उस व्यक्ति की नज़र से देखिये तो अंतिम अट्टाहास का अधिकारी वही है।
आपातकाल को लेकर आडवाणी की आशंका कितनी वाजिब?सवाल पूछा जा रहा है कि ललित मोदी को भारत सरकार को न बताए जाने की शर्त पर हलफनामा क्यों दिया गया मगर जवाब आ रहा है कि वसुंधरा राजे के साथ कौन-कौन खड़ा है।
वन रैंक वन पेंशन : 35 साल से जारी है लड़ाईवन रैंक वन पेशन के मुद्दे पर ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जो पिछले 35 सालों में नहीं कहा गया हो। कई कमेटियों की रिपोर्ट है और 2009 में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि इसे लागू करना चाहिए, बल्कि फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे बिना देरी के लागू करना चाहिए।
खाने की पसंद क्या सरकारें तय करेंगी?मांस खाना न तो धार्मिक रूप से अपराध है न सांस्कृतिक रूप से फिर भी कुछ मांसाहारियों की एक ख़ूबी होती है। वे तीज त्योहार के टाइम एक दिन से लेकर नौ दिनों के लिए शाकाहारी हो जाते हैं।
मथुरा में प्रधानमंत्री धारणा को धराशायी कर रहे थे या धन्नासेठों को?ग़रीब, ग़रीब, ग़रीब इतनी बार ग़रीब कि लगा कि कोई ग़रीबों को ढूंढ रहा है यह बताने के लिए कि उसे धन्ना सेठों से कोई मोहब्बत नहीं है। पूरे भाषण में धन्ना सेठ, फैक्ट्री वाले और सत्ता के गलियारे में पहुंच रखने वाले उद्योगपति ख़लनायक की तरह उभरते हैं।
खुदरा कारोबार में FDI पर क्‍या सरकार पसोपेश में?मोदी सरकार ने अपने पहले साल में रक्षा और बीमा सेक्टर में 49 प्रतिशत विदेशी निवेश का फैसला कर लिया, मामूली विरोध के अलावा बीजेपी या संघ परिवार को इससे कोई खास दिक्कत नहीं हुई। हुई भी तो सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा।
सरकार की नई बीमा, पेंशन योजनाएं कैसे हो पाएंगी कारगर?कई बार लगता है कि जीवन के बाद इस धरती पर कुछ बचा रहेगा तो वो है बीमा। इसलिए जीवन बचे न बचे बीमा बचाइये। हमारे आस पास तेज़ी से बदलाव हो रहा है। भले ही व्यापक रूप से इसके समर्थन या विरोध की राजनीतिक सक्रियता नज़र न आती हो लेकिन बीमा राजनीतिक शब्दावली में अपनी जगह बनाने लगा है।
पत्रकारिता पर लगाम की कोशिश?दुनिया के किसी भी लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि उसका नागरिक अपने अधिकारों, कर्तव्यों को समझे और इसके लिए बेहद ज़रूरी है कि वो सही सूचनाओं से लैस हो। झूठी, खराब या अधकचरी सूचनाओं से लैस नागरिक लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है।
आखिर, भ्रष्‍टाचार से कैसे होगा मुकाबला?भ्रष्टाचार न दिखे तो इसका मतलब नहीं कि वो कहीं हो नहीं रहा है। इसके लिए ज़रूरी है कि इसकी खोज करने वाले से लेकर निगरानी और सुनवाई करने वाली संस्थाएं भी अपने पूरे वजूद के साथ स्वतंत्र रूप से कार्य करें।
क्या है स्मार्ट सिटी और स्मार्ट शहर बनाने की क्या ज़रूरत?इसमें कोई शक नहीं कि नए शहरों की ज़रूरत है लेकिन क्या स्मार्ट सिटी के दावे पर भरोसा किया जा सकता है कि इससे बिजनेस बढ़ेगा। शहर बनाने से बिजनेस बढ़ेगा या उद्योग बढ़ाने से।
नेपाल का भूकंप सबके लिए सबक50 लाख की आबादी वाला काठमांडू भारत के ही किसी बड़े शहर की तरह बेतरतीब और विस्तार से बसा हुआ है। इसी कारण दुनिया के हर भू वैज्ञानिक और भूकंप के बाद पुनर्वास से जुड़े विशेषज्ञों ने अपने रिसर्च पेपर में भविष्यवाणी की थी कि ताकतवर भूकंप इस शहर को तबाह कर सकता है।

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