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कालेधन पर 100 के विवाद से छुटकारा पाया?काला धन को लेकर तृणमूल कांग्रेस काफी क्रिएटिव हो गई है। अगर ऐसा ही वो करती रही तो काले धन से जुड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए हर काली चीज़ काम आ जाएगी। ज़रूर एक दिन सांसद काले घोड़े पर बैठकर काले धन के मसले पर सरकार को घेरने आएंगे।
सार्क : पास-पास तो हैं साथ-साथ नहींक्या दक्षिण एशिया को कोई भी संगठन भारत और पाकिस्तान के बिना साथ आए कामयाब हो सकता है। काठमांडु में भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रधानमंत्री सार्क सभा से सहयोग की बातें करते रहे, लेकिन खुद मुलाकात से बचते रहे। मुलाकात तो छोड़िये एक फ्रेम में न आ जाएं इसकी भरपूर कोशिश करते रहे।
रवीश कुमार की कलम से : सार्क के सरदार नरेंद्र मोदीकुल मिलाकर मोदी ने सार्क देशों को झकझोरा है कि अगर हम यूरोप की तरह एक-दूसरे से जुड़ जाएं, व्यापार और लोगों का आवागमन बढ़ जाए तो सार्क संभावनाओं का क्षेत्र बन जाएगा।
पहला दिन...लिफ्ट तक पहुंचा तो देखा कि दोनों अब भी दरवाज़े पर हैं। अब मैं भी उन दोनों से इतनी दूरी पर तो था ही कि वे मेरी आंखों को नहीं देख सकती थीं। ऐसे मौकों पर रोकना मुश्किल हो जाता है। झट से छुटंकी को गोदी में उठा लिया। ज़ोर से चिपकू कर लिया।
बीमा क्षेत्र में एफडीआई बढ़ाने से कितना होगा फायदा?हर बीमा विज्ञापन के आखिर में ये कानूनी चेतावनी ऐसे पढ़ी जाती है जैसे सड़क दुघर्टना से बच भी गए, तो इस चेतावनी से नहीं बच पाएंगे। बीमा आम पब्लिक के लिए नहीं बल्कि न्यूज़ एंकरों के लिए भी जटिल विषय है।
रवीश की कलम से : संस्कृत का दोस्त कौन और दुश्मन कौन?संस्कृत को लेकर जो लोग भावुक हैं, वहीं संस्कृत के दुश्मन हैं। मौजूदा विवाद को जानबूझ कर संस्कृत विरोध के दायरे में फंसाए रखना चाहते हैं। जैसे मैकाले और मार्क्सवादियों के कारण ही संस्कृत का नुकसान हुआ है।
हर जगह संस्कृत, तो फिर संकट में क्यों?संस्कृत आम जन की भाषा नहीं है, लेकिन इसकी उपस्थिति कई कारणों से आम जनों के बीच मौजूद है। अब आपको इस आम जन का दायरा समझना होगा, तभी संस्कृत का विस्तार समझ सकेंगे।
रवीश की कलम से : समाजवाद का रिएलिटी शोमुलायम सिंह यादव लंदन से लाई गई इस बग्धी में ऐसे घूम रहे हैं, जैसे रामपुर में नहीं लंदन के ट्रैफलगर स्कावयर में घूम रहे हैं। जो बग्धी चला रहा है उसे जितनी बार देखा मुझे तो यही लगा कि कहीं ये किसी और की बारात का दूल्हा तो नहीं है, जिसे एक घंटे के लिए मुलायम की बग्धी चलाने के लिए लाया गया हो।
मीडिया पर क्यों निकाला गुस्सा?रामपाल जैसे बाबाओं का उद्गम स्थल भले ही मीडिया न हो, लेकिन उनके प्रचार प्रसार का माध्यम तो है ही। किसी नाटक के राजा की तरह सजे धजे ज्योतिषाचार्यों से लैस तमाम चैनल आपको पड़ोसी के घर में दही फेंक आने से लेकर पीला कुर्ता पहनकर सलाह देते रहे हैं।
रवीश की कलम से : ...तो इसलिए विदेश दौरों पर गए थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीमोदी विरोधियों के लिए मुद्दा हैं, लेकिन मोदी के लिए उनके विरोधी मुद्दा नहीं हैं। वह जनता से संवाद करते हैं। मीडिया के सवाल-जवाब का सामना नहीं करते, लेकिन अपनी हर बात को किसी किस्से में बदलकर जनता को नई बात दे जाते हैं।
रवीश कुमार की कलम से : कहां गई वो दिल्ली?भावना ने अपने पसंद के लड़के से शादी कर ली। जात को लेकर कोई फर्क रहा होगा जो उसके मां बाप को पसंद नहीं आया। वैसे ऐसी सोच वाले लोग किसी भी जाति को लेकर ऐसे ही बर्ताव करते।
क्या कानून बनाने से समाज बदल जाएगाभारत में गुरुओं के इतने प्रकार हैं कि तय करना मुश्किल हो जाता है कि सच्चा गुरु कौन है। वो जो सिर्फ गुरु है या वो जो धर्म गुरु है या वो जो बिना सीबीएसई बोर्ड या जी मैट क्लीयर किए विश्व गुरु बनने का एलान करते रहता है। हर दिन यहां कोई न कोई बाबा लांच हो जाते हैं।
अपनी नाकामी छुपाने के लिए मीडिया पर हमला?पत्रकारों पर पुलिस की बरसती लाठियों को देखकर क्या आप हरियाणा के पुलिस महानिदेशक की बात पर यकीन करेंगे कि पुलिस की ऐसी कोई मंशा नहीं थी। क्या लाठियां बिना मंशा आदेश के आटोमेटिक चल जाती हैं?
एक बाबा के आगे बेबस पूरी पुलिस12 दिन हो गए, लेकिन हरियाणा की सरकार रामपाल को उनके आश्रम से निकाल कर हाई कोर्ट में पेश नहीं कर पाई। एंबुलेस, रोडवेज की बस, जेसीबी मशीन सब मंगवाई गई है, मगर रामपाल पुलिस की पकड़ से बाहर है।
खुले मन से करें नेहरू का मूल्यांकनहम एक ऐसे समय में रह रहे हैं जहां दुनिया भर में महानता 24 घंटे लाइव है। हर वक्त किसी ने किसी के महान होने का सीधा प्रसारण हो रहा है। रीयल टाइम में महान बनने या बना देने की ऐसी घटना इतिहास के किसी भग्नावशेषों में नहीं मिलती है।
रवीश की कलम से : चाचाकितने दिन हो गए किसी को चाचा पुकारे। आज जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर यह शब्द तमाम रिश्तेदारियों से बड़ा हो गया है। 125 साल का कोई चाचा होता है भला।
नसबंदी के बाद मौत का जिम्मेदार कौन?छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में नसबंदी के दौरान 13 महिलाओं की मौत के मामले में अब जवाबदेही कैसे तय हो। स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे से तय हो, स्वास्थ्य सचिव के तबादले से, स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक के तबादले से तय हो, चार डाक्टरों को सस्पेंड करने से तय हो या एक डॉक्टर की गिरफ्तारी से।
पल्लव बागला की पुस्तक की समीक्षा : हम भी अगर इसरो होते...मेरी मैग्डेलन चर्च। केरल के तट पर बसे थुंबा का यह चर्च के बिना अंतरिक्ष में हिन्दुस्तान का सफ़र न तो शुरू होता है न पूरा। विक्रम साराभाई ने जब थुंबा को भारत के पहले राकेट प्रक्षेपण के लिए चुना तो इस चर्च के बिशप ने वहां के ईसाई मछुआरों को साराभाई की मदद के लिए तैयार किया।
क्या योग्यता के आधार पर ही बने सब मंत्री?कैबिनेट विस्तार से पहले कहा जा रहा था कि सिर्फ मेरिट के आधार पर मंत्री बनेंगे, जाति या किसी और आधार पर नहीं, लेकिन विस्तार के बाद देखने को मिला कि जाति अभी तक मेरिट बनी हुई है।
रवीश की रिपोर्ट : बीजेपी के नवरत्न ने ही किया स्वच्छता अभियान को दागदारसोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में उपाध्याय, इल्मी और कुरैशी साहब की तस्वीरें वायरल हो गईं हैं। हर तरफ प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का मज़ाक उड़ रहा है। बीजेपी को 'चलता है' टाइप खारिज करने के बयान से ज्यादा ठोस कार्रवाई करनी चाहिए।

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