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अखिलेश शर्मा

पत्रकारिता में पिछले 24 साल से सक्रिय अखिलेश शर्मा एनडीटीवी इंडिया के राजनीतिक संपादक और प्राइम टाइम एंकर हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, संसदीय लोकतंत्र, राजनीतिक अर्थव्यवस्था तथा दलीय राजनीति से जुड़े विषयों में उनकी गहन दिलचस्पी है। पिछले डेढ़ दशक से बीजेपी से जुड़ी ख़बरें कवर कर रहे हैं।

  • प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रह चुके संजय बारू की किताब 'द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' ने इन दिनों तहलका मचा रखा है। यह पुस्तक एक तरह से बीजेपी के उन आरोपों की पुष्टि करती है कि मनमोहन सिंह बेहद कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और सत्ता का संचालन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के हाथों में था।
  • आखिर क्या वजह है कि हर चुनावी सभा में सूचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन का अधिकार देने की बात करने वाले राहुल के भाषणों का ज्यादातर हिस्सा अब मोदी पर हमलों में केंद्रित होने लगा है।
  • विडंबना यह है कि जब-जब मोदी की सांप्रदायिक छवि को लेकर सवाल उठाए गए, गुजरात में उन्होंने इसका फायदा उठाया। अब सवाल यह है कि राहुल के ताज़ा हमलों के बाद क्या होगा? मोदी इसका किस तरह से जवाब देते हैं और असली मुद्दों से भटके इस चुनाव में क्या प्रचार फिर पटरी पर वापस आ पाएगा?
  • दिल्ली में 10 अप्रैल को मतदान है। वैसे तो यहां लोक सभा की सिर्फ सात सीटें हैं। मगर पिछले साल दिसंबर में आए यहां के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। पंद्रह साल से सत्ता में काबिज कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया।
  • आखिरकार बीजेपी का घोषणापत्र जारी हो ही गया। तमाम बड़े नेताओं के एक साथ दिल्ली में न जुट पाने के कारण इस घोषणापत्र को जारी करने में देरी हो रही थी। हालांकि ऐसी भी अटकलें लगाई गईं कि मुरली मनोहर जोशी द्वारा तैयार किए गए घोषणापत्र से पार्टी खुश नहीं थी और इसलिए उसमें कुछ परिवर्तन किए गए।
  • क्या बीजेपी को लगने लगा है कि मुजफ्फरनगर जैसे दसियों दंगों से प्रभावित उत्तर प्रदेश में बिना हिंदुत्व का कार्ड खेले उसे वह चुनावी कामयाबी नहीं मिल सकती, जिसके जरिये वह लखनऊ से दिल्ली का रास्ता तय करना चाहती है...
  • चुनावी मौसम में नेताओं के असली रंग दिखते हैं। ये मेंढक की तरह एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कूदते हैं, विचारधाराएं पीछे छूट जाती हैं, कुर्सी का मोह सर्वोपरि हो जाता है। वैसे तो ये प्रवृत्तियां हमेशा ही रहती हैं, मगर चुनाव के मौसम में खुलकर सामने आती हैं।
  • 6 अप्रैल को बीजेपी का स्थापना दिवस है। इसी दिन 1980 में बीजेपी का गठन हुआ था। इस बार ये स्थापना दिवस लोकसभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होने से ठीक एक दिन पहले आया है। बीजेपी ने इस दिन का इस्तेमाल मतदाताओं के बीच बिताने और उन्हें पार्टी के लिए मतदान करने की अपील करने के लिए तय किया है।
  • चुनाव प्रचार के दौरान नेताओं के लिए हेलीकॉप्टर बेहद जरूरी है। एक जगह से दूसरी जगह तुरंत पहुंचने के लिए इनका इस्तेमाल होता है। हेलीकॉप्टर की वजह से ही स्टार प्रचारक एक दिन में छह से आठ तक चुनावी सभाएं कर सकते हैं।
  • राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा ने राहुल-सोनिया के खिलाफ भारी-भरकम उम्मीदवार नहीं उतारे हैं... शायद इस उम्मीद में कि कांग्रेस भी बनारस में ऐसा ही करे... लेकिन राजनीति वह क्षेत्र है, जहां न स्थापित धारणाएं काम करती हैं, न ही प्रचलित सिद्धांत...
  • सोनिया गांधी ने कहा कि कांग्रेस ने गंगा-जमुनी तहज़ीब को मजबूत किया है जबकि बीजेपी नफरत की राजनीति कर देश को कमजोर कर रही है। वहीं, नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार की नाकामियों का जिक्र कर विकास को बड़ा मुद्दा बनाना चाह रहे हैं।
  • बीजेपी में इस वक्त 'फ्री फॉर ऑल' क्यों है? ऐसा क्यों लग रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व कमजोर पड़ रहा है? क्यों पार्टी के नेता आगे निकलने के चक्कर में एक-दूसरे के पैरों पर अपने पैर रख रहे हैं? अगर सरकार बनने से पहले ही आपसी लड़ाई का ये हाल है, तो सरकार बनने पर क्या होगा?
  • बीजेपी के बारे में कहा जा रहा है कि उसमें दो धड़े हैं। एक '170 ग्रुप' जो चाहता है, पार्टी की सीटें 170 के ऊपर न जाएं, ताकि मोदी की जगह कोई और पीएम बन सके। दूसरा '270 ग्रुप', जो मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहता है। जाहिर है ये काल्पनिक प्रश्न हैं, लेकिन राजनीति में कुछ भी हो सकता है।
  • बनारस में केजरीवाल से मुकाबला कर रहे मोदी अपने विरोधी को अब हल्के में नहीं ले रहे, यह बात कम से कम उनके कल के हमलों से साफ हो जाती है... लेकिन देखना होगा कि अगर कांग्रेस बनारस में उनके खिलाफ कोई मजबूत उम्मीदवार उतारती है, तो क्या तब भी मोदी केजरीवाल पर ही हमला करते रहेंगे...?
  • जसवंत का बीजेपी नेताओं पर हमला जारी है। वह पार्टी के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर हमला करने में भी पीछे नहीं रहे हैं। बीजेपी में चल रहे नमो-नमो के जाप को उन्होंने आपातकाल की मानसिकता से जोड़ा है। लेकिन ठीक एक महीने पूर्व मोदी पर जारी किताब में जसवंत ने उनकी भरपूर तारीफ की है।
  • सितारे प्रवासी पक्षियों जैसे होते हैं, जो पांच साल में एक बार नजर आते हैं... जोश में लोग इन्हें वोट तो दे देते हैं और फिर पछताते हैं... इसीलिए राजनीतिक विश्लेषक पिछले अनुभवों को ध्यान में रखकर कहते हैं कि जनता के लिए फिल्मी सितारों को चुनने से बेहतर होगा कि वो खांटी नेताओं को चुनें...
  • नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बनने का सपना तभी पूरा होगा, जब पार्टी को यूपी में कामयाबी मिले... इसीलिए उन्होंने अपने करीबी अमित शाह को यह जिम्मेदारी दी... सो, अगर यहां कामयाबी मिली, तो शाह पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के लिए अपनी जगह पक्की कर लेंगे...
  • बीजेपी में कुछ लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर जसवंत सिंह को बाड़मेर से टिकट मिल जाता, तो भी वह असली-नकली बीजेपी की बात करते। शिमला चिंतन बैठक के समय जब उन्हें बीजेपी से निकाला गया और जब आडवाणी के कहने पर उनकी वापसी हुई, तब वह असली बीजेपी थी या फिर नकली?
  • जसवंत सिंह और हरिन पाठक दोनों में एक समानता है। दोनों हनुमान कहे जाते हैं। जसवंत सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी के हनुमान तो हरिन पाठक लालकृष्ण आडवाणी के हनुमान। एनडीए की छह साल की सरकार में हर संकट में वाजपेयी को जसवंत सिंह याद आते थे।
  • गुजरात और मध्य प्रदेश की मिलती सीमाएं, विदिशा-भोपाल की नजदीकियां और आडवाणी-सुषमा की करीबियां... यहीं पर खड़े मिलते हैं सुषमा-आडवाणी के करीबी कर्नाटक के अनंत कुमार, जो मध्य प्रदेश के स्थायी प्रभारी कहे जाते हैं और इन सबके बीच हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।
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