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अखिलेश शर्मा

पत्रकारिता में पिछले 24 साल से सक्रिय अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक और प्राइम टाइम एंकर हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक अर्थव्यवस्था तथा दलीय राजनीति से जुड़े विषयों में उनकी गहन दिलचस्पी है। पिछले डेढ़ दशक से बीजेपी से जुड़ी ख़बरें कवर कर रहे हैं।

  • इमरान खान के पाकिस्तान की कमान संभालने के बाद भारत पाकिस्तान रिश्तों को लेकर पहल ही ग़लत अंदाज़ में शुरू हुई. दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इमरान खान को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई देने का एक पत्र लिखा. लेकिन इसे लेकर पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया.
  • एक देश एक चुनाव की बहस एक दिलचस्प मुकाम पर पहुंच गई है. बीजेपी की ओर से यह संकेत मिलते ही कि अगले साल लोक सभा चुनावों के साथ ग्यारह राज्यों के चुनाव भी कराए जा सकते हैं, राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. इस बात पर भी बहस हो रही है कि आखिर यह मुमकिन कैसे होगा?
  • असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से शुरू हुई बात अब बहुत आगे निकलती दिख रही है. बीजेपी के नेताओं के बयानों से साफ़ है कि पार्टी इसे सिर्फ असम तक ही सीमित रखना नहीं चाहती.
  • कांग्रेस उन पार्टियों का समर्थन हासिल नहीं कर सकी जो उससे और बीजेपी से समान दूरी रखना चाहते हैं. पहले कोशिश थी कि एनसीपी की वंदना चव्हाण को मुकाबले में उतारा जाए. लेकिन जब शरद पवार को बीजू जनता दल के नेता और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के समर्थन का भरोसा नहीं मिला तो उन्होंने चव्हाण के नाम पर ना कर दी.
  • राज्यसभा में विपक्षी एकता तारतार हो गई. उप सभापति पद के लिए संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा करने की रणनीति औंधे मुंह गिर गई. एक दिन पहले ही लोक लेखा समिति में दिखी विपक्षी एकता चौबीस घंटे भी नहीं टिकी और एनडीए के उम्मीदवार हरिबंश को चित करने के मंसूबे धराशाई हो गए.
  • पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के संविधान संशोधन बिल को संसद ने मंजूरी दे दी है. महत्वपूर्ण बात है कि इस बिल के विरोध में एक भी वोट नहीं डाला गया. यानी सारी पार्टियां पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के पक्ष में एक राय रहीं. अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद पांच सदस्यीय आयोग को संवैधानिक दर्जा मिल जाएगा.
  • क्या जज ही जजों की नियुक्ति करते रहेंगे? क्या न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह ठीक कदम है? ये सवाल एक बार फिर इसलिए सामने आए हैं क्योंकि इस हफ्ते जजों की नियुक्ति को लेकर कई मुद्दे सामने आए हैं.
  • एक तरफ मॉब लिचिंग और विचारधारा के आधार पर हत्याओं की घटनाएं बढ़ रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ नफरत फैलाने वाले बयान भी लगातार बढ़ रहे हैं. ये बयान सांसदों-विधायकों और प्रवक्ताओं की ओर से दिए जाते हैं. राजनीतिक पार्टियां इनसे किनारा कर लेती हैं मगर समाज को बांटने वाले और हिंसा के लिए उकसाने वाले ये बयान अपना असर छोड़ जाते हैं.
  • पहले टीडीपी अलग हुई, फिर शिवसेना ने अविश्वास प्रस्ताव पर साथ छोड़ा, जेडीयू ने सीटों के बंटवारे पर आंखें दिखाईं और अब बीजेपी का एक और सहयोगी दल सरकार के फैसले के खिलाफ खुलकर सामने आ गया है.
  • कांग्रेस का मिशन राहुल शुरू होने से पहले ही लटक गया. राहुल को पीएम उम्मीदवार बनाने के कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले की स्याही सूखी भी नहीं थी कि उनके करीबी नेताओं ने फैसले की इबारत ही पलट दी. उनका कहना है कि कांग्रेस पीएम के लिए किसी का भी समर्थन कर सकती है बशर्ते वह बीजेपी और आरएसएस का न हो.
  • देश भर में मॉब लिचिंग की लगातार बढ़ रही घटनाओं के बाद दोषियों को सजा दिलाने में तेज़ी और कड़े से कड़ा दंड दिलाने के लिए कानूनों में बदलाव पर केंद्र सरकार गंभीरता से विचार कर रही है.
  • राहुल का पीएम उम्मीदवार बनना इतना आसान नहीं है. अगर संभावित सहयोगियों की बात करें तो इनमें कई खुद पीएम बनने की कतार में हैं. जैसे ममता बनर्जी, मायावती, शरद पवार आदि.
  • मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के पहले अविश्वास प्रस्ताव के लिए सारी तैयारियां पूरी हो गई हैं. बीजेपी चुनावी साल में इसे एक बड़े मौके के तौर पर देख रही है. अभी लोकसभा में स्पीकर को छोड़ कर 533 सदस्य हैं और 11 सीटें खाली हैं. एनडीए के पास 312 सांसद हैं जो बहुमत के आंकड़े 267 से काफी ज्यादा है.
  • नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बहस और मतदान शुक्रवार को होगा. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने मॉनसून सत्र के पहले ही दिन विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को मंजूर कर लिया. पिछले 15 साल में यह दूसरा अविश्वास प्रस्ताव है, और इससे पहले 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के खिलाफ प्रस्ताव आया था, जो गिर गया था. 2008 में मनमोहन सिंह सरकार न्यूक्लियर डील पर विश्वास प्रस्ताव लाई थी और जीत गई थी.
  • 2019 में विपक्ष के महागठबंधन में प्रधानमंत्री का एक और ताकतवर दावेदार सामने आया है. वह हैं बीएसपी प्रमुख मायावती. लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं के पहले सम्मेलन में कल लखनऊ में नवनियुक्त राष्ट्रीय कॉआर्डिनेटर वीर सिंह और जय प्रकाश सिंह ने कहा कि अब बहनजी के प्रधानमंत्री बनने का समय आ गया है. इन नेताओं ने कहा कि कर्नाटक में कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनवाने के बाद मायावती ताकतवर नेता के रूप में उभरी हैं. वे अकेली दबंग नेता हैं जो मोदी के विजय रथ को रोक सकती हैं. जयप्रकाश सिंह तो एक कदम आगे चले गए. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी राजनीति में कभी कामयाब नहीं होंगे. उन्होंने व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए कहा कि राहुल गांधी अपने पिता की तरह नहीं, बल्कि मां सोनिया गांधी की तरह दिखते हैं जो कि विदेशी हैं. इसीलिए वे कभी भी पीएम नहीं बन पाएंगे.
  • गरीबों, किसानों, बेरोजगारों, दलितों, मजदूरों, पिछड़ों के मुद्दे जैसे कहीं पीछे छूट गए हैं और देश में सिर्फ एक ही मुद्दा बच गया है- हिंदू-मुसलमान का. देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां हिंदू और मुसलमान के सवाल पर आपस में उलझी हुई हैं. याद नहीं आता कि राजनीतिक शब्दावली में हिंदू-मुसलमान शब्दों का इतने दुस्साही ढंग से खुलकर इस्तेमाल आखिरी बार कब किया गया था. पीएम नरेंद्र मोदी तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस से पूछ रहे हैं कि वो केवल मुसलमान पुरुषों की पार्टी है या उसे मुस्लिम महिलाओं की भी चिंता है? यही नहीं वे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इस पुराने बयान की भी याद दिला रहे हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का भी है.
  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर के हिंदू पाकिस्तान बयान से उठा विवाद अब कांग्रेस के लिए परेशानी का सबब बन गया है. बीजेपी की मांग है कि उनके बयान के लिए राहुल गांधी माफी मांगें जबकि कांग्रेस ने खुद को थरूर के बयान से अलग कर लिया.
  • कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आज मुस्लिम बुद्धिजीवियों और उदारवादियों के एक समूह से चाय पर चर्चा की. यह एक दिलचस्प घटनाक्रम है क्योंकि हाल ही में कांग्रेस और मुसलमानों के रिश्तों को लेकर खासी टीका टिप्पणियां हुई हैं.
  • मोदी सरकार से नाराज़ किसानों को मनाने की ज़िम्मेदारी अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाली है. पीएम मोदी देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों के बीच जाकर उनके लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की जानकारी देंगे. इनमें सबसे बड़ा फैसला चार जुलाई को किया गया जिसमें खरीफ की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य कम से कम पचास फीसदी बढ़ाना है. हालांकि सरकार के दावे और हकीकत के बीच बड़े अंतर को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं.
  • 'जो हमें नुकसान पहुंचाएगा, उसका ही नुकसान होगा.' अपनी पार्टी जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नीतीश के ये बोल बीजेपी को साफ संदेश है. यह उस नारे की याद दिलाता है जो राजनीतिक कार्यकर्ता चुनाव के वक्त या फिर पार्टियों में अंदरूनी विभाजन के वक्त लगाते हैं. वो नारा होता है- 'जो हमसे टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा.'
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