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रवीश कुमार की कलम से : बख्तरबंद स्कूल में आपका बच्चाक्या आप ऐसे किसी स्कूल की कल्पना करना चाहेंगे, जहां आपके बच्चे को गेट पर मेटल डिटेक्टर से गुजरना पड़े, क्लासरूम में जाने से पहले उसके बैग की सुरक्षा जांच हो, प्रार्थना के बाद आतंकवाद से बचने के लिए सुरक्षा ड्रील हो, चारों तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे हों...
लखवी पर क्यों नहीं हो रही सख्ती?जैसे ही खबर आई कि पाकिस्तान की आंतकवाद विरोधी अदालत ने मुंबई हमले के आरोपी लखवी को ज़मानत पर छोड़ दिया है, भारत में हंगामा मच गया और आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के दोहरेपन पर हमला शुरू हो गया।
रवीश की कलम से : संयुक्त राष्ट्र में गांधी के बाद अब योगयोग एक विचार प्रणाली है। आज जिस तरह से धर्म का एक संगठित रूप बना है और उस संगठित रूप की पहचान राजनीति तरीके से होने लगी है, योग इसमें फिट नहीं बैठता है। वर्ना योग भी कर्मकांडों से भरा रहता। मगर यह खुद से साक्षात्कार का ज़रिया है।
रवीश कुमार की कलम से : धर्मांतरण पर सरकार का रुख?लोकसभा में आगरा में हुए कथित धर्मांतरण के मसले पर विपक्ष ने बीजेपी सरकार पर विकास के एजेंडे को छोड़ संघ के एजेंडे पर चलने का आरोप लगया। जवाब में वेंकैया नायडू ने इस मसले पर विपक्ष और सरकार दोनों को अच्छे से संभाला।
रवीश कुमार की कलम से : नोबल पुरस्कार इतना शानदार कभी होगा?आज नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में तालियों की गड़गड़ाहट ने कुछ ऐसा कहा कि मैंने आखिरी वक्त में प्राइम टाइम का अपना विषय बदल दिया। इन तालियों की ऊर्जा हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों को छू रही थीं। तरोताज़ा कर रही थीं।
टैक्सी में रेप के मुद्दे की गूंजपांच दिसंबर को उबर की टैक्सी में हुई बलात्कार की घटना के बाद समाज और सिस्टम ठीक वैसे ही जागा है जैसे 16 दिसंबर 2012 की घटना के बाद जागा था। तब कड़े कानून की कमी का पता लगा था, जिसे रिकॉर्ड समय में दुरुस्त कर दिया गया, लेकिन अब जीपीएस, सीसीटीवी वेरिफिकेशन और लाइसेंस देने में लापरवाही जैसी कमियों की पहचान हो रही है।
आदर्श ग्राम योजना की हक़ीक़तआदर्श ग्राम योजना के शुरू होते ही खबर आने लगी कि किसी नेता ने अपनी जाति की बहुलता वाले गांव का चयन किया है तो किसी ने उस गांव का चयन किया, जिसमें एक भी मुसलमान नहीं है।
रवीश कुमार की कलम से : मोबाइल के लिए पटरी के नीचेसेल्फी और मोबाइल के लिए प्लीज़ ऐसा मत कीजिये। मेरे साथ सेल्फी खिंचाने के लिए किसी को चोट भी लग जाए तो मैं खुद को माफ़ नहीं कर पाता, लेकिन मोबाइल के लिए बोगी के नीचे चले जाने के जुनून ने तो सारी हदें पार कर दीं।
फिर करीब आया जनता परिवार का दलभारत की सभी पार्टियां खुद को बार-बार लांच करती रहती हैं। हिन्दुस्तान की राजनीति में नरेंद्र मोदी एक नई विभाजक रेखा के रूप में उभर चुके हैं। जो भी हो रहा है या तो इनके साथ आने के लिए हो रहा है या फिर इनके ख़िलाफ़ जाने के लिए।
शारदा केस से जुड़े धमाके के तार?रविवार को कोलकाता में हुई एक रैली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने ममता बनर्जी पर कई आरोप लगाए। मैं उनके भाषण के उस हिस्से को लिखकर लाया हूं जिसका संदर्भ आज के विवाद से है।
राजनीति में कब तक चलेगी ये भाषा?इतना तो तय है कि हमारे कई नेता न तो संविधान ठीक से जानते हैं, न धर्म का विधान। लोकतंत्र की पूरी समझ कंफ्यूज़ होती जा रही है। कोई नेता को भगवान बता रहा है तो कोई विरोधी को राक्षस। ऐसे तुलसीदासों से कम से कम रामायण को तो बचाया ही जाए।
मोदी सरकार पर कांग्रेस का प्रहारअब लगता है जो भी नारा लिखा जाएगा वह अबकी बार मोदी सरकार पर आधारित होगा। जैसे मनरेगा को लेकर आंदोलन करने वाले किसानों और संगठनों का नारा है, अबकी बार हमारा अधिकार। ऐसा ही एक नारा कांग्रेस ने दिया है। 6 महीने पार यू टर्न सरकार।
रवीश कुमार की कलम से : मिस्ड कॉल मेंबरी - एक नंबरी या दस नंबरीमिस्ड कॉल की सदस्यता के बारे में समझ साफ होनी चाहिए। क्या मिस्ड कॉल वाले सदस्यों को पार्टी के आंतरिक चुनावों में मतदान करने का अवसर मिलेगा। अगर वे पार्टी से किसी तरह नाराज़ हुए तो मिस्ड कॉल से ली हुई सदस्यता कैसे वापस करेंगे।
कालेधन पर 100 के विवाद से छुटकारा पाया?काला धन को लेकर तृणमूल कांग्रेस काफी क्रिएटिव हो गई है। अगर ऐसा ही वो करती रही तो काले धन से जुड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के लिए हर काली चीज़ काम आ जाएगी। ज़रूर एक दिन सांसद काले घोड़े पर बैठकर काले धन के मसले पर सरकार को घेरने आएंगे।
सार्क : पास-पास तो हैं साथ-साथ नहींक्या दक्षिण एशिया को कोई भी संगठन भारत और पाकिस्तान के बिना साथ आए कामयाब हो सकता है। काठमांडु में भारत और पाकिस्तान दोनों के प्रधानमंत्री सार्क सभा से सहयोग की बातें करते रहे, लेकिन खुद मुलाकात से बचते रहे। मुलाकात तो छोड़िये एक फ्रेम में न आ जाएं इसकी भरपूर कोशिश करते रहे।
रवीश कुमार की कलम से : सार्क के सरदार नरेंद्र मोदीकुल मिलाकर मोदी ने सार्क देशों को झकझोरा है कि अगर हम यूरोप की तरह एक-दूसरे से जुड़ जाएं, व्यापार और लोगों का आवागमन बढ़ जाए तो सार्क संभावनाओं का क्षेत्र बन जाएगा।
पहला दिन...लिफ्ट तक पहुंचा तो देखा कि दोनों अब भी दरवाज़े पर हैं। अब मैं भी उन दोनों से इतनी दूरी पर तो था ही कि वे मेरी आंखों को नहीं देख सकती थीं। ऐसे मौकों पर रोकना मुश्किल हो जाता है। झट से छुटंकी को गोदी में उठा लिया। ज़ोर से चिपकू कर लिया।
बीमा क्षेत्र में एफडीआई बढ़ाने से कितना होगा फायदा?हर बीमा विज्ञापन के आखिर में ये कानूनी चेतावनी ऐसे पढ़ी जाती है जैसे सड़क दुघर्टना से बच भी गए, तो इस चेतावनी से नहीं बच पाएंगे। बीमा आम पब्लिक के लिए नहीं बल्कि न्यूज़ एंकरों के लिए भी जटिल विषय है।
रवीश की कलम से : संस्कृत का दोस्त कौन और दुश्मन कौन?संस्कृत को लेकर जो लोग भावुक हैं, वहीं संस्कृत के दुश्मन हैं। मौजूदा विवाद को जानबूझ कर संस्कृत विरोध के दायरे में फंसाए रखना चाहते हैं। जैसे मैकाले और मार्क्सवादियों के कारण ही संस्कृत का नुकसान हुआ है।
हर जगह संस्कृत, तो फिर संकट में क्यों?संस्कृत आम जन की भाषा नहीं है, लेकिन इसकी उपस्थिति कई कारणों से आम जनों के बीच मौजूद है। अब आपको इस आम जन का दायरा समझना होगा, तभी संस्कृत का विस्तार समझ सकेंगे।

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