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अखिलेश शर्मा

पत्रकारिता में पिछले 24 साल से सक्रिय अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक और प्राइम टाइम एंकर हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक अर्थव्यवस्था तथा दलीय राजनीति से जुड़े विषयों में उनकी गहन दिलचस्पी है। पिछले डेढ़ दशक से बीजेपी से जुड़ी ख़बरें कवर कर रहे हैं।

  • कांग्रेसी नेताओं के आत्मघाती बयानों का सिलसिला जारी है. हिंदू आतंकवाद के बाद अब बारी है जम्मू-कश्मीर की जिसे लेकर कांग्रेस के दो बड़े नेताओं ने बयान दे डाले. राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज़ के बयानों से कांग्रेस घिर गई है. अब पार्टी को सफाई देने पर मजबूर होना पड़ रहा है.
  • पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय पर कल के भाषण के बाद अब नई बहस शुरू हो गई है. क्या कांग्रेस ने तीखा विरोध कर जल्दबाजी तो नहीं की. कम से कम प्रणब दा के भाषण के बाद आई कांग्रेस और अन्य वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रिया तो यही बता रही है. हालांकि एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है कि प्रणब मुखर्जी आखिर संघ मुख्यालय क्यों गए.
  • लोकसभा उपचुनावों की करारी हार ने बीजेपी के मिशन 2019 पर सवालिया निशान लगा दिया है. नए सहयोगी मिलना तो दूर की बात, मौजूदा सहयोगी दलों ने ही आंखें दिखाना शुरू कर दिया है.
  • बीजेपी शिवसेना का गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे पुराने और मजबूत गठबंधनों में से एक है लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद से ही इसकी दरार गहराती जा रही है.
  • कैराना, गोरखपुर और फूलपुर की हार के बाद अब बीजेपी को उसके सहयोगी दलों ने आंखें दिखाना शुरू कर दिया है. जो सहयोगी दल राज्यों में ताकत में हैं वे चाहते हैं कि बीजेपी वहां छोटा भाई बन कर रहे.
  • भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर लंबे समय बाद तोपों की गूंज और गोलों की बारिश रुकने के आसार बनने लगे हैं. दोनों देशों के डीजीएमओ की बैठक के बाद 2003 के युद्धविराम को फिर से लागू करने पर सहमति बनती दिख रही है. हालांकि बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत पाकिस्तान पर भरोसा कर सकता है? यह सवाल इसलिए कि जब-जब भारत की ओर से युद्ध विराम किया गया, पाकिस्तान ने उसका उल्लंघन किया. पाकिस्तान की गोलाबारी से सीमा के गांवों पर रहने वाले सैंकड़ों भारतीय प्रभावित हुए. पाकिस्तान युद्ध विराम के उल्लंघन को युद्ध के स्तर तक लेकर चला गया है.
  • पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सात जून को वो करने जा रहे हैं जिसके बारे में कोई कांग्रेसी सोच भी नहीं सकता. वे नागपुर के रेशीमबाग में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर संघ शिक्षा वर्ग यानी ओटीसी के तृतीय वर्ष के समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रहेंगे. यह खबर सुनकर कांग्रेस को सांप सूंघ गया है.
  • हमारे नेताओं को जनता की याददाश्त पर अटूट विश्वास होता है. वे मान कर चलते हैं कि जनता की याददाश्त बेहद कमज़ोर होती है इसलिए वह न तो चुनाव के दौरान किए गए वादों को याद रख पाती है और न ही विरोधियों पर लगाए गए आरोपों को. इसीलिए चुनाव के वक़्त चाहे तो आप जेब से पर्ची निकाल कर किसी काल्पनिक स्विस बैंक खाते का ज़िक्र कर अपने विरोधी की प्रतिष्ठा को धूल में मिला कर राजनीतिक लाभ ले सकते हैं या फिर मंच पर नाटकीय अंदाज में अलमारी से कथित सबूतों की फाइल निकाल कर जनता के बीच लहरा सकते हैं.
  • कैराना, गोंदिया--भंडारा और पालघर समेत देश की चार लोकसभा सीटों और दस विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए सोमवार को वोट डाले गए. कैराना और गोंदिया-भंडारा में सुबह से ही ईवीएम और वीवीपैट में खराबी की शिकायतें मिलने लगीं. समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल ने इसके विरोध में चुनाव आयोग का दरवाजा भी खटखटाया.
  • मोदी सरकार कल चार साल पूरे कर रही है. लेकिन चार साल के जश्न पर पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दामों का साया है तो वहीं लोकसभा के तीन महत्वपूर्ण उपचुनावों को लेकर चिंता की छाया भी है.
  • बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के ऐलान के बावजूद जनता को पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ी कीमतों से कोई राहत नहीं मिली है. कर्नाटक चुनाव खत्म होने के बाद आज लगातार 11 वें दिन इनके दाम बढ़ा दिए गए. अब दिल्ली में पेट्रोल रिकॉर्ड 77 रुपए 47 पैसे प्रति लीटर और मुंबई में 85 रुपए 29 पैसे प्रति लीटर पहुंच गया है.
  • अगर आप सिर्फ पेट्रोल-डीज़ल के बढ़े दामों से ही परेशान हैं तो आपको एक और झटका भी लग सकता है. यह झटका है बिजली का जिसके दाम लगातार बढ़ रहे हैं. गर्मी के मौसम में बढ़ती मांग, कोयले की कम आपूर्ति और पश्चिमी भारत से उत्तरी राज्यों को बिजली भेजने वाली एक महत्वपूर्ण ट्रांसमिशन लाइन के टूटने से बिजली की कीमतों में बढोतरी हो रही है.
  • ऐसा क्यों होता है कि जब देश के किसी भी हिस्से में चुनाव होता है तो पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ते, लेकिन चुनाव खत्म होते ही दाम बढ़ने लगते हैं. कर्नाटक में चुनावों के दौरान 19 दिनों तक पूरे देश में पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहे. लेकिन वोटिंग पूरी होते ही पिछले 9 दिनों से हर दिन पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ रहे हैं. कहने को तेल कीमतों को सरकार के नियंत्रण से बाहर कर दिया गया है और अब तेल कंपनियां हर रोज तेल के दाम तय करती हैं, लेकिन साफ है कि यह कदम सिर्फ दिखावे का है क्योंकि चुनावों के वक्त दाम नहीं बढ़ता और चुनाव के बाद बढ़ जाता है.
  • कर्नाटक में सरकार पर सस्पेंस कल खत्म हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को कल चार बजे विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने को कहा है. प्रोटेम स्पीकर यानी अस्थाई स्पीकर सदन की कार्यवाही चलाएंगे.
  • कर्नाटक में वोटों की गिनती मंगलवार सुबह आठ बजे शुरू हो जाएगी. दोपहर होते-होते साफ हो जाएगा कि कर्नाटक किसका होगा? लेकिन एक्ज़िट पोल के रुझानों ने सबको उलझा दिया. 75 प्रतिशत एक्जिट पोल कहते हैं कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनेगी जबकि 25 प्रतिशत एक्जिट पोल कांग्रेस के आगे रहने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.
  • राहुल यह दावा करते हुए नहीं दिख रहे हैं कि कांग्रेस को बहुमत मिलेगा. सिर्फ कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने भर पर ही वे प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं.
  • क्या फूलपुर और गोरखपुर की हार से बीजेपी उबरने में कामयाब हो पाएगी? क्या इन दो चुनावों की हार का बदला कैराना और नूरपुर में ले पाएगी बीजेपी? दरअसल, कैराना के बीजेपी सांसद हुकुम सिंह और नूरपुर के बीजेपी विधायक लोकेंद्र सिंह की मृत्यु के बाद इन दो सीटों पर 28 मई को चुनाव होना है.
  • तारीख 23 अप्रैल. दिन सोमवार. कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से करीब 150 किलोमीटर दूर वरुणा में सुबह तक सड़कों पर चहल-पहल थी. बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी एस येदियुरप्पा अपने समर्थकों के साथ मौजूद थे. उनके बेटे विजयेंद्र वरुणा सीट से पर्चा भरने के लिए तैयार थे. पर्चा भरने के लिए मुहूर्त भी देख लिया गया था. पर्चा भरने की आखिरी तारीख मंगलवार 24 अप्रैल थी लेकिन ज्योतिष के हिसाब से वह सही दिन नहीं था. इसलिए सोमवार को ही पर्चा भरने का फैसला हुआ. मीडिया में इसे लेकर बहुत उत्सुकता थी क्योंकि यहां महामुकाबला होने वाला था.
  • दलित बहुल गांवों में रात बिताने का बीजेपी नेताओं का फैसला क्या उनके लिए सिरदर्द बन रहा है? या फिर वे ऐसा सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए कर रहे हैं.
  • तो गुजरात का हिसाब कर्नाटक में चुकाने की तैयारी है. गुजरात बीजेपी का गढ़ तो कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार. वैसे 2013 के बाद से अब तक जिस भी राज्य में बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला हुआ, कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी है. लेकिन गुजरात में कांग्रेस जैसे जीतते-जीतते हार गई और बीजेपी हारते-हारते जीत गई.
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